BJP के मुख्यमंत्री वाली सरकार नीतीश के एजेंडे पर चलेगी या अपनी अलग राह बनाएगी?

नीतीश कुमार की सरकार में रहते हुए BJP कभी बिहार में अपना एजेंडा आगे नहीं बढ़ा पाई लेकिन नई सरकार में उसके पास यह मौका रहेगा

नीतीश कुमार BJP अध्यक्ष नितिन नवीन और उपमुख्यमंत्रियों - सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा के साथ (फाइल फोटो)

राजधानी पटना के लोकभवन के आसपास का इलाका एक बार फिर राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया है. लोकभवन, सीएम नीतीश कुमार का आवास और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का घर- नेताओं, विधायकों और मंत्रियों की बैठकों से गुलजार है. 

सीएम नीतीश कुमार का इस्तीफा तय मान लिया गया है. बिहार की नई सरकार भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व में बनने वाली है और उसकी संरचना नए सिरे से तय हो रही है.

इस गहमागहमी के बीच भी सीएम नीतीश कुमार सारण जिले का दौरा करने का वक्त निकाल लेते हैं और पटना-बेतिया एक्सप्रेस के निर्माण का जायजा लेते हैं. ऐसा लगता नहीं है कि एक ही दिन बाद वे इस जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएंगे. और अगर मुक्त हो जाते हैं, तो आगे बिहार में उनकी भूमिका क्या होगी?

इस बीच BJP नेता और मौजूदा सरकार में कृषि मंत्री रामकृपाल यादव पत्रकारों से बातचीत में कहते हैं, “जो नई सरकार बनेगी वह नीतीश कुमार के मार्गदर्शन से ही चलेगी. उनके भावों के अनुकूल ही सरकार काम करके बिहार की जनता का कल्याण करेगी. उनका सपना है कि 2030 तक बिहार को विकसित राज्य बनाएं, नई सरकार उनके इस सपने को साकार करेगी.” नई सरकार और बिहार में पहली बार BJP का मुख्यमंत्री बनने से पहले रामकृपाल यादव की इस टिप्पणी को महत्वपूर्ण माना जा सकता है.

हालांकि इससे पहले भी कुछ BJP नेता, जिनमें डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी भी शामिल हैं, इस तरह की बातें कर चुके हैं. JDU के नेता तो बार-बार कहते हैं कि अगली सरकार नीतीश कुमार के एजेंडे पर ही काम करेगी और उन्हीं के मार्गदर्शन में चलेगी. वे इसकी वजह बताते हुए कहते हैं कि चूंकि बीते साल बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को जीत नीतीश कुमार के चेहरे और उनके कामकाज पर ही मिली थी, इसलिए ऐसा करना जरूरी है.

मगर सवाल यह है कि क्या सचमुच नई सरकार नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में चलेगी और उनके एजेंडे का पालन करेगी? या फिर यह सिर्फ रस्मअदायगी और कहने की बात बनकर रह जाएगी?

दरअसल 2005 में जब से बिहार में एनडीए की सरकार बनी और नीतीश कुमार सीएम बने, सरकार उनके एजेंडे पर ही चलती रही. BJP इस दौरान लगभग 17 साल उनके साथ सरकार में शामिल रही. मगर नीतीश ने लगातार कोशिश की कि BJP का हिंदुत्ववादी एजेंडा बिहार में लागू न हो. पहले इसके लिए 'कॉमन मिनिमम प्रोग्राम' तैयार हुआ था. बाद में भी नीतीश अपने तरीके से BJP के एजेंडे को बिहार में लागू होने से रोकते रहे. जब भी नीतीश को लगा कि वे BJP के एजेंडे को रोकने में विफल हो रहे हैं, उन्होंने BJP का साथ छोड़ दिया. उन्होंने राजद के साथ मिलकर दो बार सरकार बनाई.

दरअसल BJP और JDU की असहमतियां सिर्फ हिंदुत्ववादी एजेंडे को लेकर नहीं रही हैं. अपराध नियंत्रण के तौर-तरीकों में भी BJP और नीतीश के बीच अंतर्विरोध रहा है. खासकर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद से बिहार के BJP नेताओं की ख्वाहिश थी कि बिहार में भी यूपी जैसा ही एनकाउंटर और बुलडोजर फॉर्मूला लागू हो. लेकिन नीतीश अपराध नियंत्रण की अपनी लीक पर चलते रहे. वे आर्म्स एक्ट और स्पीडी ट्रायल की नीति पर अडिग रहे. भ्रष्टाचार को लेकर भी उनकी अपनी नीति रही. वे कहते रहे कि वे “क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म से समझौता नहीं करेंगे.”

नीतीश भले BJP के साथ मिलकर सरकार चलाते रहे, मगर उनके कामकाज के तरीके में समाजवाद और गांधीवाद शामिल रहा. एक दौर ऐसा भी रहा जब गुजरात और बिहार के आर्थिक मॉडल की बहस चलती थी. यह 2010 के आसपास की बात है, जब नीतीश ने आर्थिक विकास के लिए अमर्त्य सेन के मॉडल को तरजीह दी थी. ‘न्याय के साथ विकास’ उनका नारा रहा. बिहार के सरकारी दफ्तरों में आज भी गांधी की वह उक्ति दर्ज है: "प्रकृति के पास हर व्यक्ति की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन एक व्यक्ति के लालच को पूरा करने के लिए नहीं." इस तरह वे असंतुलित विकास के पूंजीवादी मॉडल का विरोध करते रहे, जबकि BJP पर आरोप लगता है कि BJP पूंजीवादी मॉडल की समर्थक है.

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब बिहार में BJP अपना पहला मुख्यमंत्री बनाने की स्थिति में है, तो क्या वह अगले पांच साल नीतीश के तौर-तरीकों पर चलेगी और उनका मार्गदर्शन लेती रहेगी? या फिर वह अपना एजेंडा लागू करने की कोशिश करेगी?

इस सवाल के जवाब में राजनीतिक विश्लेषक प्रवीण बागी कहते हैं, “मेरे हिसाब से BJP की प्राथमिकता होगी कि वह नीतीश कुमार के काम को आगे बढ़ाए और अधूरे काम को पूरा करे. मगर पार्टी की नजर इस बात पर जरूर होगी कि अपनी नीतियों की वजह से नीतीश जहां चूके, उसमें सुधार करे. जैसे भ्रष्टाचार का मामला है, नौकरशाही के बेलगाम होने का मामला है, बढ़ते अपराध और वित्तीय अनियमितताओं पर वह सख्ती से लगाम लगाने की कोशिश करेगी. ताकि वह नीतीश कुमार के कामकाज से बनी उनकी छवि के समानांतर दिखे या कुछ मामलों में आगे नजर आए.”

वे आगे यह भी जोड़ते हैं, “कहने को जरूर BJP कहती रहेगी कि वह नीतीश कुमार के एजेंडे पर ही काम कर रही है, मगर वह जरूर चाहेगी कि कुछ ऐसा काम करे जिससे JDU नेता की स्मृति लोगों के दिमाग से ओझल हो सके. अभी जो कहा जाता है कि सरकार नीतीश के मार्गदर्शन में चलेगी, यह तो बस मुंह पोंछने वाली बात है. ताकि कम से कम उनके समर्थकों में यह नाराजगी न रहे कि उन्हें चार महीने में ही हटा दिया गया. मगर सीएम तो अपने तरीके से चलेगा. जब इनकी पार्टी के जीतनराम मांझी इनके हिसाब से नहीं चले, तो BJP का सीएम क्यों इनके हिसाब से चलेगा? अब तक तो BJP बिहार में पिछलगुआ पार्टी मानी जाती रही है, अब क्यों वह पिछलगुआ बनी रहेगी?”

वहीं टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, “मुझे लगता है कुछ दिन तक नीतीश के प्रति नई सरकार इस तरह की विनम्रता दिखाएगी. बड़े फैसले के वक्त उन्हें बुलाया जा सकता है या उनके आवास पर जाकर मार्गदर्शन लिया जा सकता है. यह कहा जाता रहेगा कि नीतीश के हिसाब से ही सरकार चल रही है, मगर यह सब प्रतीकात्मक रहेगा. उनका सरकार में कोई दखल होगा, ऐसा मुमकिन नहीं लगता.”

वे आगे कहते हैं, “यह इसलिए भी किया जाएगा क्योंकि BJP बिहार में नीतीश के समर्थक मतदाताओं का भरोसा अब तक हासिल नहीं कर पाई है. इनमें अति पिछड़े, महिलाएं और उनकी अपनी जाति के लोग शामिल हैं. इसलिए अभी उनका सम्मान जारी रहेगा. एक बार जब उनके सोशल बेस का ट्रांसफर हो गया, तो फिर उनका यह सम्मान भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा.”

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