नक्सल दौर के विस्थापित आदिवासी ईसाई हैं इसलिए गांव वापस नहीं जा सकते!

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जिला रहे सुकमा में सालों पहले विस्थापित हुए आदिवासी परिवारों को उनके मूल गांव के लोग इसलिए वापस नहीं आने दे रहे क्योंकि ये ईसाई हैं

Displaced Christian Tribals in Chhattisgarh Barred From Returning to Native Village
विस्थापित आदिवासी परिवारों के साथ सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी

छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम और नक्सल हिंसा के दौर में अपना घर-बार छोड़ने को मजबूर हुए 52 आदिवासी परिवारों के 301 ग्रामीणों ने एक बार फिर अपने मूल गांव लौटने की गुहार लगाई है. 21 मई को इन विस्थापित ग्रामीणों ने सुकमा जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा और अपनी जमीन व समाज के बीच दोबारा बसने की मांग की है. हालांकि इस बार गांव वापसी की राह में नक्सली खौफ नहीं, बल्कि धर्म परिवर्तन से उपजा सामाजिक विवाद आड़े आ रहा है.

विस्थापित ग्रामीणों के अनुसार, सलवा जुडूम के दौरान उन्हें सुकमा के मिलमपल्ली गांव से पलायन कर आंध्र प्रदेश के लक्ष्मीपुरम और अन्य सीमावर्ती इलाकों में शरण लेनी पड़ी थी. अब जब क्षेत्र में हालात सामान्य हो रहे हैं तो वे अपने घर लौटना चाहते हैं. लेकिन मिलमपल्ली गांव के कुछ स्थानीय ग्रामीणों ने उनके सामने दोबारा आदिवासी समाज में शामिल होने की शर्त रख दी है.

आरोप है कि इन परिवारों 1997 के आसपास ईसाई धर्म अपना लिया था जिसके कारण अब गांव का एक धड़ा इन्हें अपनाने का विरोध कर रहा है और मसीही धर्म छोड़ने का दबाव बना रहा है.

इस बीच बस्तर की जानी-मानी आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता सोनी सोरी ने इस संवेदनशील मामले में मध्यस्थता की पहल की है. उन्होंने विस्थापित परिवारों से मुलाकात कर उनके अधिकारों का समर्थन किया है और जल्द ही वे मिलमपल्ली गांव जाकर दूसरे पक्ष से भी बातचीत करेंगी, ताकि कोई शांतिपूर्ण समाधान निकाला जा सके.

पूरे प्रकरण पर सोनी सोरी कहती हैं, “मुझे 15 दिन पहले इस मामले की जानकारी मिली. इसके बाद मैं विस्थापित लोगों के साथ जिला कलेक्टर से मिलने गई. कलेक्टर तो नहीं मिले, मैंने उनके जूनियर अधिकारी को पूरी बात बताई, ताकि इस प्रकरण को शांतिपूर्वक निपटाया जा सके. शुरूआत में तो संबंधित अधिकारी ने बहुत उत्साहित होकर कहा कि वे उन्हें बसाएंगे, लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि ये सभी क्रिश्चियन हैं, इसी वजह से उनका विरोध हो रहा है तब उक्त अधिकारी के स्वर भी नरम पड़ गए.”

जमीन मूल वजह, धर्म तो बस बहाना है!

विस्थापितों में से एक सोड़ी पेंटा ने बताया, “गांव वालों का कहना है कि हम पहले आदिवासी थे और अब क्रिश्चियन बन गए हैं. हमें अपना धर्म त्यागना होगा तभी अपनाएंगे. लेकिन सच्चाई यह है कि हम सभी 52 परिवारों के लोग 1997-98 में ही धर्म परिवर्तन कर चुके थे. वह भी अपने ही गांव में. उस वक्त हमारे इसी गांव में चर्च भी था. ऐसे में इस आधार पर कि गांव से पलायन के बाद धर्म परिवर्तन किया गया है, गांव में न बसने देना गलत दावा है.”

एक अन्य विस्थापित मड़कम नंगा ने कहा, “चूंकि यह हमारा अपना गांव है तो जाहिर तौर पर हमारी जमीन भी इसी गांव में है. किसी के पास दो एकड़, किसी के पास पांच तो किसी के दस एकड़ जमीन है. अगर हम अपने गांव में दोबारा बसते हैं तो फिलहाल इस जमीन पर काबिज लोगों को इसे छोड़ना होगा. इसलिए इन सबके बीच में धर्म को लाया जा रहा है. मुझे लगता है मूल कारण हमारी जमीन है.”

पीड़ित परिवारों में से एक कंगला एरियाह कहते हैं, “हमारा गांव अब नक्सल प्रभावित नहीं रहा. हम इस दिन का सालों से इंतजार कर रहे थे. कौन अपना घर छोड़ना चाहता है. गांव वापसी के लिए हम बीते दो महीने में कई बार कलेक्टर से मिलने आए लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी. ऐसे में सोनी सोरी हमारी मदद के लिए आगे आई हैं. हमें उम्मीद है जिला प्रशासन भी हमें गांव में बसाने में मदद करेगा.”

सोनी सोरी एक बार फिर कहती हैं, “पहले ये नक्सल और नक्सल अभियान से पीड़ित हुए, इसके बाद सलवा जुडूम का कहर इन पर बरपा और अब ईसाई होने पर इन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है. मैं गांव जा रही हूं. वहां सभी से बात करूंगी. असल बात यह है कि कभी नक्सल से, कभी कंपनियों से, कभी सरकार से, कभी धर्म से, क्या हम बस्तर के आदिवासी केवल लड़ते रहेंगे? आखिर कब तक इन लड़ाइयों में फंसकर आने वाली पीढ़ी का भविष्य दांव पर लगाते रहेंगे?”

इस दौरान यह भी गौर करने वाली बात है कि छत्तीसगढ़ में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा और अपमान के मामले लगातार सामने आ रहे हैं. ईसाइयों के अधिकारों के लिए काम कर रही संस्था यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम के अनुसार, 2025 में जनवरी से नवंबर के बीच ईसाई समुदाय के खिलाफ 700 से अधिक घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिनमें से करीब 48 प्रतिशत मामले केवल दो राज्यों, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ से सामने आए हैं. फोरम के मुताबिक 2025 में छत्तीसगढ़ राज्य में ईसाई समुदाय के लोगों के अंतिम संस्कार से जुड़े 19 विवाद सामने आए, जबकि 2024 में ऐसे करीब 30 मामले दर्ज किए गए थे.

इसी साल पास हुआ धर्मांतरण कानून

इसी साल 19 मार्च को छत्तीसगढ़ विधानसभा ने ‘धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026’ को ध्वनि मत से पारित किया था. विधेयक के मुताबिक छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026 का उद्देश्य बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी या गलत जानकारी के जरिए कराए जाने वाले धर्मांतरण को रोकना है. विधेयक में सजा के प्रावधान भी कड़े किए गए हैं. अवैध धर्मांतरण के मामलों में सात से दस साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है. महिलाओं, नाबालिगों और अनुसूचित जाति, जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों से जुड़े मामलों में सजा 10 से 20 साल तक हो सकती है.

लेकिन इस मामले में लोग 25 साल से भी अधिक समय पहले ईसाई धर्म अपना चुके हैं. ऐसे में इन्हें इनके हक से दूर करना कानूनन तो गलत ही है. जाहिर है, यह मामला अब केवल पुनर्वास का न रहकर संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक संघर्ष का रूप ले चुका है. भारतीय संविधान के तहत हर नागरिक को अपनी पसंद के धर्म को मानने की आजादी है, जिसके चलते इस विवाद ने कानूनी और मानवीय बहस को जन्म दे दिया है.

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