दिल्ली : केजरीवाल की जल्दी चुनाव की मांग क्या ECI मान सकता है? कानून क्या कहता है?

आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने मांग की है कि दिल्ली विधानसभा का चुनाव नवंबर में होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के साथ ही कराए जाएं, हालांकि यह दिलचस्प है कि इस मांग के साथ उन्होंने विधानसभा भंग करने की सिफारिश नहीं की

आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल/फाइल फोटो
आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल/फाइल फोटो

आतिशी मार्लेना दिल्ली की नई मुख्यमंत्री बनी हैं. 17 सितंबर को आम आदमी पार्टी (आप) की विधायक दल की बैठक में खुद 'आप' के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा, जिस पर सभी विधायकों ने खड़े होकर सहमति जताई. इससे पहले केजरीवाल ने 15 सितंबर को एलान किया था कि वे दो दिन बाद सीएम के पद से इस्तीफा दे देंगे. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था, "अब जनता तय करे कि मैं ईमानदार हूं या बेईमान. जनता ने दाग धोया और विधानसभा चुनाव जीता तो फिर से कुर्सी पर बैठूंगा."

केजरीवाल के सीएम पद से इस्तीफे के एलान के बाद ही नए दावेदारों के नामों पर कयासबाजियों का दौर शुरू हो गया था, जो अब आतिशी के नाम पर मुहर लगने के साथ खत्म हो गया है. अब केजरीवाल दिल्ली के उप-राज्यपाल वीके सक्सेना से 17 सितंबर की शाम साढ़े चार बजे मुलाकात करेंगे और अपना इस्तीफा सौपेंगे. बहरहाल, आप के सर्वेसर्वा ने 15 सितंबर को एक मांग की थी कि दिल्ली विधानसभा के चुनाव महाराष्ट्र चुनावों के साथ ही संपन्न कराए जाएं. यहां अब सवाल उठता है क्या ये संभव है और इस पर कानून क्या कहता है?

कौन तय करता है दिल्ली विधानसभा चुनाव कब होंगे?

संविधान के अनुच्छेद 324 के मुताबिक, चुनाव कराने संबंधी प्रक्रिया के संचालन की सारी शक्तियां भारत के चुनाव आयोग यानी ECI में निहित हैं. ECI मौजूदा सदन के पांच साल के कार्यकाल के खत्म होने की तारीख से पहले से ही काम करना शुरू कर देता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सदन का कार्यकाल खत्म होने से पहले ही चुनावी प्रक्रिया पूरी हो जाए.

इसके अलावा जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 15(2) की भी इसमें भूमिका है. इसके तहत, संबंधित राज्यों में चुनावों की अधिसूचना विधानसभा के कार्यकाल खत्म होने के छह महीने से पहले जारी नहीं की जा सकती. हालांकि, अगर वो विधानसभा अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही भंग कर दी जाए, तो वहां चुनाव कराए जा सकते हैं.

महाराष्ट्र की बात करें तो वहां नियमों के तहत, 26 नवंबर से पहले नए सदन के लिए चुनाव होना जरूरी है. पिछली बार अक्तूबर, 2019 में वहां विधानसभा चुनाव हुए थे, जबकि दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल 23 फरवरी, 2025 को खत्म हो रहा है.

क्या सीएम बाध्य कर सकते हैं ECI को समय से पहले चुनाव के लिए?

संविधान के अनुच्छेद 174(2)(बी) के मुताबिक, राज्यपाल विधानसभा को भंग कर सकते हैं. विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने से पहले उसे भंग करने के लिए मंत्रिपरिषद् राज्यपाल से सिफारिश कर सकती है, जिससे राज्यपाल इसे भंग कर सकता है. हालांकि राज्यपाल तब अपना विवेक इस्तेमाल कर सकते हैं जब सलाह किसी ऐसे मुख्यमंत्री की ओर से आए जिसका बहुमत संदेह में हो. विधानसभा भंग होने के बाद चुनाव आयोग को छह महीने के भीतर नए चुनाव कराने होते हैं.

2018 में राज्यपाल नरसिम्हन को तेलंगाना विधानसभा भंग करने की सिफारिश सौंपते केसीआर

सितंबर 2018 में, तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) के नेतृत्व में तेलंगाना मंत्रिमंडल ने विधानसभा को भंग करने की सिफारिश की, जिसका कार्यकाल जून 2019 में (आम चुनावों के समय) खत्म होना था. तब तत्कालीन राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन ने सिफारिश स्वीकार कर लिया और केसीआर को राज्य का कार्यवाहक मुख्यमंत्री नियुक्त किया था. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, केसीआर ने समय से पहले चुनाव कराने का फैसला इसलिए लिया था ताकि 2019 में होने वाले आम चुनावों का माहौल विधानसभा चुनावों पर हावी न हो जाए.

केसीआर चाहते थे कि 2018 के नवंबर-दिसंबर में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम में होने वाले विधानसभा चुनावों के साथ ही तेलंगाना का भी चुनाव हो जाए. तब राज्यपाल नरसिम्हन के सिफारिश स्वीकारने के साथ वहां दिसंबर, 2018 में विधानसभा चुनाव आयोजित हुए. इन चुनावों में केसीआर की पार्टी बीआरएस (भारत राष्ट्र समिति) ने अपना परचम लहराते हुए कुल 119 सीटों में से 88 पर जीत हासिल की थी.

दिल्ली की कहानी क्यों है अलग?

केसीआर के उदाहरण को देखते हुए केजरीवाल के पास भी विधानसभा को भंग करने का विकल्प था. लेकिन पार्टी ऐसा नहीं कर रही है क्योंकि ऐसा करने पर अगर तुरंत चुनावों की घोषणा नहीं होती है तो दिल्ली की सत्ता की बागडोर उप-राज्यपाल (एलजी) के पास होगी.

दरअसल, दिल्ली एक "पूर्ण" राज्य नहीं है, बल्कि एक केंद्रशासित प्रदेश है. यहां राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार कानून, 1991 लागू होता है. इस कानून की धारा 6(2)(बी) कहती है कि उपराज्यपाल विधानसभा को भंग कर सकते हैं. हालांकि दिल्ली का मुख्यमंत्री विधानसभा को भंग करने की सिफारिश करे, तब भी अंतिम फैसला केंद्र (एलजी के माध्यम से) का होता है.

अगर केजरीवाल विधानसभा भंग करने की पेशकश करते और एलजी विनय सक्सेना उसे मंजूरी दे देते, तो तुरंत चुनावों की घोषणा नहीं होने की स्थिति में राज्य की बागडोर एलजी के माध्यम से केंद्र के पास चली जाती. यही वजह है कि केजरीवाल ने विधानसभा भंग न करके जल्द चुनाव कराने की बात की.

इलेक्शन कराने से पहले चुनाव आयोग किन बातों पर गौर करता है?

नई विधानसभा (या लोकसभा) का गठन मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने से पहले होना जरूरी है. इसका मतलब ये है कि उस तय तारीख से पहले चुनाव प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए. इस प्रक्रिया में विजेताओं को निर्वाचन प्रमाण-पत्र देना और सभी औपचारिकताएं पूरी करना शामिल है. उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में 26 नवंबर से पहले ये सारी प्रक्रियाएं पूरी हो जानी चाहिए, क्योंकि सदन का मौजूदा कार्यकाल उसी दिन खत्म हो रहा है.

जहां तक दिल्ली में जल्दी चुनाव कराने के संबंध में चुनाव आयोग की बात है, तो फिलहाल उसका ध्यान देश की राजधानी पर नहीं है. चुनाव आयोग इस समय जम्मू -कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने में व्यस्त है, जहां पहले चरण का मतदान 18 सितंबर को होगा.

इसके बाद 25 सितंबर और 1 अक्टूबर को दो और चरण होंगे. इसके अलावा हरियाणा में मतदान 5 अक्टूबर को होगा, और हरियाणा और जम्मू-कश्मीर दोनों में मतगणना 8 अक्टूबर को होगी. अगले चरण में महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभाओं के चुनाव होने हैं. इन दोनों सदनों का कार्यकाल नवंबर 2024 और जनवरी 2025 में खत्म होगा. इसके बाद ही दिल्ली की बारी आती है जहां फरवरी, 2025 में विधानसभा चुनाव होने हैं.

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