अखिलेश के साथ लेकिन मायावती से भी बात! किस दुविधा में है कांग्रेस?

BSP सुप्रीमो मायावती से संपर्क की कांग्रेस नेताओं की कोशिश के बाद UP में विपक्षी गठबंधन की राजनीति गरमा गई है. SP ने भी 403 सीटों पर तैयारी का संदेश देकर नए संकेत दिए हैं

राहुल गांधी और अखिलेश यादव. (File)
राहुल गांधी और अखिलेश यादव (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन की संभावनाओं और राजनीतिक मोलभाव की नई परत तब खुलती दिखी, जब 19 मई को कांग्रेस के दो वरिष्ठ दलित नेताओं ने बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती से मिलने की कोशिश की. हालांकि यह मुलाक़ात हो नहीं सकी क्योंकि BSP प्रमुख कथित तौर पर 'व्यस्त' थीं लेकिन इस असफल प्रयास ने प्रदेश की राजनीति में नई अटकलों को जन्म दे दिया.

बाराबंकी से कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया और पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम का अचानक लखनऊ स्थित मायावती आवास पहुंचना, राजनीतिक गलियारों में सामान्य शिष्टाचार भेंट की तरह नहीं देखा गया. खासकर तब, जब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को 2024 लोकसभा चुनाव के बाद स्वाभाविक सहयोगी माना जा रहा था और INDIA गठबंधन के साथ आगे बढ़ने की चर्चा लगातार हो रही थी.

घटना के बाद कांग्रेस ने तत्काल दूरी बनाते हुए दोनों नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. यूपी कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडे ने सार्वजनिक रूप से कहा कि दोनों नेता पार्टी की ओर से अधिकृत नहीं थे और पार्टी यह पता लगाने के लिए स्पष्टीकरण मांग रही है कि यह मुलाक़ात क्यों की गई. लेकिन कांग्रेस की इस सफाई के बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी खेमों में यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह वास्तव में 'व्यक्तिगत पहल' थी या फिर BSP के साथ संभावित संवाद की एक नियंत्रित राजनीतिक कोशिश.

दलित समीकरणों के बीच कांग्रेस की बेचैनी

उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक लंबे समय तक BSP की राजनीतिक ताकत का आधार रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में BSP के कमजोर संगठन और चुनावी प्रदर्शन ने इस सामाजिक आधार को बिखराव की स्थिति में ला दिया है. कांग्रेस, जो लोकसभा चुनाव के बाद राज्य में अपना जनाधार पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है, दलित राजनीति में अपने लिए नई जगह तलाशने की कोशिश कर रही है.

राहुल गांधी का हालिया दलित और संविधान केंद्रित राजनीतिक अभियान भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान 'संविधान बचाओ, आरक्षण बचाओ' जैसे नारों के जरिए कांग्रेस ने दलित समुदाय में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश की थी. ऐसे में कांग्रेस के दो प्रमुख दलित चेहरों का मायावती तक पहुंचने का प्रयास राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस शायद यह संदेश देना चाहती थी कि अगर समाजवादी पार्टी सीट बंटवारे में अत्यधिक आक्रामक रुख अपनाती है, तो उसके पास दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं. यही वजह है कि इस मुलाक़ात को केवल 'व्यक्तिगत पहल' मानने को लेकर राजनीतिक हलकों में संशय बना हुआ है.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष गौतम के मुताबिक, “यह मानना मुश्किल है कि दो इतने वरिष्ठ दलित नेता, जिनमें एक दिल्ली की राजनीति से जुड़े हैं, बिना किसी राजनीतिक संकेत या पूर्व सहमति के मायावती से मिलने चले गए हों. अगर मुलाक़ात हो जाती तो शायद कांग्रेस का रुख अलग होता.”

अखिलेश यादव का ‘403 सीट’ संदेश

कांग्रेस नेताओं की मायावती तक पहुंचने की कोशिश के अगले ही दिन 20 मई को समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने लखनऊ में पार्टी पदाधिकारियों की बैठक बुलाकर जो संदेश दिया, उसे भी राजनीतिक हलकों में इसी घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है. SP मुख्यालय में आयोजित बैठक में अखिलेश यादव ने कहा कि पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर अपने कार्यकर्ताओं को पूरी तरह तैयार कर लिया है. उन्होंने कहा कि पार्टी का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि गठबंधन सहयोगियों को भी बूथ स्तर तक मजबूत संगठनात्मक सहयोग मिले.

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों ने अखिलेश के इस बयान को एक 'सॉफ्ट वार्निंग' की तरह देखा. उनका मानना है कि यह संदेश कांग्रेस समेत संभावित सहयोगियों के लिए था कि SP किसी भी स्थिति में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी भी रखती है. अखिलेश ने कहा, “हमने हमेशा यह माना है कि कोई सीट जीतना, सीटों की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है.” यह बयान सतह पर गठबंधन सहयोग की भावना को दर्शाता है, लेकिन भीतर से यह SP की आत्मनिर्भर चुनावी तैयारी का संकेत भी माना जा रहा है. SP रणनीतिकारों का मानना है कि 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी के मजबूत प्रदर्शन के बाद कांग्रेस की तुलना में SP की राजनीतिक स्थिति कहीं अधिक मजबूत हुई है. ऐसे में सीट बंटवारे में उसका रुख स्वाभाविक रूप से अधिक आक्रामक हो सकता है.

कांग्रेस की दो सूचियां और बढ़ती अटकलें

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा पहले से थी कि कांग्रेस UP विधानसभा चुनाव को लेकर दो स्तरों पर रणनीति बना रही है. जानकारी के मुताबिक UP कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडे ने पार्टी के छह सचिवों से दो सूचियां तैयार करने को कहा था. पहली सूची राज्य की सभी 403 विधानसभा सीटों के लिए संभावित उम्मीदवारों की थी, जबकि दूसरी सूची उन 100 से 120 सीटों की थी जिन्हें कांग्रेस गठबंधन की स्थिति में अपने हिस्से के तौर पर मांग सकती है. इस दोहरी तैयारी ने यह संकेत दिया कि कांग्रेस एक तरफ गठबंधन की संभावना खुली रखना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ वह स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प भी तैयार रख रही है. मायावती से संपर्क की कोशिश ने इसी रणनीति को और ज्यादा विश्वसनीय बना दिया.

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक कांग्रेस यह समझ चुकी है कि UP में केवल SP पर निर्भर रहना उसके लिए दीर्घकालिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है. इसलिए वह BSP समेत दूसरे सामाजिक समीकरणों की संभावनाएं भी तलाश रही है. हालांकि कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि पार्टी लोकसभा चुनाव से पहले भी BSP को इंडिया गठबंधन में शामिल होने का प्रयास कर रही थी लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस का सपा से गठबंधन खतरे में है. नेता के मुताबिक कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि यूपी में वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव सभी विपक्षी दलों को मिलकर एक साथ लड़ना चाहिए.

INDIA गठबंधन के वजूद पर सवाल

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब INDIA गठबंधन के भीतर विभिन्न राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक प्रयोग दिखाई देने लगे हैं. तमिलनाडु में कांग्रेस ने लंबे समय के सहयोगी DMK से दूरी बनाकर TVK नेतृत्व वाले सत्ता गठबंधन का समर्थन किया. वहीं पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस अलग-अलग चुनावी रास्तों पर चलती दिखीं. इन उदाहरणों ने यह धारणा मजबूत की है कि राष्ट्रीय स्तर पर INDIA गठबंधन भले कायम दिखे लेकिन राज्य स्तर पर सभी दल अपने-अपने राजनीतिक हितों के हिसाब से विकल्प खुले रख रहे हैं.

दिलचस्प बात यह रही कि जिस दिन कांग्रेस नेताओं ने मायावती से मिलने की कोशिश की, उसी दिन अखिलेश यादव ने एक कार्यक्रम में कहा था कि 2027 के लिए INDIA गठबंधन पूरी तरह बरकरार है और सीट बंटवारे का आधार केवल 'विनेबिलिटी (जीत की संभावना)' होगा. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गठबंधन राजनीति में सार्वजनिक बयान और अंदरूनी बातचीत अक्सर अलग-अलग दिशा में चलती हैं. ऐसे में कांग्रेस नेताओं का मायावती आवास पहुंचना केवल संयोग नहीं माना जा रहा.

इस पूरे घटनाक्रम में BSP की ओर से कोई औपचारिक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं आई. मायावती ने मुलाक़ात का समय नहीं दिया और पार्टी ने भी इसे लेकर सार्वजनिक बयानबाजी से दूरी बनाए रखी. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक BSP फिलहाल अपने पत्ते खोलने की स्थिति में नहीं है. पार्टी जानती है कि 2027 चुनाव से पहले उसका सामाजिक आधार अभी भी कई दलों के लिए आकर्षण का केंद्र है. ऐसे में मायावती फिलहाल 'रणनीतिक दूरी' बनाए रखने की नीति पर चलती दिख रही हैं. BSP के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर कांग्रेस और SP के बीच सीट बंटवारे को लेकर तनाव बढ़ता है, तो मायावती की राजनीतिक प्रासंगिकता अचानक बढ़ सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि BSP फिलहाल किसी गठबंधन में जल्दबाजी नहीं करेगी. पार्टी संभवतः यह देखना चाहती है कि SP और कांग्रेस के बीच शक्ति संतुलन किस दिशा में जाता है.
SP की सतर्कता, कांग्रेस की मजबूरी

जानकारी के अनुसार समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों ने कांग्रेस नेताओं की इस कोशिश को गंभीरता से लिया लेकिन पार्टी नेतृत्व ने इसे सार्वजनिक विवाद में बदलने से परहेज किया. अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को हल्के अंदाज में लेने की रणनीति अपनाई, ताकि गठबंधन पर खुला टकराव न दिखे. हालांकि SP के भीतर यह समझ जरूर बनी है कि कांग्रेस सीट बंटवारे से पहले अपने राजनीतिक विकल्पों को मजबूत करना चाहती है. इसी वजह से पार्टी संगठन को सभी 403 सीटों पर सक्रिय करने का संदेश दिया गया.

दूसरी तरफ कांग्रेस की चुनौती यह है कि वह UP में अकेले लड़ने की स्थिति में अभी भी मजबूत नहीं दिखती. ऐसे में उसके लिए गठबंधन की राजनीति अनिवार्यता भी है और दबाव की रणनीति भी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में कांग्रेस और SP दोनों सार्वजनिक रूप से गठबंधन की बात करेंगे लेकिन पर्दे के पीछे सीटों और सामाजिक समीकरणों को लेकर कठोर मोलभाव चलता रहेगा.

वहीं मायावती से मुलाक़ात की असफल कोशिश भले किसी ठोस राजनीतिक परिणाम तक नहीं पहुंची, लेकिन इसने एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर दे दिया है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले UP की विपक्षी राजनीति अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है. SP अपनी मजबूत स्थिति का फायदा उठाकर गठबंधन में नेतृत्वकारी भूमिका बनाए रखना चाहती है. कांग्रेस अपने सीमित जनाधार के बावजूद बेहतर सौदेबाज़ी की स्थिति बनाना चाहती है. BSP अभी भी अपने सामाजिक आधार की वजह से एक संभावित किंगमेकर की तरह देखी जा रही है. यानी, 2027 की लड़ाई केवल BJP बनाम विपक्ष नहीं होगी, बल्कि विपक्षी खेमे के भीतर नेतृत्व, सीटों और सामाजिक समीकरणों की लड़ाई भी उतनी ही निर्णायक होगी. कांग्रेस नेताओं का मायावती आवास तक पहुंचना, भले राजनीतिक रूप से नाकाम रहा हो लेकिन उसने यह साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन राजनीति का असली खेल अब शुरू हो चुका है.

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