साध्वी निरंजन ज्योति से BJP साध पाएगी अपनी दोहरी रणनीति?
NCBC में साध्वी निरंजन ज्योति की नियुक्ति से BJP ने गैर-यादव OBC, खासकर निषाद समुदाय को साधने, सहयोगियों को संकेत देने और ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ रणनीति को धार देने की कोशिश की है

उत्तर प्रदेश की सियासत में जातीय समीकरणों और वैचारिक संदेशों का संतुलन हमेशा से निर्णायक रहा है. ऐसे में साध्वी निरंजन ज्योति को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) का अध्यक्ष बनाए जाने का फैसला केवल एक नियुक्ति भर नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) की व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. खासकर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले यह कदम ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ और गैर-यादव OBC राजनीति के संयोजन को और धार देने की कोशिश है.
दरअसल, पिछले कुछ चुनावों में यह साफ हुआ है कि BJP के लिए सबसे बड़ी चुनौती उन सामाजिक वर्गों में अपनी पकड़ बनाए रखना है, जो परंपरागत रूप से उसके कोर वोटर नहीं रहे. 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में BJP को जो झटका लगा, उसमें एक कारण यह भी माना गया कि विपक्ष की ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति ने कुछ हद तक असर दिखाया. खासकर समाजवादी पार्टी ने गैर-यादव OBC वर्गों को साधने की कोशिश तेज की, जिससे BJP के सामाजिक समीकरणों में हलचल दिखी.
इसी पृष्ठभूमि में पूर्व सांसद साध्वी निरंजन ज्योति की नियुक्ति को समझना जरूरी है. वे निषाद समुदाय से आती हैं, जो उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अहम लेकिन लंबे समय तक उपेक्षित सामाजिक वर्ग रहा है. विभिन्न आकलनों के मुताबिक, राज्य की कुल आबादी में निषाद समुदाय की हिस्सेदारी 4 से 7 प्रतिशत के बीच है. प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में मुख्यतः नदियों के किनारे रहने वाली जातियों को पूर्वांचल में इन्हें आमतौर पर निषाद, पश्चिम में कश्यप, फर्रुखाबाद में बाथम, झांसी के आसपास रैकवार के नाम से जाना जाता है. पूर्वांचल और बुंदेलखंड के कई जिलों में इस समुदाय का प्रभाव निर्णायक है. प्रयागराज, वाराणसी, गाजीपुर, मिर्जापुर से लेकर हमीरपुर और फतेहपुर तक निषाद समाज की मजबूत मौजूदगी है.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि BJP ने पिछले एक दशक में गैर-यादव OBC वर्गों पर खास फोकस किया है. यादवों का झुकाव परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी की ओर रहा है, जबकि कुर्मी, निषाद, मौर्य, कश्यप, लोध जैसे समुदायों को साधने के लिए BJP ने लगातार प्रयास किए हैं. पंकज चौधरी जैसे कुर्मी नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाना और अब निरंजन ज्योति को NCBC की कमान देना इसी रणनीति का हिस्सा है. NCBC एक संवैधानिक निकाय है, जिसका काम पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा करना और सरकार को सुझाव देना है. हालांकि इसके पास प्रत्यक्ष कार्यकारी शक्तियां सीमित हैं, लेकिन इसका प्रतीकात्मक महत्व काफी बड़ा है. ऐसे में इसके शीर्ष पद पर किसी प्रभावशाली OBC नेता को बैठाना एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश देता है कि पार्टी पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर है.
लखनऊ के बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में प्राफेसर सुशील पांडेय के मुताबिक, “यह नियुक्ति दो स्तरों पर काम करती है. एक तरफ यह गैर-यादव OBC वर्गों को यह भरोसा दिलाती है कि सत्ता में उनकी हिस्सेदारी है, वहीं दूसरी तरफ हिंदुत्व की वैचारिक लाइन को भी कमजोर नहीं होने देती.”
पांडेय के मुताबिक BJP का ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ मॉडल अब केवल धार्मिक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सामाजिक न्याय की भाषा भी जोड़ी जा रही है. साध्वी निरंजन ज्योति का प्रोफाइल इस रणनीति के लिए बेहद उपयुक्त माना जाता है. उनका राजनीतिक और सामाजिक सफर हिंदुत्व और OBC पहचान, दोनों का मिश्रण है.
बुंदेलखंड के हमीरपुर जिले के पटेवरा गांव में जन्मी ज्योति ने साध्वी जीवन अपनाने के बाद विश्व हिंदू परिषद और दुर्गा वाहिनी के जरिए अपनी पहचान बनाई. राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान उनकी सक्रियता ने उन्हें भगवा राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल कर दिया. वर्ष 2012 में उन्होंने हमीरपुर से विधानसभा चुनाव जीतकर मुख्यधारा की राजनीति में मजबूत एंट्री की. इसके बाद 2014 और 2019 में फतेहपुर लोकसभा सीट से लगातार जीत हासिल कर उन्होंने खुद को एक मजबूत जनाधार वाली नेता के तौर पर स्थापित किया. नरेंद्र मोदी सरकार में उन्हें खाद्य प्रसंस्करण, उपभोक्ता मामले और ग्रामीण विकास जैसे मंत्रालयों में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली.
हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें नरेश उत्तम पटेल से करीब 30 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा. इस हार के बाद उनकी सक्रियता कुछ कम हो गई थी और उन्हें संगठन में नई भूमिका दिए जाने की अटकलें लग रही थीं. ऐसे में NCBC का अध्यक्ष बनाया जाना उनके राजनीतिक पुनरुत्थान के तौर पर भी देखा जा रहा है. विश्लेषकों का मानना है कि BJP अपने उन नेताओं को भी संतुलित तरीके से साधती है, जो चुनावी हार के बाद हाशिए पर जा सकते हैं. इससे पार्टी के भीतर असंतोष कम होता है और नेतृत्व के प्रति भरोसा बना रहता है. निरंजन ज्योति के मामले में भी यही रणनीति नजर आती है.
इस नियुक्ति का एक और महत्वपूर्ण पहलू निषाद समुदाय की राजनीति से जुड़ा है. पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में निषाद समाज की राजनीतिक चेतना तेजी से बढ़ी है. इस वर्ग ने अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश भी की है और कई बार सत्ता के साथ मोलभाव की स्थिति में भी रहा है. BJP इस वर्ग को अपने स्थाई वोट बैंक में बदलना चाहती है. लेकिन चुनौती अपने सहयोगी दल निषाद पार्टी को भी साधे रखने की है. राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद की आरक्षण की मांग और साध्वी निरंजन ज्योति की राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग में नियुक्ति, दोनों मिलकर उत्तर प्रदेश की OBC राजनीति का नया समीकरण रचते दिख रहे हैं.
निषाद पार्टी लंबे समय से निषाद समुदाय को अलग से आरक्षण या उप-वर्गीकरण का लाभ दिलाने की मांग उठाती रही है. ऐसे में BJP द्वारा ज्योति को NCBC की कमान देना यह संकेत भी है कि वह इस मुद्दे को संस्थागत स्तर पर संबोधित करने का रास्ता खोल रही है. यह संतुलन साधने की कोशिश है- एक तरफ सहयोगी दल की मांग, दूसरी तरफ व्यापक OBC राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करना.
राजनीतिक विश्लेषक और मेरठ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर विवेक नौटियाल बताते हैं, “निषाद समुदाय की भौगोलिक स्थिति भी अहम है. यह वर्ग उन इलाकों में ज्यादा है, जहां चुनावी मुकाबले करीबी होते हैं. ऐसे में थोड़ी सी वोट शिफ्ट भी सीटों के नतीजे बदल सकती है.” इसलिए BJP इस वर्ग को केवल चुनावी गठबंधन के जरिए नहीं, बल्कि संस्थागत प्रतिनिधित्व देकर अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है. साध्वी निरंजन ज्योति की छवि भी इस काम में मददगार हो सकती है.
हालांकि, उनके करियर में विवाद भी रहे हैं. 2014 में एक बयान को लेकर उन्हें तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा था. उन्होंने दिल्ली में होने वाले चुनावों पर कहा था,''दिल्ली में या तो रामजादों (राम के पुत्रों) की सरकार बनेगी या फिर हरामजादों की.'' इस टिप्पणी के बाद उन्होंने माफी भी मांगी. लेकिन इस तरह के विवादों ने उनकी ‘बेबाक’ नेता की छवि को भी मजबूत किया, जो BJP के कोर समर्थकों के बीच उन्हें लोकप्रिय बनाता है.
अब सवाल यह है कि क्या यह नियुक्ति वास्तव में BJP को राजनीतिक बढ़त दिला पाएगी? इस पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है. कुछ का मानना है कि केवल प्रतीकात्मक कदम काफी नहीं होते, बल्कि जमीन पर नीतियों और योजनाओं का असर ज्यादा मायने रखता है. वहीं, अन्य विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय राजनीति में प्रतीक और संदेश भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं. विवेक नौटियाल के मुताबिक, “BJP की ताकत यही है कि वह प्रतीक और नीति, दोनों को साथ लेकर चलती है. NCBC में यह नियुक्ति प्रतीकात्मक जरूर है, लेकिन इसके जरिए जो संदेश जा रहा है, वह आने वाले चुनावों में कितना असर डालेगा यह तो भविष्य में ही पता चलेगा.”