BJP संगठन में बदलाव की तैयारी लेकिन पार्टी की नजर अब जाति पर नहीं!
भाजपा UP में बूथ स्तर की ताकत दोबारा खड़ी करने में जुटी, संगठन में अनुभवी कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देकर 2027 की चुनावी मशीनरी मजबूत करने की तैयारी

भारतीय जनता पार्टी (BJP) उत्तर प्रदेश में महीने के आखिर में होने वाले बहुप्रतीक्षित सांगठनिक फेरबदल के जरिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की तैयारी में है. पार्टी इस बार प्रदेश संगठन में जातिगत संतुलन की पारंपरिक राजनीति से थोड़ा हटकर 'सांगठनिक अनुभव' और 'चुनावी प्रबंधन क्षमता' को प्राथमिकता देने जा रही है.
जानकारी के मुताबिक नई प्रदेश कार्यकारिणी में करीब 60 प्रतिशत पद ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं को दिए जाने की तैयारी है जो लंबे समय से संगठन में सक्रिय रहे हैं और बूथ स्तर से लेकर क्षेत्रीय ढांचे तक काम करने का अनुभव रखते हैं. यह रणनीति योगी आदित्यनाथ सरकार के हालिया मंत्रिमंडल विस्तार से बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है.
मंत्रिमंडल विस्तार में BJP ने स्पष्ट रूप से सामाजिक समीकरणों को साधने पर जोर दिया था. छह नए मंत्रियों में तीन OBC समुदाय से और दो दलित समुदाय से थे, जबकि पदोन्नत किए गए दोनों मंत्री भी OBC वर्ग से आए. उस विस्तार को विपक्ष के ‘PDA’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक नैरेटिव का जवाब माना गया था. BJP ने संदेश देने की कोशिश की थी कि पिछड़े और वंचित वर्ग अब भी उसके राजनीतिक समीकरण का अहम हिस्सा हैं. लेकिन अब पार्टी का फोकस सरकार से ज्यादा संगठन पर केंद्रित होता दिख रहा है.
BJP नेतृत्व मान रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को जो झटका लगा, उसका एक बड़ा कारण बूथ स्तर पर संगठनात्मक ढीलापन भी था. ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी अपने पुराने और प्रशिक्षित सांगठनिक नेटवर्क को फिर से मजबूत करना चाहती है.
दिखेंगे कई बड़े बदलाव
जानकारी के अनुसार BJP केवल प्रदेश कार्यकारिणी में बदलाव तक सीमित नहीं रहने वाली है. पार्टी की लगभग 45 सदस्यीय राज्य टीम के साथ-साथ छह सांगठनिक क्षेत्रों, काशी, गोरखपुर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध, ब्रज और कानपुर-बुंदेलखंड की इकाइयों में भी बड़े स्तर पर फेरबदल की तैयारी है. इसके अलावा पार्टी के सातों मोर्चों में भी नई नियुक्तियां हो सकती हैं. प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह पिछले कई महीनों से इस पर लगातार मंथन कर रहे हैं. कोर कमेटी की बैठकों से लेकर दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व के साथ हुई चर्चाओं तक, संगठन को लेकर कई दौर की रणनीतिक बैठकों का दौर चला है.
नेताओं का कहना है कि नई सूची लगभग तैयार है और अब केवल केंद्रीय नेतृत्व की अंतिम मंजूरी बाकी है. 19 मई को पंकज चौधरी का दिल्ली दौरा भी इसी संदर्भ में काफी अहम माना जा रहा है. पार्टी के भीतर चर्चा है कि इसी दौरान शीर्ष नेतृत्व के साथ अंतिम नामों और संतुलन पर सहमति बन गई होगी.
जातीय समीकरण बनाम संगठनात्मक दक्षता
उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से जातिगत समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. समाजवादी पार्टी (सपा) जहां यादव-मुस्लिम समीकरण पर भरोसा करती रही है, वहीं बहुजन समाज पार्टी दलित राजनीति की धुरी रही है. BJP ने 2014 के बाद गैर-यादव OBC, गैर-जाटव दलित और सवर्ण वोटों का व्यापक गठजोड़ तैयार कर अपनी ताकत बढ़ाई थी.
लेकिन BJP के भीतर अब यह समझ बन रही है कि केवल सामाजिक इंजीनियरिंग चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त नहीं है. पार्टी का मानना है कि उसकी सबसे बड़ी ताकत बूथ स्तर की चुनावी मशीनरी रही है. ‘पन्ना प्रमुख’, बूथ समितियां, सेक्टर प्रभारी और वैचारिक कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क BJP को अन्य दलों से अलग बनाता रहा है. एक वरिष्ठ BJP पदाधिकारी के अनुसार, “2024 के चुनाव में यह महसूस किया गया कि कई जगह संगठनात्मक नेटवर्क उतना सक्रिय नहीं था जितना पहले हुआ करता था. दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन ने दलितों, गैर-यादव OBC और मुसलमानों को उम्मीद से ज्यादा प्रभावी ढंग से एकजुट कर लिया. अब पार्टी संगठन को दोबारा उसी धार पर लाना चाहती है.” यही वजह है कि इस बार संगठन में 'विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता’, 'मैदान पर सक्रियता' और 'चुनावी प्रबंधन क्षमता' जैसे मानकों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है.
पुराने चेहरों की दिल्ली शिफ्टिंग की तैयारी!
प्रदेश संगठन में फेरबदल के साथ-साथ BJP के भीतर एक और महत्वपूर्ण चर्चा चल रही है. पार्टी अपने कई अनुभवी नेताओं को प्रदेश से हटाकर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भेज सकती है. इसे एक तरह से “सम्मानजनक पुनर्स्थापन” के रूप में देखा जा रहा है, ताकि प्रदेश संगठन में नए चेहरों के लिए जगह बनाई जा सके. जानकारी के मुताबिक जिन नेताओं के नाम चर्चा में हैं उनमें अमर पाल मौर्य, गोविंद नारायण शुक्ल, पंकज सिंह, संतोष सिंह और विजय बहादुर पाठक जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं. ये सभी लंबे समय से प्रदेश संगठन में अहम भूमिकाओं में रहे हैं.
संतोष सिंह पांच बार मंत्री और दो बार प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुके हैं. फिलहाल वे MLC होने के साथ ब्रज क्षेत्र के प्रभारी भी हैं. विजय बहादुर पाठक संगठन और मीडिया दोनों मोर्चों पर लंबे समय तक सक्रिय रहे है. वे दो बार प्रदेश महामंत्री और दो बार उपाध्यक्ष रह चुके हैं. इसी तरह अमर पाल मौर्य लगातार दो कार्यकाल से प्रदेश महामंत्री हैं और उन्हें राज्यसभा भी भेजा जा चुका है. गोविंद नारायण शुक्ल तीन अलग-अलग प्रदेश अध्यक्षों के साथ महामंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. पंकज सिंह, अनूप गुप्ता और सलिल बिश्नोई जैसे नेता भी लंबे समय से संगठनात्मक ढांचे का हिस्सा रहे हैं. पार्टी के भीतर यह धारणा बन रही है कि इन नेताओं के अनुभव का उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर किया जा सकता है, जबकि प्रदेश में अपेक्षाकृत युवा और ज्यादा सक्रिय चेहरों को जिम्मेदारी दी जाए.
निगमों और बोर्डों में भी हो सकता है समायोजन
BJP केवल संगठनात्मक बदलाव तक सीमित नहीं रहना चाहती. पार्टी नेताओं के अनुसार पुराने और अनुभवी कार्यकर्ताओं को विभिन्न बोर्डों, निगमों और आयोगों में समायोजित करने पर भी विचार किया जा रहा है. हाल के महीनों में BJP पहले ही विभिन्न नगर निगमों में लगभग 2800 कार्यकर्ताओं को पार्षद के तौर पर नामित कर चुकी है. इसे कार्यकर्ताओं को राजनीतिक और प्रशासनिक भागीदारी देने की रणनीति के तौर पर देखा गया. अब संभावना जताई जा रही है कि संगठन में जगह खाली करने के लिए कुछ वरिष्ठ नेताओं और लंबे समय से सक्रिय कार्यकर्ताओं को निगमों और बोर्डों में जिम्मेदारी दी जा सकती है. इससे एक तरफ नए चेहरों के लिए जगह बनेगी, वहीं पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी नियंत्रित रहेगी.
BJP के लिए उत्तर प्रदेश केवल एक राज्य नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र है. लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें देने वाला यह राज्य 2027 में BJP की राजनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा. पार्टी नेतृत्व की चिंता यह भी है कि पश्चिम बंगाल, बिहार और असम के बाद अब सबसे बड़ा राजनीतिक संघर्ष उत्तर प्रदेश में ही होना है. समाजवादी पार्टी 2024 के प्रदर्शन से उत्साहित है और PDA नैरेटिव को आगे बढ़ा रही है. कांग्रेस भी गठबंधन के सहारे अपनी खोई जमीन तलाशने की कोशिश कर रही है. ऐसे में BJP संगठन को चुनावी मोड में लाना चाहती है. पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि 2027 तक बूथ स्तर का नेटवर्क पूरी तरह सक्रिय हो जाए और हर विधानसभा क्षेत्र में संगठनात्मक समन्वय मजबूत हो. यही वजह है कि इस बार संगठन में केवल जातीय प्रतिनिधित्व नहीं बल्कि “चुनाव जिताने की क्षमता” सबसे बड़ा पैमाना बनता दिख रहा है.
क्या BJP सामाजिक समीकरणों से दूरी बना रही है?
BJP संगठनात्मक अनुभव पर जोर दे रही है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पार्टी जातीय संतुलन को पूरी तरह नजरअंदाज करेगी. उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व अब भी बेहद अहम है और BJP इस वास्तविकता को अच्छी तरह समझती है. दरअसल पार्टी अब 'डबल बैलेंस' की रणनीति अपनाती दिख रही है. सरकार में सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठन में अनुभवी चुनावी प्रबंधन. मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए BJP ने OBC और दलित वर्गों को राजनीतिक संदेश दिया, जबकि संगठनात्मक फेरबदल के जरिए वह चुनावी मशीनरी को दुरुस्त करना चाहती है. BJP नेतृत्व मान रहा है कि 2024 में विपक्ष ने सामाजिक गठजोड़ के जरिए जो चुनौती पेश की, उसका मुकाबला केवल प्रतीकात्मक राजनीति से नहीं बल्कि मजबूत संगठनात्मक ढांचे से ही किया जा सकता है.
प्रदेश संगठन में होने वाला यह फेरबदल केवल नियमित बदलाव नहीं माना जा रहा. इसे 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी के पहले बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है. BJP अब यह संदेश देना चाहती है कि चुनाव केवल चेहरों या नारों से नहीं, बल्कि जमीन पर काम करने वाले संगठित कैडर से जीते जाते हैं. यदि पार्टी अपने पुराने बूथ नेटवर्क को दोबारा सक्रिय करने में सफल होती है, तो वह विपक्ष के PDA नैरेटिव की धार को कमजोर करने की कोशिश करेगी. लेकिन अगर सामाजिक असंतोष और संगठनात्मक थकान दोनों एक साथ बढ़ते हैं, तो BJP के सामने चुनौती भी उतनी ही बड़ी हो सकती है.