बंगाल में BJP का 'कार्पेट बॉम्बिंग' कैंपेन चुनावी माहौल को बदल पाएगा?

23 अप्रैल को होने वाले मतदान के लिए BJP ने 152 सीटों पर करीब 500 रैलियां करने की योजना बनाई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से लेकर BJP शासित राज्यों के तमाम मुख्यमंत्री इन रैलियों में शामिल होंगे

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव अपने आखिरी दौर में है. ऐसे में BJP ने आक्रामक तरीके से चुनाव प्रचार करने की योजना तैयार कर ली है. इतना ही नहीं BJP ने अपने चुनाव प्रचार की रणनीति में भी अहम बदलाव की है.

तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के लिए BJP की बनाई गई इस नई रणनीति को 'कार्पेट बॉम्बिंग' नाम दिया गया है. बंगाल में BJP की इस 'कार्पेट बॉम्बिंग' चुनावी रणनीति का उद्देश्य 152 सीटों पर 500 से अधिक रैलियां करनी है.

इसके साथ ही सोशल मीडिया कैंपेनिंग, सरकार की नाकामी आदि को उजागर करना है. इन सीटों पर शीर्ष नेताओं के दौरे के जरिए आक्रामक प्रचार करना भी इसी रणनीति का हिस्सा है. पार्टी संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं को अंतिम छोर के मतदाताओं पर प्रभाव डालने के लिए कहा गया है.  

केंद्रीय मंत्री और भाजपा के बंगाल के लिए चुनाव पर्यवेक्षक भूपेंद्र यादव के मुताबिक, "केंद्रीय नेताओं के अलावा, बंगाल का हर बड़ा नेता 152 विधानसभा सीटों में से प्रत्येक में कम से कम एक रैली को संबोधित करेगा." चुनाव प्रचार अभियान का नेतृत्व राष्ट्रीय स्तर के दिग्गज नेताओं और क्षेत्रीय बड़े नेताओं के जरिए किया जा रहा है.  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य भर में कई रैलियों को संबोधित किया है. मोदी पहले चरण के चुनाव में लगभग 11 रैलियों को संबोधित करेंगे और शाह लगभग 30 रैलियों को संबोधित करेंगे. इनके अलावा, BJP शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों जैसे- हिमंता बिस्वा सरमा (असम) और योगी आदित्यनाथ (उत्तर प्रदेश) रैलियों को संबोधित करेंगे. सीमावर्ती जिलों और आदिवासी निर्वाचन क्षेत्रों को लक्षित करने के लिए रणनीतिक रूप खास नेताओं की तैनाती की गई है.  

रैलियों के साथ-साथ सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी जोरदार अभियान चलाया जा रहा है. 15 अप्रैल को बंगाली नव वर्ष है, इस दिन से BJP ने प्रतिदिन एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने की योजना बनाई है. हर प्रेस कॉन्फ्रेंस उसके घोषणापत्र के एक विशिष्ट विषय पर केंद्रित होगी, जो तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार को निशाना बनाएगी. संदेश देने का यह सुनियोजित तरीका अंतिम दिनों में विशुद्ध रूप से भावनात्मक लामबंदी से हटकर मुद्दों पर आधारित चुनाव प्रचार की ओर बदलाव को दर्शाता है.

इस बार BJP के संदेश की एक उल्लेखनीय विशेषता इसका संतुलित लहजा है. 2021 के चुनाव से BJP ने सबक लिया है, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर कथित व्यक्तिगत हमलों ने महिला मतदाताओं के एक वर्ग को नाराज कर दिया था. पार्टी ने जानबूझकर प्रत्यक्ष व्यक्तिगत आलोचना से परहेज किया है. इसके बजाय, पार्टी ने शासन संबंधी मुद्दों, आर्थिक संकट और कृषि संबंधी चिंताओं पर ध्यान केंद्रित किया है.

मोदी और शाह दोनों ही अपनी रैलियों में बार-बार जिन प्रमुख मुद्दों को उठाते हैं, उनमें से एक है बंगाल में आलू संकट का जुड़ा मुद्दा है. यह एक ऐसा मुद्दा जिसका इस्तेमाल BJP किसानों को सीधे लुभाने के लिए कर रही है. इस संकट से तात्पर्य राज्य में आलू उत्पादकों के जरिए बार-बार सामना की जाने वाली समस्याओं से है, जिनमें मुख्य कीमतों में भारी गिरावट है. राज्य सरकार के जरिए अंतर-राज्यीय निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध और अपर्याप्त कोल्ड स्टोरेज व्यवस्था को BJP ने इस स्थिति के लिए जिम्मेदार बताया है.

इस साल समस्या और भी गंभीर हो गई है क्योंकि कोलकाता में आलू की अनुपलब्धता और कीमतों में भारी वृद्धि के कारण राज्य सरकार ने ओडिशा जैसे अन्य राज्यों को आलू की बिक्री रोक दी थी. मेदिनीपुर आदि जिलों में उगाए जाने वाले आलू की कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में खपत नहीं हो पाती. ऐसे में निर्यात में पाबंदी से पिछले साल का आलू बिना बिका रह गया. इसके साथ ही इस साल बंपर उत्पादन ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है.

किसानों को अक्सर अपनी उपज कम कीमतों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जबकि उपभोक्ता कीमतों में उतार-चढ़ाव का सामना करते हैं. इस विरोधाभास को उजागर करके, BJP नेता TMC सरकार को किसान विरोधी और प्रशासनिक रूप से अक्षम साबित करने का प्रयास कर रहे हैं.

भूपेंद्र यादव ने कहा, “इस चुनाव में आलू एक अहम मुद्दा है. हमारी सरकार बनने पर हम यह सुनिश्चित करेंगे कि राज्य के बाहर इसकी बिक्री न रुके और किसानों को उचित मूल्य मिले.” मोदी और शाह ने अपनी लगातार रैलियों में आलू संकट को व्यापक कृषि विफलता का प्रतीक बताया है और तर्क दिया है कि बंगाल के किसान राज्य सरकार के परेशान करने वाले कानून और बाजार की अस्थिरता के बीच फंसे हुए हैं.

संगठनात्मक रूप से BJP ने इस संदेश को व्यापक जमीनी अभियान के साथ समर्थन दिया है. बंगाल के बाहर से 700 से अधिक कर्मियों को विधानसभा क्षेत्र स्तर के अभियानों के मैनेजमेंट के लिए तैनात किया गया है, जिससे केंद्रीय नेतृत्व और स्थानीय काडर के बीच समन्वय स्थापित हो सके.

इस आक्रामक चुनाव अभियान को अगर छोड़ दें तो BJP गुटबाजी और निर्दलीय उम्मीदवारों के चुनावी मैदान में उतरने से आंतरिक चुनौतियों का सामना कर रही है. पार्टी की अंतिम चरण की रणनीति एक स्पष्ट उद्देश्य को दर्शाती है, जो राजनीतिक परिदृश्य पर हावी होना है. इसके साथ ही BJP किसानों के असंतोष को चुनावी लाभ में बदलने की कोशिश कर रही है.

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