चंद्रशेखर का 'तीसरा मोर्चा’ बिगाड़ सकता है विपक्ष का खेल!

पश्चिमी यूपी में दलित-मुस्लिम-अति पिछड़ा समीकरण साधने में जुटे चंद्रशेख्रर आजाद सपा-BSP के असंतुष्ट नेताओं को साथ लाकर 2027 से पहले विपक्ष की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं

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आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर (फाइल फोटो)

पिछले लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की नगीना सीट से जीत हासिल करने के बाद आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) यानी ASP के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद अब सिर्फ एक सांसद भर नहीं रह गए हैं. वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में उस नए सामाजिक-राजनीतिक समीकरण की तलाश कर रहे हैं जो दलित, मुस्लिम और अति पिछड़ा वर्ग को एक साझा मंच पर ला सके.

पश्चिमी यूपी में उनकी लगातार बढ़ती सक्रियता ने समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (BSP) और कांग्रेस, तीनों की चिंता बढ़ा दी है. मेरठ में 14 मई को आयोजित कार्यक्रम ने इस बात के स्पष्ट संकेत दिए कि आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) अब केवल आंदोलनकारी संगठन नहीं बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव के लिए गंभीर राजनीतिक दावेदार बनने की तैयारी में है.

मेरठ के गुरुकुल गार्डन में आयोजित कार्यक्रम में चंद्रशेखर ने जिस तरह सपा और BSP से आए नेताओं को पार्टी में शामिल कराया, उसने पश्चिमी यूपी की राजनीति में हलचल पैदा कर दी. समाजवादी छात्रसभा के राष्ट्रीय महासचिव बाबर चौहान खरदौनी, BSP नेता तौफीक इलाही, हाजी नूर सैफी, हारून अहमद जैसे चेहरे सिर्फ संगठनात्मक विस्तार का हिस्सा नहीं हैं बल्कि वे अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले नेता हैं. यही वजह है कि इस घटनाक्रम को राजनीतिक विश्लेषक पश्चिमी यूपी में 'तीसरे मोर्चे के उभार' के रूप में देख रहे हैं.

मेरठ से दिया बड़ा राजनीतिक संदेश

मेरठ की सभा में चंद्रशेखर ने साफ कहा कि उनकी पार्टी प्रदेश की सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. उनका यह बयान केवल राजनीतिक घोषणा नहीं था बल्कि विपक्षी दलों के लिए चेतावनी भी थी. उन्होंने कहा, “जो नगीना में हुआ, वह मेरठ में भी हो सकता है.” यह बयान दरअसल उस सामाजिक गठजोड़ की ओर इशारा था जिसके दम पर उन्होंने नगीना में जीत दर्ज की थी. और अगले विधानसभा चुनाव में मेरठ में भी दोहराया जा सकता है.

सभा में उन्होंने युवाओं को आगे लाने का जिक्र करते हुए कहा कि संघर्षशील लोगों को अवसर दिया जाएगा, चाहे वे कम उम्र के हों या अधिक. यह संदेश सीधे तौर पर उन युवाओं और स्थानीय नेताओं को आकर्षित करने की कोशिश है जो बड़ी पार्टियों में खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. चंद्रशेखर लगातार यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं कि सपा, BSP और कांग्रेस अब 'पुराने नेतृत्व' की पार्टियां बन चुकी हैं, जबकि ASP नई पीढ़ी की राजनीति का मंच है.

सपा और BSP में सेंध

मेरठ में जिन चेहरों को ASP में शामिल कराया गया, वे महज कार्यकर्ता नहीं हैं. इनमें से अधिकांश लोग विधानसभा टिकट की आकांक्षा रखते हैं. बाबर चौहान खरदौनी लंबे समय से किठौर सीट से सपा टिकट की उम्मीद लगाए हुए थे. लेकिन वहां पूर्व मंत्री शाहिद मंजूर की मजबूत दावेदारी के चलते उन्हें अवसर मिलता नहीं दिख रहा था. यही स्थिति BSP के कई नेताओं की भी रही जिन्हें टिकट की उम्मीद थी लेकिन पार्टी में जगह सीमित थी.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि चंद्रशेखर उन नेताओं को मंच दे रहे हैं, जिन्हें मुख्य विपक्षी दलों में जगह नहीं मिल रही. इससे ASP को जमीनी स्तर पर तैयार संगठन और स्थानीय नेटवर्क दोनों मिल रहे हैं. पश्चिमी यूपी के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अरविंद कुमार कहते हैं, “चंद्रशेखर की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे राजनीतिक रूप से निराश नेताओं को नई उम्मीद दे रहे हैं. यह वही रणनीति है, जिससे कभी कांशीराम ने BSP का विस्तार किया था.”

मुस्लिम-दलित समीकरण पर फोकस

पश्चिमी यूपी की राजनीति लंबे समय से मुस्लिम-जाट, मुस्लिम-दलित और जाटव वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती रही है. सपा जहां मुस्लिम-यादव समीकरण पर निर्भर है, वहीं BSP की ताकत जाटव वोट रहे हैं. लेकिन चंद्रशेखर इस पूरी राजनीति में नया समीकरण खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. मेरठ में पार्टी में शामिल हुए अधिकांश चेहरे मुस्लिम समुदाय से हैं. किठौर से बाबर चौहान, सरधना से तौफीक इलाही और हारून अहमद, दक्षिण सीट से हाजी नूर सैफी जैसे नाम बताते हैं कि ASP पश्चिमी यूपी में मुस्लिम नेतृत्व को जगह देकर सपा के आधार में सेंध लगाने की तैयारी कर रही है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम मतदाता फिलहाल BJP को हराने की क्षमता के आधार पर मतदान करते हैं और यही वजह है कि सपा को उनका बड़ा समर्थन मिलता रहा है. लेकिन अगर ASP कुछ सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारने में सफल रही और दलित वोटों का एक हिस्सा उसके साथ गया तो मुस्लिम मतदाताओं का एक तबका भी उसके साथ जा सकता है. मेरठ के वरिष्ठ वकील शाहिद अली कहते हैं, “पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोट हमेशा रणनीतिक रहा है. अगर किसी सीट पर ASP मजबूत दिखती है, तो मुस्लिम मतदाता वहां उसके साथ जा सकते हैं. यही सपा की सबसे बड़ी चिंता है.”

BSP की खाली होती जमीन पर नजर

चंद्रशेखर की राजनीति का सबसे बड़ा लक्ष्य BSP के कमजोर होते आधार को कब्जाना माना जा रहा है. पिछले कुछ चुनावों में BSP का वोट प्रतिशत लगातार गिरा है. जाटव समाज का एक बड़ा युवा वर्ग अब मायावती की राजनीति से दूरी बनाता दिख रहा है. यही वर्ग चंद्रशेखर की आक्रामक शैली और सड़क की राजनीति से प्रभावित है. मेरठ, सहारनपुर और बिजनौर जैसी जगहों पर चंद्रशेखर की रैलियों में उमड़ रही भीड़ ने यह संकेत दिया है कि दलित युवाओं में उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है.

खासकर भीम आर्मी के दौर से जुड़े युवा उन्हें संघर्षशील नेता के रूप में देखते हैं. एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता मानते हैं कि विपक्ष के पास दलित समाज से ऐसा चेहरा नहीं है जो युवाओं को बड़े स्तर पर आकर्षित कर सके. उनके मुताबिक, “राहुल गांधी के संविधान बचाओ अभियान का असर 2024 में दिखा, लेकिन अगर 2027 में दलित वोटों के सामने चंद्रशेखर जैसा विकल्प होगा तो समीकरण बदल सकते हैं.”

इंडिया गठबंधन के लिए चुनौती

चंद्रशेखर लगातार यह कह रहे हैं कि विपक्ष का अस्तित्व केवल चुनावी समझौतों तक सीमित हो गया है. उन्होंने हाल में कहा कि “अगर किसी को BJP को हराने के लिए हमारी जरूरत है, तो उसे हमारे पास आकर बात करनी चाहिए.” यह बयान बताता है कि वे खुद को छोटे सहयोगी की भूमिका में नहीं बल्कि निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते हैं.

समाजवादी पार्टी के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद हैं. पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि ASP से गठबंधन दलित वोटों को जोड़ सकता है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व फिलहाल इस दिशा में उत्साहित नहीं दिखता. इसकी बड़ी वजह यह है कि गठबंधन की स्थिति में सीटों का बंटवारा और नेतृत्व का सवाल जटिल हो जाएगा. सपा के एक वरिष्ठ नेता का मानना है कि चंद्रशेखर की वैचारिक स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. उनके मुताबिक, “दलित मतदाता भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ सकते हैं लेकिन चुनाव में वही पार्टी चुनते हैं जो BJP को हराने की स्थिति में हो.”

पश्चिमी यूपी में क्यों असरदार हो सकती है ASP

पश्चिमी यूपी सामाजिक रूप से बेहद जटिल इलाका है. यहां दलित और मुस्लिम आबादी कई सीटों पर निर्णायक है. सहारनपुर, बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, अमरोहा और मुरादाबाद मंडल की कई सीटों पर अगर दलित-मुस्लिम वोट एक साथ आएं, तो चुनावी परिणाम बदल सकते हैं. नगीना लोकसभा सीट पर चंद्रशेखर की जीत ने यह साबित किया कि अगर दलित और मुस्लिम मतदाता एकजुट हों तो BJP और सपा दोनों को चुनौती दी जा सकती है. अब ASP उसी मॉडल को विधानसभा स्तर पर लागू करने की कोशिश कर रही है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, ASP कम से कम 100 अति पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है. इसके अलावा सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवारों को उतारने की योजना बनाई जा रही है. इसका उद्देश्य यह संदेश देना है कि पार्टी केवल दलितों की नहीं, बल्कि वंचित तबकों की साझा राजनीतिक ताकत बनना चाहती है.

संगठन विस्तार और बूथ स्तर की तैयारी

ASP अब आंदोलन से आगे बढ़कर संगठन खड़ा करने में जुटी है. पार्टी नेताओं का दावा है कि जिला, विधानसभा, मंडल और बूथ स्तर तक ढांचा तैयार किया जा चुका है. जून से शुरू होने वाला घर-घर अभियान इसी रणनीति का हिस्सा है.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर ASP बूथ स्तर पर मजबूत नेटवर्क बना लेती है, तो उसका प्रभाव केवल वोट काटने तक सीमित नहीं रहेगा. वह कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकती है. मेरठ विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर विवेक नौटियाल कहते हैं, “अभी ASP को हल्के में लेना भूल होगी. पश्चिमी यूपी में उसका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है. अगर पार्टी ने अगले डेढ़ साल में मजबूत संगठन खड़ा कर लिया, तो वह कई सीटों पर चुनाव त्रिकोणीय बना सकती है.”

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चंद्रशेखर वास्तव में सत्ता की दौड़ में होंगे या सिर्फ विपक्षी वोटों का बंटवारा करेंगे? फिलहाल राजनीतिक विश्लेषकों की राय बंटी हुई है. कुछ मानते हैं कि ASP का असर सीमित रहेगा क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति अभी भी बड़े दलों के इर्द-गिर्द घूमती है. लेकिन दूसरी राय यह है कि अगर BSP और कमजोर हुई और सपा दलित नेतृत्व का मजबूत चेहरा खड़ा नहीं कर पाई, तो ASP तेजी से उभर सकती है.

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