पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र में BJP के जिलाध्यक्ष की कुर्सी पर क्यों बना सस्पेंस?
वाराणसी और चंदौली में जिलाध्यक्ष की घोषणा अटकी, जबकि अयोध्या में पासी चेहरे को आगे कर BJP ने सामाजिक संतुलन का संदेश दिया

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने की वजह से वाराणसी में भारतीय जनता पार्टी (BJP) संगठन का हर फैसला प्रतीकात्मक और राजनीतिक दोनों मायनों में अहम माना जाता है. यही कारण है कि प्रदेश में लगभग सभी जिलों में अध्यक्षों की घोषणा हो जाने के बाद भी वाराणसी और चंदौली में नाम तय न हो पाना अब सिर्फ संगठनात्मक प्रक्रिया का मामला नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक चर्चा का विषय बन चुका है.
26 फरवरी को प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने 11 जिलाध्यक्षों के नाम घोषित किए. इसके साथ ही 98 में से 95 सांगठनिक जिलों को अध्यक्ष मिल चुके हैं. काशी क्षेत्र के मीरजापुर में लाल बहादुर सरोज की नियुक्ति कर दी गई, लेकिन वाराणसी और चंदौली अब भी प्रतीक्षा में हैं. वाराणसी में हंसराज विश्वकर्मा लगातार तीसरी बार जिलाध्यक्ष का दायित्व संभाल रहे हैं.
जनवरी 2025 में हुए चुनाव के लिए सात महिलाओं समेत करीब 90 कार्यकर्ताओं ने नामांकन किया था. यह संख्या बताती है कि संगठन के भीतर इस पद को लेकर कितना उत्साह और प्रतिस्पर्धा है. वाराणसी में दावेदारों की सूची लंबी है और सामाजिक आधार भी व्यापक. भूमिहार समाज से सुरेश सिंह, राम प्रकाश सिंह और पवन सिंह के नाम चर्चा में हैं. ब्राह्मण चेहरों में उमेश दत्त पाठक, ज्ञानेशा जोशी, अरुण पाठक, चाणक्य त्रिपाठी, सीता मिश्रा, डॉ. रवि कुमार मिश्र और जय प्रकाश दूबे सक्रिय माने जा रहे हैं.
क्षत्रिय वर्ग से अखंड सिंह और प्रवीण सिंह गौतम की दावेदारी बताई जा रही है. पिछड़ा वर्ग से दिनेश मौर्य, सुरेंद्र पटेल, अरविंद पटेल, उषा राज मौर्य, रामशकल पटेल, प्रदाद गुप्ता और राजेश राजभर जैसे नामों की चर्चा है. पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष अपराजिता सोनकर और नवनीत श्रीवास्तव भी दौड़ में बताए जा रहे हैं. जातीय और संगठनात्मक संतुलन की यह जटिल तस्वीर ही फैसले में देरी की बड़ी वजह मानी जा रही है.
पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि अगर सहमति नहीं बनती तो अन्य जिलों की तरह मौजूदा अध्यक्ष को ही एक और कार्यकाल दिया जा सकता है. BJP खुद को विश्व की सबसे बड़ी सदस्यता वाली पार्टी और बूथ से लेकर पन्ना प्रमुख तक मजबूत ढांचे वाला संगठन बताती है. ऐसे में वाराणसी जैसे अहम जिले में निर्णय लंबित रहना कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को असहज कर रहा है. एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “कुछ औपचारिकताएं पूरी नहीं हो पाई हैं. नवरात्र से पहले वाराणसी में भी घोषणा हो जाएगी.” राजनीतिक विश्लेषक उत्पल पाठक का मानना है कि वाराणसी का मामला सिर्फ स्थानीय नहीं है, “यहां अध्यक्ष का चयन संदेश की तरह काम करता है. प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने के कारण यहां सामाजिक संतुलन, संगठन की पकड़ और 2027 की तैयारी सब एक साथ देखे जा रहे हैं. इसलिए फैसला सावधानी से होगा.”
प्रदेश स्तर पर तस्वीर देखें तो BJP ने पिछले एक वर्ष में चरणबद्ध तरीके से जिलाध्यक्ष घोषित किए हैं. 16 मार्च को 70 जिलाध्यक्षों की पहली सूची आई थी. इसके बाद 26 नवंबर को 14 नाम घोषित हुए और अब 11 और जोड़े गए. इस बीच गोंडा में निष्कासन और गोरखपुर महानगर में निधन के कारण दो पद रिक्त हुए. फिलहाल अंबेडकरनगर, वाराणसी जिला, चंदौली, देवरिया और गोरखपुर महानगर में पद खाली हैं.
ताजा सूची में जातीय समीकरणों का स्पष्ट ध्यान रखा गया है. तीन ब्राह्मण, दो-दो मौर्य और पासी, तथा एक-एक कायस्थ, ठाकुर, वैश्य और कश्यप समाज से अध्यक्ष बनाए गए हैं. पश्चिम क्षेत्र में रामजी लाल कश्यप को शामली, उदय गिरी गोस्वामी को अमरोहा, अजीत सिंह राणा को सहारनपुर और नीरज शर्मा को बागपत की जिम्मेदारी दी गई है. ब्रज क्षेत्र में गोकुल प्रसाद मौर्य को पीलीभीत, काशी क्षेत्र में लाल बहादुर सरोज को मीरजापुर और गोरखपुर क्षेत्र में दीपक मौर्य को सिद्धार्थनगर का दायित्व मिला है. अवध क्षेत्र में अरविंद गुप्ता को लखीमपुर, इकबाल बहादुर तिवारी को गोंडा, राधेश्याम त्यागी को अयोध्या और कमलेश श्रीवास्तव को अयोध्या महानगर का अध्यक्ष बनाया गया है.
अयोध्या का फैसला खासतौर पर चर्चा में है. रामनगरी में जिलाध्यक्ष के रूप में राधेश्याम त्यागी की नियुक्ति को सामाजिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है. पासी समुदाय से आने वाले त्यागी लंबे समय से संगठन में सक्रिय रहे हैं और दो बार जिला उपाध्यक्ष का दायित्व निभा चुके हैं. पूर्वांचल में पासी समाज अनुसूचित जाति की महत्वपूर्ण आबादी माना जाता है. राधेश्याम त्यागी अयोध्या से सपा सांसद अवधेश प्रसाद के इनायतनगर स्थित आवास से सटी बाजार कुचेरा के रहने वाले हैं.
BJP ने पहली बार चौंकाने वाला निर्णय करते हुए दलित पासी बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले नेता को रामनगरी की कमान सौपी है. ऐसे में अयोध्या जैसे प्रतीकात्मक जिले में इस समुदाय से चेहरा आगे करना BJP की सामाजिक रणनीति का हिस्सा समझा जा रहा है ताकि सपा के पीडीए प्लान का काउंटर किया जा सके. राजनीतिक विश्लेषक और आयोध्या के साकेत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य वी. एन. अरोड़ा कहते हैं, “अयोध्या में यह नियुक्ति सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं है. यह संदेश है कि BJP दलित समुदाय के भीतर अपनी पकड़ और गहरी करना चाहती है. खासकर तब जब विपक्ष भी इसी वर्ग में पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है.” उनका मानना है कि आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों को देखते हुए पार्टी हर जिले में सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन साध रही है.
अयोध्या में कमलेश श्रीवास्तव को लगातार दूसरी बार महानगर अध्यक्ष बनाए जाने को भी संगठन में स्थिरता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है. स्थानीय नेताओं का कहना है कि नगर क्षेत्र में संगठनात्मक गतिविधियों और बूथ प्रबंधन में उनकी सक्रियता को देखते हुए दोबारा मौका दिया गया है. यह मॉडल वाराणसी में भी लागू हो सकता है, जहां मौजूदा अध्यक्ष को दोहराने की चर्चा चल रही है. दरअसल BJP का सांगठनिक ढांचा चुनावी रणनीति से सीधे जुड़ा होता है. जिलाध्यक्ष सिर्फ प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समन्वय का केंद्र होता है. बूथ प्रबंधन, सदस्यता अभियान, प्रशिक्षण कार्यक्रम और स्थानीय मुद्दों पर पार्टी की लाइन तय करने में उसकी अहम भूमिका होती है. ऐसे में वाराणसी जैसे हाई प्रोफाइल जिले में चेहरा तय करने में जल्दबाजी से बचा जा रहा है.
चंदौली में भी स्थिति मिलती-जुलती है. जिलाध्यक्ष काशीनाथ सिंह का कार्यकाल पूरा हो चुका है और वहां भी कई दावेदार सक्रिय हैं. स्थानीय कार्यकर्ता बताते हैं कि वाराणसी के फैसले का असर चंदौली पर भी पड़ेगा क्योंकि दोनों जिले काशी क्षेत्र की राजनीतिक धुरी माने जाते हैं.
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि BJP का जोर इस समय संगठनात्मक पुनर्संरचना पर है. 2024 के बाद पार्टी अब 2027 की तैयारी में जुटी है. ऐसे में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति को माइक्रो लेवल रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. वी.एन. अरोड़ा कहते हैं, “BJPके लिए संगठन ही चुनावी मशीनरी है. अगर जिला स्तर पर संतुलन बैठ गया तो विधानसभा तक असर जाएगा.” वाराणसी में फिलहाल नजरें प्रदेश नेतृत्व पर टिकी हैं. दावेदारों की सक्रियता बढ़ गई है. बैठकें, संपर्क और समर्थन जुटाने की कोशिशें तेज हैं. हालांकि अंतिम फैसला लखनऊ में होगा; पार्टी सूत्रों का दावा है कि नवरात्र से पहले स्थिति साफ हो सकती है.