मसल्स, शराब और 'माचो इमेज' का मेल यानी यूपी की जिम में अपराध का कॉकटेल!
बुलंदशहर कांड ने खोली पोल, जिमों में नियमों की अनदेखी, देर रात पार्टियां, शराब और कमजोर निगरानी ने फिटनेस सेंटर को बना दिया अपराध और हिंसा का नया ठिकाना

पश्चिमी यूपी के जिले बुलंदशहर में 24 अप्रैल की रात खुर्जा के सुभाष मार्ग स्थित आरजेएस फिटनेस जिम में जो हुआ, वह केवल एक आपराधिक घटना नहीं थी, बल्कि कानून-व्यवस्था और निगरानी तंत्र की बड़ी विफलता का संकेत भी था.
एक साधारण जन्मदिन पार्टी, जिसमें युवा जुटे थे, मामूली कहासुनी से शुरू होकर ताबड़तोड़ फायरिंग में बदल गई. जिम मालिक और उसके साथियों ने लाइसेंसी हथियार गोलीबारी की जिसमें तीन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई.
घटना के बाद सामने आए तथ्यों ने कई सवाल खड़े किए. जिम के अंदर शराब और सिगरेट का इस्तेमाल हो रहा था, जबकि यह एक फिटनेस सेंटर था. आरोप यह भी है कि विवाद और आपराधिक गतिविधियों का यह सिलसिला नया नहीं था. पिछले कुछ महीनों में भी जिम से जुड़े विवाद और हिंसा की घटनाएं सामने आई थीं, लेकिन स्थानीय पुलिस की सक्रियता न के बराबर रही. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पुलिस चौकी से महज कुछ सौ मीटर दूर इस घटना को अंजाम दिया गया और गोलीबारी की आवाज तक पुलिस को नहीं सुनाई दी.
इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जिम जैसे स्थानों पर निगरानी तंत्र पूरी तरह नाकाम हो चुका है? स्थानीय लोगों के मुताबिक, पिछले कई महीनों से इस जिम में विवाद और मारपीट की घटनाएं सामने आती रही थीं, लेकिन पुलिस की सक्रियता केवल औपचारिक गश्त तक सीमित रही.
मिर्जापुर में फरवरी के पहले हफ्ते में सामने आए एक मामले ने जिमों के इस्तेमाल का एक अलग ही पहलू उजागर किया. यहां पुलिस ने कथित धर्मांतरण नेटवर्क से जुड़े आरोपियों को गिरफ्तार किया, जो जिम की आड़ में अपनी गतिविधियां चला रहे थे. जांच में यह भी सामने आया कि जिन जिमों में महिलाएं ट्रेनिंग के लिए आती थीं, वहां महिला ट्रेनर तक नियुक्त नहीं थे. इससे न केवल सुरक्षा पर सवाल उठे, बल्कि यह भी स्पष्ट हुआ कि जिम खोलने और चलाने में नियमों की भारी अनदेखी हो रही है. अक्टूबर, 2024 में कानपुर में शेयर कारोबारी की पत्नी की हत्या के मामले में भी जिम कनेक्शन सामने आया. आरोपी खुद एक बॉडी बिल्डर और जिम ट्रेनर रह चुका था. इस मामले ने यह दिखाया कि जिम केवल अपराध का स्थान ही नहीं, बल्कि अपराधियों के नेटवर्क और संपर्क बनाने का माध्यम भी बनते जा रहे हैं.
उत्तर प्रदेश में तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच जिम और फिटनेस सेंटर युवाओं के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र बने हैं. शहरों से लेकर कस्बों तक हर गली-मोहल्ले में जिम खुल रहे हैं, लेकिन हाल के दिनों में इन जिमों की एक दूसरी, चिंताजनक तस्वीर भी सामने आई है. यहां फिटनेस की जगह अपराध पनपने लगे हैं. बुलंदशहर के खुर्जा में जन्मदिन की पार्टी के दौरान हुए तिहरे हत्याकांड ने इस सवाल को और गहरा कर दिया है कि आखिर जिम जैसे सार्वजनिक और नियंत्रित स्थान अपराध के अड्डे कैसे बनते जा रहे हैं.
फिटनेस सेंटर का अनियंत्रित विस्तार
इन घटनाओं को जोड़कर देखें तो एक बड़ी समस्या सामने आती है- जिम का तेजी से बढ़ता अनियंत्रित विस्तार. पिछले कुछ वर्षों में शहरी और कस्बाई इलाकों में जिम खोलना एक आसान व्यवसाय बन गया है. यूपी में जिम खोलने के लिए कुछ बुनियादी नियम और मानक तय हैं, जैसे स्थानीय निकाय से अनुमति, अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र, प्रशिक्षित स्टाफ, और सीसीटीवी निगरानी. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है.
अधिकांश छोटे और मध्यम स्तर के जिम बिना उचित लाइसेंस या आधे-अधूरे कागजी काम के साथ संचालित हो रहे हैं. कई जगहों पर फायर सेफ्टी के इंतजाम नहीं होते, तो कहीं सीसीटीवी कैमरे केवल दिखावे के लिए लगे होते हैं या काम ही नहीं करते. खुर्जा मामले में आरोपी द्वारा सीसीटीवी डीवीआर लेकर भाग जाना यह भी दिखाता है कि निगरानी व्यवस्था कितनी कमजोर है. अगर डेटा सुरक्षित रखने के लिए क्लाउड या बैकअप सिस्टम होता, तो जांच में तेजी आ सकती थी.
ऐसे में ऐसे स्पेस न केवल असुरक्षित बनते हैं, बल्कि आपराधिक तत्वों के लिए भी अनुकूल माहौल तैयार करते हैं. लखनऊ के एक फिटनेस इंडस्ट्री विशेषज्ञ, रवि त्रिपाठी कहते हैं, “जिम सेक्टर में एंट्री बैरियर बहुत कम है. कोई भी व्यक्ति कुछ मशीनें खरीदकर और एक जगह किराए पर लेकर जिम खोल सकता है. लेकिन इसके साथ जो जिम्मेदारियां आती हैं, जैसे क्लाइंट सेफ्टी, निगरानी, और व्यवहारिक अनुशासन- उन पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है.” उनका कहना है कि कई जिमों में ट्रेनर्स की कोई औपचारिक ट्रेनिंग या बैकग्राउंड वेरिफिकेशन नहीं होता, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है.
पुलिस अधिकारियों की भी अपनी चिंताएं हैं. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, “जिम ऐसे स्पेस हैं जहां रोजाना बड़ी संख्या में युवा आते हैं, लेकिन यह पूरी तरह निजी जगह होती है. अगर मालिक जिम्मेदार नहीं है, तो वहां क्या हो रहा है, इसकी जानकारी बाहर तक नहीं पहुंचती. कई बार हमें घटना होने के बाद ही पता चलता है.” वे मानते हैं कि जिम के लिए स्पष्ट नियामक ढांचा और नियमित निरीक्षण जरूरी है.
देर रात संचालन और अनियंत्रित गतिविधियां
जिमों के अपराध केंद्र बनने का एक बड़ा कारण उनका देर रात तक खुला रहना भी है. कई जिम आधिकारिक समय से कहीं ज्यादा देर तक संचालित होते हैं, जहां पार्टी, शराबखोरी और अन्य गतिविधियां होती हैं. स्थानीय पुलिस अक्सर इन जगहों पर नियमित जांच नहीं करती. पीआरवी गश्त केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है. ऐसे में जिम संचालकों को यह संदेश जाता है कि वे बिना किसी डर के नियमों का उल्लंघन कर सकते हैं.
जिम संस्कृति के साथ एक और पहलू जुड़ा है- ‘माचो इमेज’ या ताकत दिखाने की प्रवृत्ति. कई बार छोटे-छोटे विवाद अहंकार की लड़ाई में बदल जाते हैं. खुर्जा में केक चेहरे पर लगाने जैसी मामूली बात पर शुरू हुआ विवाद हत्या तक पहुंच गया. यह बताता है कि गुस्से और हिंसा पर नियंत्रण की कमी भी बड़ी वजह है. सामाजिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ डॉ. नीलिमा सक्सेना इस प्रवृत्ति को युवा आक्रोश और असंयम से जोड़ती हैं. उनके अनुसार, “जिम एक ऐसा स्थान है जहां शारीरिक ताकत और प्रतिस्पर्धा का माहौल होता है. अगर इसके साथ सही मार्गदर्शन और अनुशासन न हो, तो यह आक्रामक व्यवहार को बढ़ा सकता है. शराब और समूह दबाव इस स्थिति को और बिगाड़ देते हैं.” उनका मानना है कि फिटनेस स्पेस में मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहारिक प्रशिक्षण को भी शामिल करना चाहिए.
राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण
राजनीतिक और स्थानीय प्रभाव, ऐसी घटनाओं का एक और अहम पहलू हैं. खुर्जा मामले में आरोपी के एक राजनीतिक दल से जुड़े होने की बात सामने आई है. यह सवाल उठता है कि क्या ऐसे प्रभाव के चलते जिम संचालकों को कानून से छूट मिल जाती है? स्थानीय लोगों के आरोप हैं कि पुलिस कई बार दबाव में कार्रवाई नहीं करती, जिससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता है.
जिम संचालकों का पक्ष भी इस बहस में महत्वपूर्ण है. कई जिम्मेदार संचालक मानते हैं कि कुछ लोगों की वजह से पूरी इंडस्ट्री की छवि खराब हो रही है. नोएडा के एक जिम मालिक, अजय सिंह कहते हैं, “हम अपने जिम में सख्त नियम लागू करते हैं- शराब और धूम्रपान पूरी तरह प्रतिबंधित है, हर सदस्य का रिकॉर्ड रखा जाता है और CCTV की निगरानी रहती है. लेकिन सभी जिम ऐसा नहीं करते. सरकार को एक यूनिफॉर्म पॉलिसी बनानी चाहिए.” उनका सुझाव है कि जिम के लिए लाइसेंस, ट्रेनर्स की सर्टिफिकेशन और नियमित ऑडिट अनिवार्य किए जाएं.
वर्तमान में जिम के लिए जो नियम हैं, वे बिखरे हुए और कमजोर हैं. नगर निगम या स्थानीय निकाय से ट्रेड लाइसेंस लेना ही अक्सर पर्याप्त माना जाता है, जबकि यह केवल व्यावसायिक अनुमति है, सुरक्षा या संचालन के मानकों का प्रमाण नहीं. फायर सेफ्टी, आपातकालीन निकास, प्रशिक्षित स्टाफ और पुलिस वेरिफिकेशन जैसे पहलू अक्सर नजरअंदाज किए जाते हैं.
दिक्कतें कैसे सुलझेंगीं?
विशेषज्ञों का मानना है कि बहु-स्तरीय दखल की जरूरत है. सबसे पहले, जिम के लिए एक स्पष्ट और सख्त नियामक ढांचा तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें लाइसेंसिंग, सुरक्षा मानक और नियमित निरीक्षण शामिल हों. दूसरे, पुलिस को संवेदनशील और संदिग्ध गतिविधियों वाले जिमों की पहचान कर उनकी निगरानी बढ़ानी चाहिए. तीसरे, जिम संचालकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए अनुशासन और पारदर्शिता बनाए रखनी होगी.
लखनऊ नगर निगम के एक अधिकारी बताते हैं “समाज की भूमिका भी कम नहीं है. अभिभावकों और युवाओं को यह समझना होगा कि जिम केवल शरीर बनाने की जगह नहीं है, बल्कि यह अनुशासन और जिम्मेदारी का भी स्थान है. अगर वहां गलत गतिविधियां हो रही हैं, तो उसकी सूचना देना और उसका विरोध करना जरूरी है.”