दुनिया को अपने स्वाद का दीवाना बना पाएगी यूपी की शराब!

देश की पहली तीन वर्षीय आबकारी निर्यात नीति के जरिए यूपी का लक्ष्य शराब निर्यात में हिस्सेदारी दोगुनी करना और ‘ब्रांड यूपी’ को यूरोप समेत वैश्विक बाजार में स्थापित करना है

छापा मारकर अवैध शराब जब्त. (Photo: Representational)
सांकेतिक तस्वीर

देश में इंडियन मेड फॉरेन लिकर यानी IMFL की खपत के मामले में उत्तर प्रदेश पहले से ही एक बड़ा बाजार है. आबकारी राजस्व के लिहाज से भी राज्य शीर्ष पर है. अब सरकार की नजर घरेलू बिक्री से आगे बढ़कर वैश्विक बाजार पर है. सवाल यह है कि क्या “मेड इन यूपी” शराब दुनिया को अपने स्वाद का दीवाना बना पाएगी, या यह महत्वाकांक्षा कागजों तक ही सीमित रह जाएगी?

राज्य सरकार ने पहली बार तीन वर्षों के लिए अलग आबकारी निर्यात नीति लागू की है. इसे देश के किसी भी राज्य की पहली समर्पित एक्सपोर्ट पॉलिसी के तौर पर पेश किया जा रहा है. लक्ष्य साफ है, उत्तर प्रदेश को एक्साइज इकोसिस्टम में निर्यात हब बनाना और विदेशी मुद्रा से कमाई में राज्य की हिस्सेदारी बढ़ाना. भारत से होने वाले कुल शराब निर्यात में उत्तर प्रदेश की वर्तमान हिस्सेदारी करीब 11 प्रतिशत बताई जा रही है. आबकारी आयुक्त डॉ. आदर्श सिंह कहते हैं, “हमारा लक्ष्य केवल निर्यात बढ़ाना नहीं, बल्कि यूपी को एक भरोसेमंद सप्लाई बेस बनाना है. तीन साल की स्थिर नीति उद्योग को भरोसा देगी.” उनके मुताबिक इरादा हिस्सेदारी को दोगुना या तिगुना करने का है.

वैश्विक स्तर पर शराब की कुल खपत के मामले में चीन और अमेरिका सबसे आगे माने जाते हैं, जबकि प्रति व्यक्ति खपत के लिहाज से जर्मनी, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देश शीर्ष समूह में आते हैं. बीयर खपत में चीन और अमेरिका का बड़ा बाजार है, वहीं वाइन के लिए फ्रांस, इटली, स्पेन और अमेरिका प्रमुख हैं. स्पिरिट्स के मामले में चीन, रूस और पूर्वी यूरोप के देश अहम बाजार माने जाते हैं. उत्तर प्रदेश के लिहाज से यूरोपीय संघ के देश, खासकर जर्मनी, नीदरलैंड, फ्रांस और पूर्वी यूरोप के कुछ बाजार महत्वपूर्ण हो सकते हैं, क्योंकि हालिया व्यापार समझौतों से टैरिफ में राहत की संभावना है और वहां भारतीय मूल के उत्पादों के लिए जगह बन रही है. इसके अलावा अमेरिका, यूएई और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश भी संभावित बाजार हैं, जहां भारतीय ब्रांडों की मौजूदगी पहले से है और प्रीमियम तथा एथनिक सेगमेंट में विस्तार की गुंजाइश दिखती है.

सरकार का मानना है कि हालिया भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते से नए अवसर खुलेंगे. यूरोपीय बाजार गुणवत्ता, ब्रांडिंग और नियामकीय मानकों के मामले में बेहद सख्त माना जाता है. ऐसे में अगर यूपी के ब्रांड वहां जगह बना लेते हैं तो यह राज्य के लिए बड़ी उपलब्धि होगी. आबकारी एवं मद्यनिषेध राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नितिन अग्रवाल कहते हैं, “पहली बार उत्तर प्रदेश को एक ब्रांड की तरह पेश किया जा रहा है. हम चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूपी की अलग पहचान बने.” वे जोड़ते हैं कि इससे औद्योगिक निवेश और रोजगार दोनों बढ़ेंगे.

नई निर्यात नीति में कई संरचनात्मक बदलाव किए गए हैं. निर्यात के लिए निर्धारित पेय क्षमता के 25 प्रतिशत तक बॉटलिंग ड्यूटी, एक्सपोर्ट पास फीस, फ्रैंचाइजी फीस और विशेष शुल्क की दरें न्यूनतम कर दी गई हैं. ब्रांड पंजीकरण और लेबल अनुमोदन के नियमों में ढील दी गई है. विदेशी शराब, बीयर और वाइन पर फ्रैंचाइजी और ब्रांड पंजीकरण शुल्क माफ किए गए हैं. भारत के भीतर निर्यात के लिए 2000 एमएल तक की बोतल भराई शुल्क 0.79 से 4.11 रुपये और विदेश निर्यात के लिए 0.32 से 4.11 रुपये तय किया गया है. आबकारी विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, “हमने शुल्क ढांचे को इस तरह डिजाइन किया है कि उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहें और निर्यातकों को अनावश्यक बाधाओं का सामना न करना पड़े.”

इस नीति को कृषि से जोड़ने की भी कोशिश की गई है. डिस्टिलरी को स्थानीय अनाज और फलों से इथेनॉल और अन्य उत्पाद बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. हेरिटेज शराब के निर्माण, टेस्टिंग बार के परमिट और खुदरा प्रबंधन को लेकर भी स्पष्ट दिशानिर्देश दिए गए हैं. राज्य की पहली फ्रूट-बेस्ड वाइनरी शुरू करने वाले उद्यमी माधवेंद्र देव सिंह का कहना है, “हम पहले से अपने उत्पाद अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार तैयार कर रहे हैं. नई नीति हमें बड़े बाजारों में प्रवेश का आत्मविश्वास देती है.” एक अन्य बड़े डिस्टिलरी समूह के प्रतिनिधि का कहना है, “पहले निर्यात प्रक्रिया जटिल और महंगी थी. अब शुल्क में राहत और स्पष्ट नियमों से दीर्घकालिक अनुबंध करना आसान होगा.”

राजस्व लक्ष्य इस पूरी रणनीति की पृष्ठभूमि में अहम भूमिका निभा रहा है. वर्ष 2026-27 के लिए 71,278 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड आबकारी राजस्व लक्ष्य तय किया गया है. मौजूदा वित्तीय वर्ष का लक्ष्य करीब 60,000 करोड़ रुपये है, यानी लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है. आबकारी आयुक्त का कहना है, “हमने मौजूदा लक्ष्य को भी व्यवहारिक बनाया है और अगले वर्ष के लिए ठोस रणनीति पर काम शुरू कर दिया है.” विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक निर्यात बढ़ने से घरेलू उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग होगा और राजस्व में स्थिरता आएगी.

कीमतों में भी संतुलित बदलाव किया गया है. IMFL की कीमत में 10 से 40 रुपये तक की बढ़ोतरी का प्रावधान है, जबकि बीयर के दाम स्थिर रखे गए हैं. वाइन और कम तीव्रता वाले अल्कोहलिक पेय अपेक्षाकृत सस्ते होंगे. देसी शराब की कीमत में लगभग पांच रुपये की वृद्धि की गई है. एक प्रमुख रिटेल कारोबारी का कहना है, “कीमतों में यह सीमित बदलाव बाजार को झटका नहीं देगा, लेकिन सरकार को अतिरिक्त राजस्व जरूर देगा.”

खुदरा ढांचे में स्थिरता बनाए रखी गई है. कंपोजिट दुकानें, मॉडल शॉप, प्रीमियम मॉडल शॉप और देसी शराब व भांग की दुकानें आवेदन के बाद नवीनीकरण के आधार पर संचालित होंगी. दुकानें सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक खुलेंगी. सभी स्तरों पर पोर्टल आधारित लेनदेन लागू करने की बात कही गई है ताकि पारदर्शिता बढ़े. विभाग का कहना है कि ई-लॉटरी और ऑनलाइन प्रक्रिया से विवाद कम होंगे और सिस्टम अधिक जवाबदेह बनेगा.

राज्य में पहली बार 100 एमएल का देसी शराब का मिनिएचर पैक बाजार में उतारा जाएगा. 42.8 डिग्री तीव्रता वाला यह पैक करीब 50 रुपये में उपलब्ध होगा. एक थोक व्यापारी का कहना है, “छोटे पैक से वैध बिक्री बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को किफायती विकल्प मिलेगा.” देसी शराब के लिए महीनावार कोटा तय किया गया है, जिसमें विवाह और त्योहारों के मौसम को ध्यान में रखकर प्रतिशत निर्धारित किए गए हैं. 28 डिग्री वाली देसी शराब का पव्वा 60 रुपये, 36 डिग्री वाला 80 और 42.8 डिग्री वाला 90 रुपये में बिकेगा.


होलसेल व्यापारियों के लिए लाइसेंस फीस को 20 या 25 लाख रुपये से घटाकर दो लाख रुपए कर दिया गया है. इससे कारोबारी ढांचे में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की उम्मीद है. दूसरी ओर, शराब दुकानों की लाइसेंस फीस में 7.5 प्रतिशत और भांग की दुकानों की फीस में 10 प्रतिशत की वृद्धि की गई है. बार लाइसेंस नवीनीकरण पर प्रोसेसिंग शुल्क नहीं लिया जाएगा. नगर निगम क्षेत्रों में बार को देर रात तक खोलने के लिए अतिरिक्त शुल्क देना होगा. एक होटल उद्योग से जुड़े प्रतिनिधि का कहना है, “देर रात संचालन की अनुमति पर्यटन और नाइटलाइफ के लिए सकारात्मक कदम है, बशर्ते शुल्क संतुलित रहें.”

आर्थिक विशेषज्ञ इस पहल को अवसर और चुनौती दोनों मानते हैं. लखनऊ स्थित एक अर्थशास्त्री प्रोफेसर आर.के. त्रिपाठी कहते हैं, “यदि निर्यात उन्मुख उत्पादन बढ़ता है और स्थानीय कृषि से जुड़ता है तो इसका गुणात्मक प्रभाव होगा. लेकिन वैश्विक बाजार में गुणवत्ता और ब्रांड विश्वसनीयता सबसे बड़ी कसौटी है.” वे यह भी कहते हैं कि नीति की स्थिरता और पारदर्शिता निवेश आकर्षित करने में निर्णायक होगी.

भारत में शराब उत्पादन के मामले में महाराष्ट्र अग्रणी राज्य माना जाता है. विभिन्न उद्योग आकलनों के अनुसार देश में कुल IMFL उत्पादन करीब 350 से 400 करोड़ लीटर सालाना के आसपास है, जिसमें महाराष्ट्र की हिस्सेदारी लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक आंकी जाती है. यहां 300 से अधिक लाइसेंस प्राप्त डिस्टिलरी और बड़ी संख्या में वाइनरी संचालित होती हैं. कर्नाटक और पंजाब भी प्रमुख उत्पादक राज्यों में शामिल हैं. उत्तर प्रदेश उत्पादन क्षमता के लिहाज से तेजी से उभर रहा है और यहां 100 से अधिक डिस्टिलरी संचालित हैं, लेकिन कुल उत्पादन हिस्सेदारी अभी महाराष्ट्र और कर्नाटक से कम मानी जाती है. हालांकि खपत और आबकारी राजस्व के मामले में यूपी देश में शीर्ष पर है और नई निर्यात नीति के जरिए राज्य अपनी उत्पादन क्षमता को भी बड़े पैमाने पर विस्तार देने की दिशा में बढ़ रहा है.

महाराष्ट्र, पजाब, मध्यप्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों से प्रतिस्पर्धा आसान नहीं है. फिर भी उद्योग जगत को भरोसा है कि बड़ा उत्पादन आधार और सरकार की स्पष्ट मंशा यूपी को बढ़त दे सकती है. सवाल बना हुआ है कि क्या “मेड इन यूपी” शराब अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता के स्वाद पर स्थाई छाप छोड़ पाएगी. यह तय है कि राज्य ने अपने आबकारी क्षेत्र को घरेलू राजस्व से आगे बढ़ाकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा के मैदान में उतार दिया है. अब असली परीक्षा बाजार में होगी, जहां गुणवत्ता, भरोसा और ब्रांड कहानी ही अंतिम फैसला करेंगे.

Read more!