यूपी में दलित दांव के बाद कांग्रेस का अगला प्लान क्या है?
राजेंद्र पाल गौतम को यूपी प्रभारी बनाकर कांग्रेस ने दलित-OBC समीकरण साधने की शुरुआत की है. लक्ष्य बीजेपी को चुनौती देना और गठबंधन की राजनीति में अपनी ताकत बढ़ाना है

लखनऊ के कांग्रेस प्रदेश मुख्यालय में पिछले कुछ दिनों से बैठकों का सिलसिला तेज है. जिला अध्यक्षों से लेकर संगठन के प्रभारी नेताओं तक को लगातार बुलाया जा रहा है. पार्टी का फोकस सिर्फ संगठन की समीक्षा नहीं बल्कि यह समझना भी है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में दलितों और पिछड़ों के जिस हिस्से ने कांग्रेस और INDIA गठबंधन पर भरोसा जताया था, उसे 2027 के विधानसभा चुनाव तक कैसे बनाए रखा जाए.
इसी बीच 26 जून को कांग्रेस नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश प्रभारी बदलते हुए दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को जिम्मेदारी सौंप दी. गौतम पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष और एक प्रमुख दलित नेता हैं. यह कदम उस घटना के एक दिन बाद उठाया गया जब गौतम ने AICC के OBC विंग के प्रभारी अनिल जयहिंद के साथ लखनऊ में छत्रपति शाहूजी महाराज की जयंती को 'आरक्षण दिवस' के रूप में मनाया था.
पार्टी के भीतर इसे महज संगठनात्मक फेरबदल नहीं बल्कि चुनावी रणनीति का पहला बड़ा संकेत माना जा रहा है. इससे पहले गौतम तब चर्चा में आए थे जब वे 20 मई को बाराबंकी से सांसद तनुज पुनिया के साथ लखनऊ में बीएसपी अध्यक्ष मायावती से मिलने पहुंचे थे. हालांकि इन नेताओं की मुलाकात मायावती से नहीं हो पाई थी.
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "2024 में हमें एहसास हुआ कि संविधान, आरक्षण और सामाजिक न्याय का मुद्दा केवल वैचारिक बहस नहीं बल्कि चुनावी पूंजी भी बन सकता है. अब उसी सामाजिक आधार को संगठन में भी दिखाना जरूरी है." यही वजह है कि ब्राह्मण नेता अविनाश पांडे की जगह दलित समाज से आने वाले राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश जैसा सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य सौंपा गया.
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस आखिरी बार अपने दम पर 1989 से पहले निर्णायक राजनीतिक ताकत थी. उस समय उसकी राजनीति दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम सामाजिक गठबंधन पर टिकी थी. लेकिन मंडल आयोग की राजनीति, राम मंदिर आंदोलन और कांशीराम-मायावती के नेतृत्व में बीएसपी के उभार ने कांग्रेस का सबसे मजबूत सामाजिक आधार छीन लिया. 1991 के बाद पार्टी लगातार कमजोर होती गई. 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 399 सीटों पर उम्मीदवार उतारे लेकिन केवल दो सीटें जीत सकी. उसका वोट शेयर लगभग 2.3 प्रतिशत तक सिमट गया. इसके उलट 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के बाद कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़कर छह सीटें जीत लीं और उसका वोट शेयर लगभग 9.5 प्रतिशत तक पहुंच गया. पार्टी के रणनीतिकार इसी बदलाव को भविष्य की उम्मीद मान रहे हैं.
उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 21 प्रतिशत मानी जाती है. इनमें जाटव सबसे बड़ा समूह है लेकिन पासी, वाल्मीकि, कोरी, धोबी, खटीक और अन्य गैर-जाटव समुदाय भी बड़ी संख्या में हैं. पिछले एक दशक में बीजेपी ने विशेष रूप से गैर-जाटव दलितों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की है. दूसरी ओर बीएसपी का वोट प्रतिशत लगातार घटा है. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी केवल एक सीट जीत सकी, जबकि उसका वोट शेयर करीब 13 प्रतिशत रहा. 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन और कमजोर रहा. कांग्रेस का आकलन है कि बीएसपी के कमजोर होने से दलित राजनीति में एक राजनीतिक खालीपन बना है.
राहुल गांधी की 'संविधान बचाओ' और 'आबादी के अनुपात में अधिकार' की राजनीति उसी खालीपन को भरने का प्रयास है. राजनीतिक विश्लेषक और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुशील पांडेय कहते हैं, "कांग्रेस अब यह स्वीकार कर चुकी है कि केवल सवर्ण नेतृत्व के सहारे उत्तर प्रदेश में वापसी संभव नहीं है. दलित और पिछड़े वर्गों को नेतृत्व में हिस्सेदारी दिए बिना उसका सामाजिक न्याय का संदेश अधूरा रहेगा."
राजेंद्र पाल गौतम की नियुक्ति के एक दिन पहले ही कांग्रेस नेताओं ने लखनऊ में छत्रपति शाहूजी महाराज की जयंती को 'आरक्षण दिवस' के रूप में मनाया. कार्यक्रम में पार्टी के OBC विभाग के नेता भी मौजूद थे. कांग्रेस के भीतर इसे संयोग नहीं बल्कि चुनावी संकेत माना गया. जानकार बताते हैं कि पार्टी का अगला बड़ा कदम किसी प्रभावशाली OBC चेहरे को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाना हो सकता है. इससे कांग्रेस दलित और पिछड़े वर्गों के संयुक्त नेतृत्व का संदेश देना चाहती है. यही वह सामाजिक गठबंधन है जिसे राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर लगातार उठाते रहे हैं.
दिलचस्प यह है कि कांग्रेस की रणनीति केवल बीजेपी से मुकाबले तक सीमित नहीं है. पार्टी के भीतर यह भी माना जा रहा है कि यदि संगठन मजबूत हुआ तो INDIA गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे में उसकी स्थिति मजबूत होगी. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को यूपी में केवल 17 लोकसभा सीटें लड़ने को मिली थीं. विधानसभा चुनाव में यदि वह मजबूत संगठन और बढ़ा हुआ जनाधार दिखा पाती है तो स्वभाविक रूप से अधिक सीटों की दावेदार बनेगी. एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता कहते हैं, "गठबंधन अपनी जगह है, लेकिन राजनीतिक सम्मान संगठन की ताकत से मिलता है. अगले पांच महीने हमारे लिए निर्णायक हैं."
प्रदेश की राजनीति पर नजर रखने वाले कई नेताओं का मानना है कि कांग्रेस अपने पुराने दलित-मुस्लिम समीकरण को नए रूप में पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है. दलित चेहरे के रूप में राजेंद्र पाल गौतम, तनुज पुनिया और मुस्लिम चेहरों में इमरान मसूद और इमरान प्रतापगढ़ी पहले से सक्रिय हैं. पार्टी को उम्मीद है कि यदि दलित और मुस्लिम वोट का एक हिस्सा उसके साथ आता है तथा ब्राह्मण मतदाताओं का सीमित लेकिन प्रभावी समर्थन मिलता है तो वह कई सीटों पर मुकाबले में लौट सकती है.
हालांकि कांग्रेस के लिए यूपी की जमीनी हकीकत अभी भी कुछ कड़वी है. पूर्वांचल के आजमगढ़, जौनपुर और प्रयागराज क्षेत्र में कांग्रेस संगठन अभी भी कमजोर है. बुंदेलखंड में कई जिलों में जिला संगठन सक्रिय नहीं है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सहारनपुर, बिजनौर और मेरठ मंडल में कांग्रेस कुछ इलाकों में सक्रिय दिखती है लेकिन बूथ नेटवर्क बीजेपी और समाजवादी पार्टी की तुलना में बहुत कमजोर है.
लखनऊ में राजनीति विज्ञान विभाग के शिक्षक आशुतोष गौतम कहते हैं, "चेहरा बदलने से चुनाव नहीं जीते जाते. यदि अगले चार महीनों में बूथ कमेटियां नहीं बनीं, जिला संगठन सक्रिय नहीं हुआ और पंचायत स्तर तक कार्यकर्ता नहीं पहुंचे तो यह बदलाव केवल प्रतीकात्मक रह जाएगा."
हालांकि कांग्रेस अभी भी बीएसपी की और दोस्ती का हाथ बढ़ाए हुए है. राजेंद्र पाल गौतम ने हाल ही में मायावती के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि वे दलित समाज की बड़ी नेता हैं और जब भी अवसर मिलेगा, उनसे मुलाकात करेंगे. कांग्रेस नेतृत्व इसे गठबंधन का औपचारिक प्रस्ताव नहीं मानता, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे भविष्य के विकल्प खुले रखने की रणनीति मान रहे हैं. सुशील पांडेय कहते हैं, "बीएसपी आज भले कमजोर दिख रही हो, लेकिन उसका सामाजिक आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. कांग्रेस इस आधार को अपने पक्ष में लाना चाहती है. इसलिए वह टकराव की जगह सम्मान की भाषा का इस्तेमाल कर रही है." इसके अलावा कांग्रेस यह भी दिखाना चाहती है कि यूपी में दलित मतदाताओं के लिए सपा ही नहीं वह भी एक बड़ी विकल्प है.
सितंबर 2022 में कांग्रेस में शामिल होने से लेकर जून 2025 में AICC SC विंग के चेयरमैन बनने और जून 2026 में राजनीतिक रूप से अहम UP का इंचार्ज बनने तक, पार्टी के अंदर राजेंद्र गौतम का तेज़ी से आगे बढ़ना चर्चा का विषय रहा है. राजेंद्र पाल गौतम के सामने चुनौती केवल कांग्रेस का संदेश फैलाने की नहीं, बल्कि निष्क्रिय इकाइयों को सक्रिय कर टिकट वितरण का खाका तैयार करना है और कार्यकर्ताओं व मतदाताओं में यह भरोसा पैदा करना है कि कांग्रेस वास्तव में चुनाव लड़ने आई है.