यूपी में जनजातीय आभूषणों के संरक्षण पर जोर; योगी सरकार की यह पहल क्या रोजगार भी दे पाएगी?

जनजातीय आभूषणों और बर्तनों के संरक्षण के जरिए योगी सरकार सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक सम्मान और रोज़गार को जोड़ने की कोशिश कर रही है

Tribal women (AI Image)
सांकेतिक तस्वीर (AI)

उत्तर प्रदेश जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान ने प्रदेश की जनजातीय पहचान को पुनर्जीवित करने की कई अनोखी पहल शुरू की है. थारू, बुक्सा, गोंड, बैगा, अगरिया, खरवार जैसी जनजातियों के पारंपरिक आभूषणों और बर्तनों का संरक्षण करते हुए यह संस्थान उस विरासत को सहेज रहा है, जो तेज़ी से आधुनिकता, बाज़ार के दबाव और उपेक्षा के बीच खोती जा रही थी. संस्थान के पास फिलहाल 500 से अधिक दुर्लभ आभूषण और बर्तन संरक्षित किए गए हैं, जिन्हें जनजातीय समाज के इतिहास, जीवनशैली और कला-कौशल का सजीव दस्तावेज़ माना जा रहा है.

लेकिन यहीं से पहला सवाल खड़ा होता है कि इन 500 से अधिक धरोहरों का चयन कैसे हुआ और क्या इसमें प्रदेश की सभी जनजातियों को समान प्रतिनिधित्व मिला है. संस्थान से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह संग्रह फील्ड सर्वे, स्थानीय जनजातीय प्रतिनिधियों और विशेषज्ञों की सलाह से तैयार किया गया है. हालांकि, ज़मीनी स्तर पर देखने पर यह स्पष्ट होता है कि थारू, बुक्सा और अगरिया जैसी जनजातियों की उपस्थिति अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि कुछ छोटी और कम चर्चित जनजातियां अब भी हाशिये पर दिखाई देती हैं. 

मानवविज्ञान से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर इस असंतुलन को समय रहते नहीं सुधारा गया, तो संरक्षण की यह पहल पूरी तरह समावेशी होने का दावा कमजोर कर सकती है. योगी आदित्यनाथ सरकार की रणनीति जनजातीय संस्कृति को केवल संग्रहालयों और अलमारियों तक सीमित रखने की नहीं है. इसके पीछे एक व्यापक सोच काम कर रही है, जिसमें सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक सम्मान और आर्थिक सशक्तिकरण को एक-दूसरे से जोड़ा गया है.

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संस्थान के निदेशक अतुल द्विवेदी बताते हैं कि जनजातीय आभूषण केवल सजावट की वस्तु नहीं हैं. ये आभूषण सामाजिक संरचना, धार्मिक विश्वास और जीवन के अहम पड़ावों से जुड़े होते हैं. हंसली, पायल, करधनी, कड़े, झुमकी या मंगलसूत्र, हर आभूषण का अपना सांस्कृतिक संदर्भ है. ये पूरी तरह हस्तनिर्मित होते हैं और इनके निर्माण में गिलेट या गोटा चांदी, पुराने सिक्के, तांबा, पीतल, लकड़ी, हड्डी और सीप जैसी सामग्रियों का इस्तेमाल होता है. यह शिल्प पीढ़ियों से चले आ रहे ज्ञान और अनुभव का नतीजा है.

संरक्षण के साथ-साथ सरकार इन कलाओं को रोज़गार से जोड़ने की दिशा में भी काम कर रही है. जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान के जरिए शिल्पकारों को प्रशिक्षण, प्रदर्शनियों और बाज़ार से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. पारंपरिक आभूषणों को हल्के आधुनिक डिज़ाइन के साथ तैयार किया जा रहा है, ताकि युवा पीढ़ी उन्हें एथनिक के साथ-साथ वेस्टर्न पहनावे में भी अपना सके. हालांकि, यहीं से पड़ताल का तीसरा अहम बिंदु सामने आता है कि क्या आधुनिकता के इस प्रयास में मूल सांस्कृतिक स्वरूप सुरक्षित रह पा रहा है? कई सांस्कृतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि सीमित और सोच-समझकर किए गए बदलाव स्वीकार्य हैं, लेकिन बाज़ार की मांग के दबाव में अगर पारंपरिक प्रतीकों और तकनीकों से समझौता हुआ, तो जनजातीय पहचान को नुकसान पहुंच सकता है. कुछ जनजातीय प्रतिनिधियों का भी कहना है कि डिज़ाइन में बदलाव करते समय समुदाय की सहमति और भागीदारी बेहद ज़रूरी है, ताकि यह प्रक्रिया थोपे गए बदलाव की तरह न लगे.

आर्थिक लाभ को लेकर भी तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं है. सरकार का दावा है कि प्रदर्शनियों, मेलों और महोत्सवों के जरिए जनजातीय शिल्पकारों की आय बढ़ी है. लखनऊ और गोरखपुर में आयोजित प्रदर्शनियों में थारू और बुक्सा जनजाति के आभूषणों की अच्छी मांग देखने को मिली. एक केस स्टडी के तौर पर लखीमपुर खीरी की थारू जनजाति की महिला शिल्पकार सरस्वती देवी बताती हैं कि पहले उनके बनाए आभूषण केवल स्थानीय मेलों तक सीमित रहते थे. अब सरकारी प्रदर्शनियों के जरिए उन्हें बेहतर दाम और पहचान दोनों मिल रही है. उनके अनुसार, पिछले दो साल में उनकी आमदनी लगभग दोगुनी हुई है. हालांकि, लखीमपुर खीरी और सोनभद्र जैसे इलाकों में किए गए स्थानीय अध्ययन यह भी बताते हैं कि यह आर्थिक लाभ अभी सीमित परिवारों तक ही पहुंचा है. बड़ी संख्या में जनजातीय शिल्पकार ऐसे हैं, जो अब भी इन आयोजनों और बाज़ार से सीधे नहीं जुड़ पाए हैं. इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह पहल व्यापक स्तर पर रोज़गार का साधन बन पा रही है या फिलहाल कुछ चुनिंदा समूहों तक सीमित है? 

आभूषणों के साथ-साथ जनजातीय बर्तनों का संरक्षण भी सरकार की प्राथमिकता में शामिल है. थारू, बुक्सा, अगरिया, खरवार और सोनभद्र क्षेत्र की जनजातियों के पीतल, तांबे और मिट्टी के बर्तन आज भी पारंपरिक जीवनशैली का जीवंत उदाहरण हैं. अगरिया जनजाति धातुकर्म की कला के लिए विशेष रूप से जानी जाती है. संस्थान के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इनके द्वारा बनाए गए बर्तनों में ताप संतुलन और टिकाऊपन जैसी विशेषताएं आज भी वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं. वहीं थारू जनजाति द्वारा चावल से पेय बनाने में इस्तेमाल किए जाने वाले ‘जाड़’ के मिट्टी के बर्तन उनके खान-पान और सामाजिक परंपराओं को समझने का माध्यम हैं.

संस्कृति और मानवविज्ञान के जानकार मानते हैं कि सरकार की यह पहल सामाजिक दृष्टि से भी अहम है. मानवविज्ञान विशेषज्ञ आर.के. त्रिपाठी के अनुसार, जब किसी जनजाति की कला और परंपरा को सरकारी संरक्षण मिलता है, तो उसका सीधा असर उस समुदाय के आत्मसम्मान पर पड़ता है. संग्रहालय और प्रदर्शनियां केवल प्रदर्शन का मंच नहीं होतीं, बल्कि समाज के अन्य वर्गों के साथ संवाद का माध्यम भी बनती हैं.

इसके बावजूद, एक अहम पहलू यह भी है कि जनजातीय संस्कृति को बढ़ावा देने के सरकारी कार्यक्रमों का ज़मीनी असर कितना है? उत्तर प्रदेश दिवस, जनजातीय गौरव दिवस और जनजातीय भागीदारी महोत्सव जैसे आयोजनों से दृश्यता तो बढ़ी है, लेकिन कई इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसी बुनियादी समस्याएं अब भी प्राथमिक चिंता बनी हुई हैं. सवाल यह है कि क्या सांस्कृतिक पहल इन मुद्दों से भी जुड़ पाएगी या यह मुख्य रूप से उत्सवों और मंचों तक सीमित रह जाएगी. 

इस पूरी नीति का राजनीतिक पहलू भी महत्वपूर्ण है. उत्तर प्रदेश में जनजातीय आबादी भले ही प्रतिशत के लिहाज़ से सीमित हो, लेकिन सोनभद्र, लखीमपुर खीरी, श्रावस्ती और बलरामपुर जैसे कई विधानसभा क्षेत्रों में उनका प्रभाव निर्णायक रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जनजातीय पहचान और सम्मान पर जोर देकर योगी सरकार इन समुदायों के बीच भरोसे का आधार मजबूत कर रही है. आने वाले विधानसभा चुनावों में यह भरोसा राजनीतिक समर्थन में बदल सकता है, लेकिन यह तभी टिकाऊ होगा जब सांस्कृतिक संरक्षण के साथ आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण भी ज़मीनी स्तर पर दिखाई दे.

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