कुत्ता बाइक बन गया! कैसे सामने आया सड़क हादसों में बीमा क्लेम का पुलिसिया फॉर्मूला
उत्तर प्रदेश के देवीपाटन रेंज में SIT जांच के बाद खुलासा हुआ कि कई सड़क हादसों की जांच में कुत्ते की टक्कर को बाइक एक्सीडेंट बताकर बीमा क्लेम के लिए पुलिस रिकॉर्ड में हेरफेर की गई

पूर्वी यूपी में सरयू नदी के किनारे देवीपाटन रेंज के एक सड़क हादसे का मामला कागज़ों में बिल्कुल अलग कहानी कहता है. पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, एक मोटरसाइकिल ने पैदल जा रहे व्यक्ति को टक्कर मारी, चालक के पास वैध लाइसेंस था और बाइक का बीमा था. पोस्टमार्टम, साइट प्लान और गवाहों के बयान उसी लाइन में चलते हैं. लेकिन जब एक निजी बीमा कंपनी ने अपने स्तर पर पड़ताल की, तो कहानी पलट गई.
स्थानीय लोगों ने बताया कि हादसा किसी मोटरसाइकिल से नहीं, बल्कि आवारा कुत्ते से टकराने की वजह से हुआ था. न मोटरसाइकिल थी, न कोई ड्राइवर. यही केस बाद में देवीपाटन रेंज में सामने आए बड़े फर्जीवाड़े की बुनियाद बना. यहीं से परतें खुलनी शुरू हुईं. 30 जनवरी को देवीपाटन रेंज के आईजी अमित पाठक ने 13 पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया. आरोप था सड़क दुर्घटनाओं की जांच में सुनियोजित हेरफेर, ताकि बीमा कंपनियों से मुआवजा क्लेम कराया जा सके. यह कार्रवाई यूं ही नहीं हुई. इसके पीछे एक साल चली स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) की जांच थी, जिसने 2024 में दर्ज 20 जानलेवा सड़क हादसों की फाइलें खंगालीं.
कैसे खुला मामला
इस पूरे मामले की शुरुआत एक निजी बीमा कंपनी के अधिकारी राजेंद्र प्रताप सिंह की शिकायत से हुई. उन्होंने आईजी को एक लिस्ट सौंपी, जिसमें गोंडा, बहराइच और श्रावस्ती के कई केस शामिल थे. शिकायत सीधी थी, लेकिन गंभीर. आरोप था कि पुलिस तफ्तीश के दौरान दुर्घटना में शामिल असली वाहन और ड्राइवर को बदल दिया जाता है. गैर-बीमित वाहन या बिना लाइसेंस वाले ड्राइवर की जगह कागज़ों में ऐसा वाहन और चालक दिखाया जाता है, जो बीमित हो और जिसके पास वैध लाइसेंस हो. नतीजा, बीमा कंपनी से लाखों-करोड़ों का क्लेम.
आईजी के निर्देश पर बनी SIT ने तीनों जिलों के अलग-अलग थानों में दर्ज 20 मामलों की जांच शुरू की. सभी केस ऐसे थे, जिनमें सड़क हादसे में किसी की मौत हुई थी और बाद में बीमा क्लेम फाइल किया गया था. जांच के बाद तस्वीर साफ हो गई. 13 मामलों में गंभीर गड़बड़ी पाई गई, जबकि सात मामलों में कोई अनियमितता नहीं मिली.
फर्जीवाड़े का तरीका
SIT की रिपोर्ट इस फर्जीवाड़े की मोडस आपरेंडी को साफ-साफ बयान करती है. कुल 13 संदिग्ध मामलों में चार ऐसे थे, जिनमें दुर्घटना में शामिल मूल वाहन को ही बदल दिया गया. यानी जिस वाहन से असल में हादसा हुआ, उसकी जगह पूरी तरह अलग, बीमित वाहन दिखा दिया गया. आठ मामलों में ड्राइवरों का विवरण बदला गया. जिन चालकों के पास लाइसेंस नहीं था या जो मौके पर मौजूद ही नहीं थे, उनकी जगह ऐसे लोगों को आरोपी बना दिया गया जिनके दस्तावेज पूरे थे.
एक केस में तो हद ही हो गई. जांच में सामने आया कि जिस व्यक्ति को दुर्घटना का आरोपी दिखाया गया, वह हादसे के दिन मुंबई में था. उसके मोबाइल लोकेशन और अन्य रिकॉर्ड ने इसकी पुष्टि की. इसके बावजूद पुलिस रिकॉर्ड में वही ड्राइवर बन गया. कहीं अज्ञात वाहन की टक्कर को पहचान वाले वाहन से जोड़ दिया गया, तो कहीं साधारण गिरने या जानवर से टकराने की घटना को मोटर एक्सीडेंट का रूप दे दिया गया.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत यदि किसी व्यक्ति की सड़क दुर्घटना में मौत होती है, तो बीमा कंपनी मृतक के परिवार को मुआवजा देती है. अगर वाहन बीमित नहीं है या ड्राइवर के पास वैध लाइसेंस नहीं है, तो मुआवजे की जिम्मेदारी वाहन मालिक या चालक पर आती है. इसी कानूनी पेच का फायदा उठाकर विवेचक खेल करते थे. केस डायरी, चार्जशीट और गवाहों के बयान इस तरह गढ़े जाते थे कि बीमा कंपनी पर भुगतान का दबाव बने.
चार्जशीट दाखिल होने के बाद सभी दस्तावेज बीमा कंपनी को भेज दिए जाते थे. आमतौर पर पुलिस की रिपोर्ट पर भरोसा कर क्लेम प्रोसेस हो जाता है. लेकिन इन मामलों में बीमा कंपनी ने अतिरिक्त सतर्कता बरती. कंपनी के जांचकर्ताओं ने स्थानीय स्तर पर लोगों से बात की, हादसे की जगह देखी और रिकॉर्ड्स का मिलान किया. कई मामलों में कथित कहानी और जमीनी हकीकत में फर्क मिला. इसी के बाद सीनियर पुलिस अधिकारियों को आवेदन देकर क्लेम के वेरिफिकेशन की मांग की गई. यही दबाव SIT गठन का कारण बना. जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, वैसे-वैसे साफ हो गया कि यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित फर्जीवाड़ा है.
किन जिलों में क्या मिला
SIT जांच में बहराइच सबसे ज्यादा संदिग्ध मामलों वाला जिला निकला, जहां नौ मामलों में गड़बड़ी पाई गई. गोंडा और श्रावस्ती में दो-दो मामलों में हेरफेर सामने आया. बाकी सात केस जांच में सही पाए गए. इन 13 मामलों में शामिल पुलिसकर्मियों की भूमिका अलग-अलग थी. कहीं जांच अधिकारी ने जानबूझकर गलत वाहन दिखाया, तो कहीं केस डायरी में ड्राइवर का नाम बदला गया. रिपोर्ट में साफ कहा गया कि यह सब बीमा कंपनियों से गैर-कानूनी तरीके से मुआवजा लेने की कोशिश का हिस्सा था.
आईजी अमित पाठक ने SIT रिपोर्ट के आधार पर तत्काल कार्रवाई की. एक इंस्पेक्टर और 11 सब-इंस्पेक्टर समेत कुल 13 पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया. इसके अलावा तीन अन्य एसआई के खिलाफ निलंबन और विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है.
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, इन मामलों में सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर गलत आचरण पाया गया है. आईजी ने यह भी आदेश दिया कि देवीपाटन रेंज में दर्ज सभी सड़क दुर्घटना मामलों की समीक्षा की जाए. इस रेंज में बलरामपुर, गोंडा, श्रावस्ती और बहराइच चार जिले आते हैं. पुराने मामलों को भी खंगाला जा रहा है, ताकि यह देखा जा सके कि कहीं इसी तरह का खेल पहले भी तो नहीं हुआ.
देवीपाटन रेंज का मामला सामने आने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह समस्या सिर्फ तीन जिलों तक सीमित है. बीमा कंपनियों और पुलिस के कुछ अधिकारियों का मानना है कि सड़क दुर्घटना क्लेम में हेरफेर का यह तरीका नया नहीं है. फर्क बस इतना है कि हर जगह पकड़ में नहीं आता. पुलिस विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक देवीपाटन मंडल का SIT मॉडल को यूपी के अन्य जिलों में भी लागू करने पर विचार हो रहा है. खासकर उन जिलों में, जहां सड़क हादसों के बाद बीमा क्लेम की संख्या असामान्य रूप से ज्यादा है. पुलिस मुख्यालय स्तर पर यह भी चर्चा है कि जांच प्रक्रिया में तकनीकी निगरानी बढ़ाई जाए, जैसे सीसीटीवी, मोबाइल लोकेशन और डिजिटल रिकॉर्ड्स का अनिवार्य मिलान.
पीड़ितों पर असर
इस पूरे फर्जीवाड़े का सबसे बड़ा नुकसान असल पीड़ितों को हुआ. कई मामलों में या तो उन्हें मुआवजा मिला ही नहीं, या फिर केस कमजोर होने की वजह से लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी. कहीं बीमा कंपनी ने शक के चलते भुगतान रोक दिया, तो कहीं अदालत में मामला उलझ गया. गोंडा जिले के एक सामाजिक कार्यकर्ता बड़कऊ तिवारी कहते हैं, “कागज़ों में खेल करके कुछ लोग पैसा बना लेते हैं, लेकिन जिन परिवारों ने सड़क हादसे में अपना सदस्य खोया, उनके लिए यह दोहरी मार है. पहले जान जाती है, फिर न्याय और मुआवजे के लिए भटकना पड़ता है.”
हालांकि देवीपाटन रेंज का यह खुलासा यूपी पुलिस के लिए चेतावनी की तरह है. एक तरफ कार्रवाई से यह संदेश गया है कि फर्जीवाड़ा बर्दाश्त नहीं होगा, दूसरी तरफ यह भी साफ है कि सिस्टम में खामियां हैं. जब तक जांच पारदर्शी नहीं होगी और बाहरी निगरानी मजबूत नहीं की जाएगी, तब तक ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति का खतरा बना रहेगा. आईजी पाठक का कहना है कि सड़क दुर्घटना मामलों में नियमों के सख्त पालन के निर्देश दिए गए हैं. हर केस में तथ्यों का सत्यापन और दस्तावेजों का क्रॉस-चेक अनिवार्य किया जा रहा है.