क्या विधानसभा चुनाव में गेमचेंजर बनेगी योगी सरकार की ‘लखपति दीदी’ योजना?
लखपति दीदी योजना का लक्ष्य एक करोड़ करने के फैसले के बाद योगी सरकार इसे महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मॉडल के रूप में पेश कर रही है

बिजनौर के देवमल ब्लॉक के फिरोजपुर नरोत्तम गांव में रितु हर सुबह जब ‘विदुर कैफे’ का शटर उठाती हैं, तो यह सिर्फ एक छोटे उद्यम की शुरुआत नहीं होती, बल्कि ग्रामीण उत्तर प्रदेश में बदलती सामाजिक-आर्थिक हकीकत की झलक भी होती है. कुछ साल पहले तक रितु का परिवार पति की दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर था. आमदनी अनिश्चित थी, भविष्य धुंधला.
आज वही रितु रोजाना छह से सात हजार रुपये तक कमा रही हैं, गांव की दूसरी महिलाओं को रोजगार दे रही हैं और खुद को “लाभार्थी” नहीं, “उद्यमी” कहती हैं. रितु की कहानी अपवाद नहीं, बल्कि योगी सरकार के ‘लखपति दीदी’ मॉडल का वह चेहरा है, जिसे सरकार अब प्रदेशव्यापी राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की धुरी मानकर आगे बढ़ा रही है. सवाल यही है कि क्या यह मॉडल 2027 के विधानसभा चुनाव में सचमुच गेमचेंजर साबित हो सकता है.
योजना क्या है और यहां तक कैसे पहुंची
उत्तर प्रदेश में ‘लखपति दीदी’ कार्यक्रम राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत चल रहा है. इसका मकसद है स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जुड़ी महिलाओं की सालाना आय एक लाख रुपये से ऊपर ले जाना. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में इसे महज कल्याण योजना नहीं, बल्कि आजीविका और उद्यमिता का मॉडल बनाया गया. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नवंबर 2025 तक प्रदेश की 18.56 लाख महिलाएं लखपति बन चुकी हैं. यानी वे लगातार एक लाख रुपये से ज्यादा की सालाना आय अर्जित कर रही हैं. कुल 35.94 लाख महिलाओं की पहचान की गई है, जिनमें से 29.68 लाख का आय विवरण डिजिटल आजीविका रजिस्टर में दर्ज है.
केंद्र सरकार ने 2026-27 तक देशभर में दो करोड़ SHG सदस्यों को लखपति बनाने का लक्ष्य रखा है, जिसमें उत्तर प्रदेश का हिस्सा 28.92 लाख तय किया गया है. लेकिन 28 जनवरी को लखनऊ के योजना भवन में हुई समीक्षा बैठक ने इस योजना को नए स्तर पर पहुंचा दिया. उपमुख्यमंत्री और ग्राम्य विकास मंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने साफ कहा कि राज्य ने अब अपना लक्ष्य और बड़ा कर दिया है. “हमने 30 लाख लखपति दीदी बनाने का लक्ष्य लगभग हासिल कर लिया है. अब इसे बढ़ाकर एक करोड़ करने का फैसला किया गया है.”
मौर्य ने आगे यह भी जोड़ा कि हर जिले में 100 “करोड़पति दीदी” तैयार करने का निर्देश CDOs को दिया गया है. इस पूरी कवायद में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की भूमिका अहम मानी जा रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौर्य लंबे समय से ओबीसी और ग्रामीण वोटबेस में मजबूत पकड़ के लिए जाने जाते हैं. लखपति दीदी मॉडल उसी आधार को और मजबूत करता है. ग्राम्य विकास विभाग सीधे तौर पर NRLM और SHG नेटवर्क को संभालता है.
संख्या बढ़ाने का फैसला और उसका राजनीतिक अर्थ
लक्ष्य को एक करोड़ तक ले जाना सिर्फ प्रशासनिक घोषणा नहीं है. यह संकेत है कि सरकार इस मॉडल को आने वाले चुनावी वर्षों में अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करने की तैयारी में है. उत्तर प्रदेश में करीब 98.49 लाख ग्रामीण परिवारों की महिलाएं 8.96 लाख स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं. ये समूह 62,958 ग्राम संगठनों के जरिए काम कर रहे हैं. महिला कल्याण की दिशा में कार्य कर रहीं सुमन रावत बताती हैं, “ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की यह भागीदारी सीधे तौर पर परिवार, पंचायत और गांव के सामाजिक ढांचे को प्रभावित कर रही है.” इटावा के भतोरा गांव की मंत्रवती शाक्य इसका उदाहरण हैं. आठवीं तक पढ़ी मंत्रवती आज स्ट्रॉबेरी, ड्रैगनफ्रूट और रागी की खेती से सालाना करीब तीन लाख रुपये तक कमा रही हैं. वे कहती हैं, “पहले खेती का मतलब सिर्फ गुजारा था. आज खेती से सम्मान और स्थायी आमदनी दोनों मिल रहे हैं.”
सरकार का दावा है कि कृषि, पशुपालन, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और सेवा क्षेत्र में महिलाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें बाजार से जोड़ा जा रहा है. बैंक क्रेडिट, रिवॉल्विंग फंड और तकनीकी मार्गदर्शन को साथ जोड़कर यह मॉडल तैयार किया गया है.
हालांकि यह बदलाव वहां ज्यादा मुखर है जहां जहां SHG नेटवर्क मजबूत है. वहां महिलाओं की भूमिका घर से बाहर निकलकर पंचायत और सामुदायिक फैसलों तक पहुंच रही है. कई जिलों में लखपति दीदियां ग्राम सभाओं में खुलकर बोल रही हैं, स्कूल, स्वास्थ्य और राशन से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठा रही हैं. राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़े एक अधिकारी बताते हैं, “पहले महिलाएं बैंक या ब्लॉक ऑफिस जाने में हिचकती थीं. अब वे खुद फाइल लेकर आती हैं, योजना समझती हैं और हिसाब मांगती हैं.” 26 जनवरी को दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड में उत्तर प्रदेश की 14 लखपति दीदियों को विशेष अतिथि के रूप में बुलाया जाना भी इसी प्रतीकात्मक राजनीति का हिस्सा है. सरकार ने इसे “आत्मनिर्भर नारी, समृद्ध गांव” के संदेश के रूप में प्रचारित किया.
पंचायत और विधानसभा चुनाव पर क्या असर हो सकता है
उत्तर प्रदेश में महिला मतदाता अब निर्णायक भूमिका में हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदान प्रतिशत कई जिलों में पुरुषों से ज्यादा रहा. पंचायत चुनावों में भी महिला आरक्षण के चलते उनकी भागीदारी बढ़ी है. लखपति दीदी मॉडल सीधे तौर पर इसी वर्ग को संबोधित करता है. सुमन रावत कहती हैं, “यह योजना लाभार्थी राजनीति से आगे जाकर 'अनुभव आधारित समर्थन' तैयार करती है. जब किसी महिला की आमदनी, सामाजिक हैसियत और आत्मविश्वास बढ़ता है, तो उसका असर पूरे परिवार के वोटिंग व्यवहार पर पड़ता है.” लखनऊ के प्रतिष्ठित अवध गर्ल्स डिग्री कालेज की प्राचार्य बीना राय बताती हैं, “BJP की यह रणनीति केवल महिला वोट नहीं, बल्कि परिवार यूनिट को टारगेट करती है. ग्रामीण इलाकों में यह काफी प्रभावी हो सकती है.”
हालांकि विपक्ष इस मॉडल को लेकर सवाल भी उठा रहा है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का कहना है कि सरकार आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है. विपक्षी नेताओं का तर्क है कि एक लाख रुपये की आय स्थाई नहीं है और कई मामलों में यह अस्थायी गतिविधियों पर आधारित है. समाजवादी पार्टी महिला सभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष जूही सिंह कहती हैं, “सरकार यह नहीं बताती कि कितनी महिलाएं लगातार तीन साल तक लखपति बनी हुई हैं. महंगाई के दौर में एक लाख रुपये सालाना कोई बड़ी रकम नहीं रह गई है.” इसके अलावा, बाजार तक पहुंच, कच्चे माल की कीमत और स्थानीय मांग जैसे मुद्दे भी कई जगह चुनौती बने हुए हैं. कुछ जिलों में SHG उत्पादों की बिक्री सीमित बाजार तक सिमट जाती है, जिससे आय टिकाऊ नहीं रह पाती.
सरकार इन आलोचनाओं को खारिज करती है. अधिकारियों का कहना है कि लक्ष्य सिर्फ एक साल की आय नहीं, बल्कि लगातार तीन वर्षों तक न्यूनतम एक लाख रुपये सालाना आमदनी सुनिश्चित करना है. इसके लिए चार तिमाही और फसल चक्र आधारित मूल्यांकन किया जा रहा है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कई मंचों से कह चुके हैं कि “महिलाएं अब योजनाओं की लाभार्थी नहीं, विकास की भागीदार हैं.” सरकार का दावा है कि तकनीक, मार्केट लिंकेज और प्रशिक्षण के जरिए इस मॉडल को टिकाऊ बनाया जा रहा है.
तो सवाल वही है, क्या लखपति दीदी मॉडल विधानसभा चुनाव में गेमचेंजर बन सकता है. जवाब पूरी तरह हां या ना में नहीं है. यह मॉडल उन इलाकों में जरूर असर डालेगा जहां SHG नेटवर्क मजबूत है और महिलाओं को वास्तविक आय में बढ़ोतरी दिखी है. वहां सरकार का नैरेटिव जमीन से जुड़ा नजर आता है. लेकिन जहां यह योजना सिर्फ कागजी लक्ष्य बनकर रह गई, वहां विपक्ष के सवाल असर कर सकते हैं. वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले होने वाले पंचायत चुनाव इस मॉडल की पहली बड़ी परीक्षा होंगे.