निमंत्रण की परंपरा से शुरू हुई ब्रज की होली; 40 दिनों के उत्सव में कौन-कौन से रंग दिखेंगे?

होली मनाने के लिए 24 फरवरी को बरसाना से नंदगांव निमंत्रण भेजने के साथ ही ब्रज में 40 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार की शुरुआत हो गई है

इस वर्ष 27 फरवरी को मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान में होली का भव्य आयोजन होगा (फाइल फोटो)

सोलह श्रृंगार से सजी, माथे पर बिंदी, मांग में सिंदूर, हाथों में चूड़ियां और पांव में पायल की हल्की छनक. लंबा घूंघट ओढ़े जब राधा की सखी लाडलीजी मंदिर की ऊंची सीढ़ियों से नीचे उतरती हैं, तो ढोल-नगाड़ों की गूंज पूरे बरसाना में 24 फरवरी की सुबह फैल जाती है.

मंदिर के भीतर आरती के बाद सेवायत उनकी हड़िया में गुलाल भरते हैं. साथ में इत्र, बीड़ा, फोआ और प्रसाद दिया जाता है. यह दृश्य सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, ब्रज की होली का औपचारिक उद्घोष है. रंगीली गली में खड़े लोग हाथ बांधे निहारते हैं. महिलाएं मंगलगीत गाती हैं. युवक अबीर उछालते हैं. सखी नंदगांव के लिए रवाना होती हैं. संदेश साफ है. राधारानी की ओर से कान्हा को होली खेलने का निमंत्रण पहुंच चुका है.

निमंत्रण की परंपरा : होली का पहला रंग

ब्रज में होली अचानक शुरू नहीं होती. इसकी शुरुआत इसी निमंत्रण से होती है. 24 फरवरी को बरसाना से नंदगांव तक यह संदेश पहुंचता है कि अब रंग बरसने वाले हैं. नंदभवन में सबसे पहले कृष्ण-बलराम को बरसाना से आया अबीर लगाया जाता है, फिर पूरे गांव में गुलाल बांटा जाता है. नंद बाबा मंदिर में सखियों का स्वागत होता है. यह आदान-प्रदान सिर्फ रंगों का नहीं, भावों का होता है.

कृष्ण-बलराम को अबीर लगाने की परंपरा (फाइल फोटो)

बरसाना के लाडलीजी मंदिर, जिसे श्रीजी मंदिर भी कहा जाता है, में 24 फरवरी की शाम प्रसिद्ध लड्डू होली खेली जाती है. मंदिर प्रांगण में पुजारी लड्डू उछालते हैं. श्रद्धालु उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं. गुलाल और लड्डू एक साथ उड़ते हैं. जयकारों से वातावरण भर जाता है. यह आयोजन संकेत देता है कि अब ब्रज में रंगों की बरसात शुरू हो चुकी है. यहां से ब्रज की 40 दिन चलने वाली होली अपने पूरे वेग में प्रवेश करती है.

40 दिन की होली : ब्रज की विशिष्ट पहचान

जहां देश के अधिकतर हिस्सों में होली दो दिन में सिमट जाती है, वहीं ब्रज में यह बसंत पंचमी से लेकर धुलेंडी और उसके बाद तक लगभग 40 दिनों तक चलती है. हर दिन अलग रंग, अलग शैली, अलग परंपरा. ब्रज में होली का रंग एक दिन में नहीं चढ़ता, वह तारीख दर तारीख गहराता है और हर पड़ाव अपने साथ अलग रस लेकर आता है. इस वर्ष 27 फरवरी को मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान में होली का भव्य आयोजन होगा. यहां रंग खेलने से पहले पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन होते हैं. श्रद्धालु गुलाल अर्पित कर कान्हा से आशीर्वाद लेते हैं, फिर पूरा परिसर रंगों से सराबोर हो उठता है. 

1 मार्च को गोकुल में पारंपरिक छड़ी मार होली खेली जाएगी. यहां की होली में लोक परंपरा की सहजता दिखती है. महिलाएं छड़ी से प्रतीकात्मक प्रहार करती हैं और पुरुष रंगों में भीगते हुए गीत गाते हैं. 3 मार्च को चतुर्वेदी समाज का होली डोला निकलेगा. शोभायात्रा पूरे उत्साह के साथ शहर की गलियों से गुजरेगी. इसी दिन होलिका दहन होगा, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है. 4 मार्च को धुलेंडी पर रंगों का खुला उत्सव होगा. गलियों से लेकर मंदिर प्रांगण तक हर ओर अबीर और गुलाल उड़ता दिखाई देगा. 5 मार्च को उत्सव अपने चरम पर पहुंचेगा. बलदेव के दाऊजी मंदिर में हुरंगा होगा, जहां रंग और उमंग का अनूठा संगम देखने को मिलता है. इसी दिन नंदगांव और जाव में भी हुरंगा खेला जाएगा, जबकि मुखराई गांव में पारंपरिक चरकुला नृत्य ब्रज संस्कृति की जीवंत झलक पेश करेगा. 

फिर 6 मार्च को बठैन और गिडोह गांवों में हुरंगा की परंपरा आगे बढ़ेगी. गांवों की चौपाल और मंदिर रंग और लोकगीतों से गूंज उठेंगे. 9 मार्च को महावन में छड़ी मार होली का आयोजन होगा, जहां फिर से लोक शैली में रंगों का खेल दोहराया जाएगा. और 12 मार्च को वृंदावन के श्री रंगजी मंदिर में भव्य होली उत्सव के साथ इस लंबे रंग पर्व का एक महत्वपूर्ण पड़ाव पूरा होगा. दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली वाले इस मंदिर में होली का आयोजन भक्ति और अनुशासन के साथ संपन्न होता है, जो ब्रज की विविध परंपराओं को एक सूत्र में पिरो देता है. इन तिथियों के साथ ब्रज की होली केवल त्योहार नहीं रहती, वह एक विस्तृत सांस्कृतिक यात्रा बन जाती है, जिसमें हर दिन नया रंग, नई परंपरा और नई ऊर्जा लेकर आता है. 

लट्ठमार होली : प्रेम का प्रतीकात्मक युद्ध

बरसाना की लट्ठमार होली सबसे अधिक चर्चित है. जब नंदगांव से हुरियारे आते हैं, तो उनके सिर पर पगड़ी और हाथ में ढाल होती है. बरसाना की हुरियारिनें रंगीन लहंगा-ओढ़नी में लाठी लेकर तैयार रहती हैं. रसिया गाए जाते हैं. छेड़छाड़ की लोकपरंपरा निभाई जाती है. फिर शुरू होता है प्रतीकात्मक प्रहार. महिलाएं लाठी चलाती हैं, पुरुष ढाल से बचाव करते हैं. दर्शकों की भीड़ जयकारे लगाती है. अगले दिन यही परंपरा नंदगांव में दोहराई जाती है. वहां बरसाना के पुरुष जाते हैं और नंदगांव की गोपियां उनका स्वागत लाठियों से करती हैं. यह आयोजन सिर्फ रोमांच नहीं, लोकस्मृति का हिस्सा है. कहा जाता है कि कृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना आते थे और राधा व सखियां उन्हें चुटकी लेते हुए लाठियों से खदेड़ती थीं.

लठ्ठमार होली (फाइल फोटो)

भक्ति और सौंदर्य की होली

वृंदावन की होली का रंग अलग है. यहां मंदिरों में भक्ति का रस अधिक है. बांके बिहारी मंदिर में फूलों की होली विश्व प्रसिद्ध है. पुजारी ठाकुरजी पर फूल अर्पित करते हैं और फिर वही फूल भक्तों पर बरसाए जाते हैं. कुछ देर के लिए मंदिर परिसर फूलों के बादलों में बदल जाता है. यहां रासलीला का मंचन भी होता है. कलाकार राधा-कृष्ण की लीलाओं को जीवंत करते हैं. भक्त भावविभोर हो जाते हैं.

मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान में भी होली का विशेष आयोजन होता है. यहां रंग खेलने से पहले धार्मिक अनुष्ठान होते हैं. कीर्तन और भजन के बीच गुलाल अर्पित किया जाता है. मथुरा शहर की गलियां भी रंग से सराबोर रहती हैं. स्थानीय बाजारों में टेसू के फूल, प्राकृतिक रंग और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की बिक्री बढ़ जाती है. स्थानीय व्यापारी अनिल गुप्ता बताते हैं, “होली के दिनों में मथुरा की अर्थव्यवस्था भी रंग पकड़ लेती है. होटल, दुकानों, मिठाई वालों सबका कारोबार बढ़ जाता है.”

गोकुल और महावन की छड़ी मार होली

गोकुल में छड़ी मार होली खेली जाती है. महिलाएं छड़ी से हल्के प्रतीकात्मक प्रहार करती हैं. वातावरण में हास्य और आनंद का मिश्रण रहता है. महावन में भी इसी तरह की परंपरा है. यहां का आयोजन अपेक्षाकृत शांत लेकिन गहरा सांस्कृतिक महत्व रखता है. बलदेव कस्बे में स्थित दाऊजी मंदिर का हुरंगा अलग ही रंग दिखाता है. यहां महिलाएं पुरुषों के कपड़े पकड़कर खींचती हैं, फटे कपड़ों से उन्हें प्रतीकात्मक रूप से मारती हैं. ऊपर से रंगीन पानी की धारें गिरती हैं. मंदिर का फर्श टेसू के रंग से भीग जाता है. मान्यता है कि यहां बलराम स्वयं होली खेलते हैं. इसलिए इस आयोजन में ऊर्जा और उन्मुक्तता दोनों दिखाई देती हैं.

मथुरा जिले के फालैन गांव में होली से पहले अग्नि पर चलने की परंपरा है. चुना गया पुजारी प्रह्लाद कुंड में स्नान करता है और फिर अंगारों पर नंगे पैर चलता है. हजारों लोग इस दृश्य को देखने जुटते हैं. इसे आस्था और साहस का प्रतीक माना जाता है. वृंदावन में कभी विधवाओं को होली खेलने की अनुमति नहीं थी. उन्हें समाज से अलग रखा जाता था. लेकिन अब समय बदल चुका है. आज विधवाएं भी रंगों से सराबोर होकर होली खेलती हैं. सफेद साड़ियों पर गुलाबी और पीले रंग के छींटे पड़ते हैं. यह दृश्य बताता है कि त्योहार सिर्फ परंपरा नहीं, बदलाव का माध्यम भी हो सकता है. वृंदावन की रहने वाली 65 वर्षीय सावित्री देवी कहती हैं, “पहले हमें सिर्फ दूर से देखना होता था. अब हम भी गुलाल लगाते हैं. लगता है जैसे जिंदगी में रंग वापस आ गए.”

लोकगीत और रसिया : होली की आत्मा

ब्रज की होली सिर्फ रंगों से नहीं, रसिया गीतों से भी जीवित है. ढोलक, मंजीरा और नगाड़ों की ताल पर गाए जाने वाले गीतों में राधा-कृष्ण की छेड़छाड़, हास्य और प्रेम झलकता है. गांव की चौपाल से लेकर मंदिर प्रांगण तक हर जगह लोकसंगीत गूंजता है. बुजुर्ग भी इन गीतों की पंक्तियां सहजता से गुनगुनाते हैं. स्थानीय गायक हरिओम शास्त्री बताते हैं, “रसिया के बिना होली अधूरी है. यही गीत पीढ़ियों को जोड़ते हैं.”ब्रज में पारंपरिक रूप से टेसू के फूलों से रंग बनाया जाता है. अबीर और गुलाल भी प्राकृतिक स्रोतों से तैयार किए जाते थे. हाल के वर्षों में फिर से प्राकृतिक रंगों पर जोर दिया जा रहा है. यह परंपरा पर्यावरण के प्रति सजगता का भी संकेत देती है.

ब्रज की होली अब वैश्विक पहचान पा चुकी है. उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके लिए विशेष प्रयास किए हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में ब्रज तीर्थ विकास परिषद का गठन हुआ. इसका उद्देश्य ब्रज क्षेत्र के धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों का विकास करना है. सुरक्षा, यातायात और स्वच्छता की विशेष व्यवस्था की जाती है. विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में लट्ठमार होली और फूलों की होली देखने आते हैं. होटल और धर्मशालाएं महीनों पहले बुक हो जाती हैं.

ब्रज की होली सिर्फ त्योहार नहीं, एक अनुभव है. यहां रंगों के पीछे कथा है. हर रस्म के पीछे स्मृति है; हर आयोजन के पीछे लोकविश्वास है. जब राधा की सखी सोलह श्रृंगार कर निमंत्रण लेकर निकलती हैं, तो वह दृश्य आने वाले दिनों के उत्सव की भूमिका लिख देता है. लट्ठमार में प्रेम है. फूलों की होली में भक्ति है. हुरंगा में उन्मुक्तता है. छड़ी मार में लोकजीवन की सहजता है. विधवाओं की होली में बदलाव की आहट है. ब्रज की होली इसलिए खास है क्योंकि यहां रंग केवल चेहरे पर नहीं लगते, वे इतिहास, आस्था और लोकसंस्कृति को एक साथ रंग देते हैं. और जब धुलेंडी के दिन पूरा ब्रज गुलाल से ढक जाता है, तो लगता है जैसे सदियों पुरानी कोई कथा फिर से जीवित हो उठी हो.

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