गुजरात में भगवा सुनामी : क्या 2027 से पहले ही विपक्ष ने घुटने टेक दिए?

गुजरात निकाय चुनाव में मतदान से पहले ही BJP ने 736 सीटें निर्विरोध जीत ली थीं. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को इन नतीजों ने बहुत बुरा झटका दिया है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

28 अप्रैल को गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों के परिणाम घोषित किए गए. इन चुनावों में BJP ने शानदार जीत हासिल की और विपक्षी दलों को बुरी तरह हरा दिया.

ये नतीजे राज्य की किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए आश्चर्यजनक नहीं रहे. BJP ने सभी 15 नगर निगमों, 34 में से 33 जिला पंचायतों, 260 में से 210 तालुका पंचायतों और 84 में से 78 नगरपालिकाओं में BJP ने पूर्ण बहुमत हासिल किया.

ये चुनाव करीब 9,200 सीटों के लिए लड़े गए. राज्य के कुल मतदाताओं में से 95 फीसद यानी लगभग 4 करोड़ 18 लाख मतदाता इन चुनावों में वोट डालने के योग्य थे. लगभग 32,000 उम्मीदवार मैदान में थे, जो गुजरात के इतिहास में सबसे बड़े स्थानीय चुनावों में से एक था.

BJP की जीत पूरी तरह से एकतरफा रही. अहमदाबाद नगर निगम में BJP ने 192 में से 160 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 32 सीटें मिलीं. सूरत में BJP ने 120 में से 115 सीटें जीत लीं.

यहां आम आदमी पार्टी (AAP) को 4 और कांग्रेस को सिर्फ 1 सीट मिली. यह 2021 के चुनाव से बहुत बड़ा उलटफेर था, जब AAP ने इसी सूरत नगर निगम में 27 सीटें जीती थीं.

जिला पंचायतों में, 34 में से 32 जिलों में BJP ने भारी जीत हासिल की. BJP को 886 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस को 124 और  AAP को 51 सीटें मिलीं. इस बार BJP की जीत इतनी पूरी थी कि सिर्फ नर्मदा जिले में रुझान उलटा रहा.

नर्मदा में AAP ने 22 में से 15 सीटें जीत लीं और अब वह इस जिला पंचायत पर शासन करेगी. यह AAP के आदिवासी विधायक चैत्रा वासवा की बढ़ती लोकप्रियता के कारण उल्लेखनीय है, जिन्होंने इस अभियान का नेतृत्व किया था.

2015, 2021 और 2026 के जिला पंचायत परिणामों की तुलना से यह स्पष्ट रूप से पता चलता है कि इस बार गुजरात के हर स्थानीय निकाय चुनाव में BJP का प्रभाव बढ़ता जा रहा है. बाढ़ से फसलों के नुकसान और बुनियादी ढांचे की कमियों को लेकर किसानों में व्याप्त असंतोष के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों ने एक बार फिर BJP का समर्थन किया. कमजोर कांग्रेस संगठन ग्रामीण शिकायतों को वोटों में बदलने में विफल रही.

हालांकि, विपक्ष के लिए सबसे बड़ा झटका मतदान शुरू होने से पहले के आंकड़ों से लगा. विभिन्न स्तरों पर कुल 736 सीटों पर निर्विरोध तरीके से उम्मीदवारों का चयन हुआ, जो 2021 में 220 और 2015 में मात्र 37 सीटों की तुलना में एक बड़ी वृद्धि है. एक के बाद एक कई सीटों पर BJP को कोई चुनौती देने वाला नहीं मिला. ये आंकड़े विपक्ष की इतनी कमजोर स्थिति को दर्शाते हैं कि वे इन सीटों पर उम्मीदवार उतारने में भी असमर्थ रहे.

AAP तीसरे स्थान पर रही, जिसने सभी कैटेगरी में लगभग 5,000 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल 185 सीटें जीतीं. इसका प्रभाव मुख्य रूप से सौराष्ट्र के अमरेली, जूनागढ़ और गिर सोमनाथ जिलों की तालुका पंचायतों और नर्मदा जिले के अप्रत्याशित परिणाम तक ही सीमित था. शहरी निकायों में AAP का प्रदर्शन लगभग नहीं के बराबर रहा. सूरत में तो उसकी सीटें घटकर चार रह गईं. पार्टी के गुजरात महासचिव मनोज सोरथिया भी यहां अपने वार्ड से हार गए.

2022 के विधानसभा चुनावों के बाद AAP कुछ समय के लिए प्रमुख विपक्षी दल बनने की राह पर दिखी थी, क्योंकि उसे 13 फीसद वोट मिले थे. AAP पार्टी ने यहां 5 सीटें जीती थीं. जबकि कांग्रेस को 26.9 फीसद वोट मिले और उसने 182 सीटों में से 17 सीटें जीतीं. स्थानीय निकाय चुनावों में मिली करारी हार के बाद AAP को आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है.

कांग्रेस का मामला थोड़ा अलग है, लेकिन नतीजा एक जैसा है. पार्टी ने अहमदाबाद में 32 सीटें जीतीं, जिनमें ऐतिहासिक रूप से खाडिया वार्ड की चारों सीटें शामिल हैं. इनपर कांग्रेस को पहली बार जीत मिली हैं. पार्टी ने राज्य के कुछ इलाकों में खासकर बनासकांठा में 16 और पाटन जिला पंचायतों में 13 सीटें जीतीं. हालांकि, वडोदरा में पार्टी की नगर अध्यक्ष अमीबेन रावत और वरिष्ठ नेता डॉ. निकुल पटेल को अपने-अपने वार्डों में करारी हार का सामना करना पड़ा. मेहसाना, मोरबी और नाडियाड के नवनिर्मित नगर निगमों में कांग्रेस एक भी सीट जीतने में असफल रही.

2021 के चुनाव में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की सीटें अहमदाबाद में सात थीं, लेकिन अब घटकर शून्य हो गईं. उसे केवल भुज में तीन सीटों पर जीत मिलीं. मुस्लिम आबादी वाले कुछ चुनिंदा शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में AIMIM की मौजूदगी से ही BJP को वोटों के ध्रुवीकरण का मौका मिल गया.

इन चुनावों में नाममात्र के लिए स्थानीय मुद्दे जैसे- सड़कें, पानी, जल निकासी और नागरिक सुविधाओं की थी. दरअसल, BJP के चुनाव प्रचार तंत्र ने राष्ट्रीय और पहचान से जुड़े विषयों पर भी काफी जोर दिया. 2025 के पहलगाम आतंकी हमले  पहली बरसी मतदान से ठीक पहले मनाई गई थी. इसको BJP ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे की याद दिलाने के रूप में इस्तेमाल किया.

संशोधित वक्फ कानून और हिंदू हितों की रक्षा के व्यापक दृष्टिकोण ने हिंदू आबादी वाले क्षेत्रों में BJP को बढ़त दिलाई. अहमदाबाद की कुछ विधानसभा सीटों पर AIMIM की मौजूदगी ने भगवा अभियान को एक अतिरिक्त ताकत दी, जिससे पुराने शहर से सटे इलाकों में सांप्रदायिक संदेश और भी तीखा हो गया. कांग्रेस, किसी भी समुदाय के लोगों के भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाने की नीति पर रही, जिसके कारण उसके किसी भी मुद्दे को लोगों ने सांप्रदायिक मुद्दों के आगे हल्के में लिया.

इन नतीजों पर बारीकी से नजर रखी जाएगी, क्योंकि ये 2027 के विधानसभा चुनावों का संकेत हैं. इनसे कम से कम इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि BJP की जमीनी मशीनरी को कोई चुनौती नहीं मिल रही है. लेकिन, खाडिया सीट का हाथ से निकल जाना पार्टी के लिए चुभेगा क्योंकि इससे इस क्षेत्र पर पांच दशकों से चले आ रहे उसके नियंत्रण का अंत हो गया है.

जनसंघ ने 1970 के दशक की शुरुआत में अहमदाबाद नगर निगम में खाडिया सीट पर कब्जा जमाया था. 1980 में जब जनसंघ BJP में विलीन हो गया, तो यह सीट बिना किसी रुकावट के BJP को मिल गई. 2026 के नतीजे 50 से अधिक वर्षों में पहली बार हैं, जब भगवा गठबंधन ने नगर निगम स्तर पर खाडिया सीट खोई है. इस वार्ड में 30,000 मुस्लिम मतदाता और 40,000 हिंदू मतदाता हैं. कांग्रेस के चार उम्मीदवारों में से एक मुस्लिम था.

कुल मिलाकर, परिणाम बताते हैं कि कांग्रेस बिना किसी मजबूत प्लानिंग के बस अपनी उपस्थिति बनाए हुए है, जबकि बीते चुनाव को देखकर लगता है कि AAP पार्टी के गुजरात प्रयोग में अभी बहुत कुछ करना बाकी है. BJP की 736 सीटों पर र्विरोध जीत शायद विपक्ष के लिए सबसे निराशाजनक आंकड़ा हैं, जो चुनाव शुरू होने से पहले ही हार मान चुका है.

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