‘पुष्कर मंथन’ से निकलेगा कांग्रेस की मजबूती का मंत्र?

राजस्थान के पुष्कर में 23 मई से कांग्रेस का 10 दिन का एक खास प्रशिक्षण शिविर चल रहा है

राहुल गांधी के भी पुष्कर पहुंचने की संभावना है (फाइल फोटो)

राजस्थान के अजमेर जिले के पुष्कर में कांग्रेस अपनी राजनीतिक दिशा और संगठनात्मक भविष्य को लेकर बड़ा प्रयोग कर रही है.  इसी रणनीति के तहत संगठन सृजन मॉडल के जरिए चुने गए दिल्ली और राजस्थान के 100 जिलाध्यक्षों को पुष्कर में 10 दिन तक राजनीतिक, वैचारिक और प्रबंधन के गुर सिखाए जा रहे हैं.

23 मई से 1 जून तक चल रहे इस शिविर में राजस्थान और दिल्ली कांग्रेस पदाधिकारियों को राहुल गांधी के रणनीतिक सलाहकार सचिन राव व अन्य वरिष्ठ नेता बूथ मैनेजमेंट, जनसंवाद कौशल, सोशल मीडिया, चुनावी प्रक्रिया, संगठन संचालन और नेतृत्व क्षमता जैसे विषयों पर प्रशिक्षण दे रहे हैं. 

खास बात यह है कि यह सिर्फ क्लासरूम ट्रेनिंग नहीं है. जिलाध्यक्षों को श्रमदान, गांवों में रात्रि प्रवास, मनरेगा व अन्य सामाजिक योजनाओं का निरीक्षण और अपना काम खुद करने जैसी गतिविधियों से भी जोड़ा गया है. पार्टी इसे राजनीतिक कैडर निर्माण का हिस्सा मान रही है. शिविर के समापन सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आने की संभावना है.

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व को अब यह आभास हो चुका है कि केवल बड़े नेताओं और चुनावी सभाओं के भरोसे सियासी लड़ाई नहीं जीती जा सकती. राजनीतिक विश्लेषक अजय पुरोहित कहते हैं, “आने वाले वक्त में पार्टी को बूथ स्तर पर वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की जरूरत पड़ेगी. इसी के चलते राहुल गांधी लंबे समय से संगठन में ट्रेनिंग कल्चर लाने पर जोर दे रहे हैं. पुष्कर के इस शिविर को उसी सोच का विस्तार माना जा रहा है.”

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है, “संगठन सृजन अभियान विचार, संघर्ष और संगठन को नई ऊर्जा देने का मार्ग है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के निर्देशन में आयोजित इस प्रशिक्षण में संगठन को सशक्त बनाने, पार्टी सिद्धांतों के साथ कार्यकर्ताओं को वैचारिक रूप से तैयार करने और आमजन के अधिकारों की लड़ाई को नई मजबूती देने पर चर्चा हो रही है.”

हालांकि इस पूरे आयोजन की सबसे बड़ी परीक्षा कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी से निपटना होगी. राजस्थान कांग्रेस अब चार खेमों में बंटी है. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट, प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के बीच लंबे समय से आपसी खींचतान चल रही है. जिला अध्यक्षों की नियुक्ति से लेकर संगठनात्मक फैसलों तक में यह खींचतान खुलकर सामने आती रही है. ऐसे में पुष्कर शिविर को केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि नेताओं और संगठन के बीच तालमेल बैठाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. यही कारण है कि शिविर में गहलोत, पायलट, डोटासरा, जूली और दूसरे वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग सत्र रखे गए हैं ताकि कार्यकर्ताओं तक यह संदेश जाए कि पार्टी नेतृत्व एकजुट है और एक मंच पर है.

कांग्रेस के लिए यह प्रयोग इसलिए भी अनूठा माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले प्रशिक्षण शिविर दो-तीन दिन तक सीमित रहते थे मगर पहली बार जिला अध्यक्षों को पूरे 10 दिन तक एक साथ रखकर वैचारिक और राजनीतिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है. इसे एक अलग परंपरा के तौर पर देखा जा रहा है. जमीन पर बैठकर सत्र सुनना, खुद अपनी प्लेट धोना और गांवों में जाकर लोगों के साथ संवाद करना जैसी गतिविधियों के जरिए कांग्रेस नेतृत्व संगठन में अनुशासन और सामूहिक संस्कृति विकसित करने की कोशिश कर रहा है.

पार्टी का मानना है कि इस शिविर का सबसे बड़ा परिणाम बूथ स्तर पर कांग्रेस का मजबूत नेटवर्क और प्रशिक्षित जिला नेतृत्व के रूप में सामने आएगा. राजस्थान में आने वाले निकाय और पंचायत चुनावों को देखते हुए कांग्रेस संगठन को ज्यादा सक्रिय और जवाबदेह बनाना चाहती है. साथ ही महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक और किसानों के मुद्दों पर भाजपा सरकार को घेरने की रणनीति भी तैयार की जा रही है.

इन सब गतिविधियों के बावजूद बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या 10 दिन का यह मंथन कांग्रेस की पुरानी गुटबाजी और नेतृत्व संघर्ष को कम कर पाएगा, या फिर यह केवल एक संगठनात्मक अभ्यास बनकर रह जाएगा.

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