BJP की बंगाल रणनीति : अमित शाह ने हर बूथ के लिए तैयार की 'साइलेंट स्ट्रेटजी'

BJP का चुनाव प्रचार बयानबाजी से ऊपर गणित को प्राथमिकता देता है. पार्टी क्षेत्रवार रणनीति बनाती है और हर बूथ पर मिलने वाले एक-एक अतिरिक्त वोट को बेहद महत्वपूर्ण मानती है

प. बंगाल में BJP का घोषणा पत्र जारी करते अमित शाह (फाइल फोटो)

पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है. अब यह साफ दिख रहा है कि चुनौती देने वाली BJP ने ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के खिलाफ अपनी रणनीति पूरी तरह बदल ली है. यह रणनीति 2021 की तुलना में ज्यादा तेज, गहरी और बहुत कम बयानबाजी वाली है.

2021 में BJP का प्रचार ममता बनर्जी को लेकर ज्यादा व्यक्तिगत हो गया था, जो उस पर उल्टा पड़ गया था. पिछले विधानसभा चुनाव में BJP की रैलियों में 'दीदी ओ दीदी' और 'पिशी जाओ' जैसे नारे लग रहे थे, तब ममता ने अपने ऊपर हुए इन व्यक्तिगत हमले को राजनीतिक पूंजी में बदल दिया था.

TMC नेता ने BJP के आक्रामक प्रचार के खिलाफ चोटिल पैर के साथ व्हीलचेयर पर बैठकर चुनाव प्रचार किया. इतना ही नहीं ममता ने TMC के 'खेला होबे' के चुनावी नारे को और भी बुलंद किया और अल्पसंख्यकों और महिलाओं को मजबूती से अपने पीछे एकजुट किया.

इसके बाद जो हुआ, वह सबने देखा. चुनाव परिणाम एक लिहाज से चौंकाने वाले थे. BJP को 2021 के विधानसभा चुनावों में 38.1 फीसद वोट मिले, लेकिन केवल 77 सीटें ही हासिल हुईं. वहीं, TMC ने अपने 48 फीसद वोट शेयर को 215 सीटों में तब्दील कर दिया. BJP की हार की पेचीदगियां और भी ज्यादा चौंकाने वाली थीं. पार्टी ने 40 से अधिक सीटें 10,000 से कम वोटों के अंतर से और लगभग 20 सीटें 5,000 से कम वोटों के अंतर से गंवाईं. BJP को उम्मीद है कि 2026 में वह इसी अंतर को पाटने में सफल होगी.

2021 की हार और 2024 के लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद BJP ने अपना स्थानीय समर्थन आधार फिर से हासिल करने के लिए प्रयास किए. अमित शाह के वफादार सुनील बंसल को प्रभारी बनाकर पार्टी ने संगठनात्मक ढांचे के पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया. इसका असर इस बार की रणनीति में भी दिखता है. 2021 के विपरीत, BJP ने दलबदलुओं और मशहूर हस्तियों को टिकट देने में कटौती की. जोर उन उम्मीदवारों पर था, जिनकी स्थानीय स्तर पर विश्वसनीयता और कार्यकर्ताओं का समर्थन हो. प्रत्येक बूथ स्तर पर 200-300 वोट जुटाने की उम्मीदवारों की क्षमता एक स्पष्ट मापदंड थी.

बंगाल में चुनावी लड़ाई बूथों पर आकर टिक जाती है. राज्य में 294 विधानसभा क्षेत्र हैं. प्रत्येक क्षेत्र में लगभग 250-300 बूथ हैं. ज्यादातर सीटों का फैसला 1,500-5,000 वोटों के अंतर से होता है. इसका मतलब है कि कुछ बूथ ही संभावित रूप से चुनाव परिणाम तय कर सकते हैं. BJP की पन्ना प्रमुख प्रणाली के तहत, प्रत्येक कार्यकर्ता 50-60 मतदाताओं को मैनेज करता है. अगर वे प्रति बूथ 10 मतदाता जोड़ पाते हैं, तो पार्टी को प्रति सीट लगभग 3,000 वोटों का लाभ होता है, जो कड़े मुकाबले वाले चुनावों में निश्चित रूप से एक बड़ा फायदा है.

BJP के बड़े नेताओं के भाषण के लहजे में आया यह बदलाव जानबूझकर किया गया है. ममता पर व्यक्तिगत हमले बंद हो गए हैं. हिंदुत्व को खास तरीके से पेश किया जा रहा है. हुमायूं कबीर और BJP के बीच कथित तौर पर हुए समझौते का संकेत देने वाला एक वीडियो बीते दिनों खूब वायरल हुआ. इस वीडियो के लीक होने के बाद भी पार्टी ने न तो आक्रामक प्रतिक्रिया दी और न ही ममता को निशाना बनाया. उसने नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी तीखी प्रतिक्रिया देने की अनुमति नहीं दी.

BJP का चुनावी अभियान TMC शासन में कथित भ्रष्टाचार, कल्याणकारी योजनाओं के वितरण में कमियों और कानून-व्यवस्था की समस्याओं पर केंद्रित है. अंदरूनी गुणा-भाग से साफ है कि 2021 के आक्रामक भाषणों ने पार्टी को एकजुट करने का काम किया. इसके अलावा, मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में BJP को लगभग 80 सीटें गंवानी पड़ीं, साथ ही कोलकाता क्षेत्र में पार्टी के विस्तार को भी सीमित कर दिया.

अमित शाह का वॉर-रूम

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका इस बदलाव को सबसे अच्छे तरीके से दिखाती है. उन्होंने अब तक बंगाल में लगभग 15 दिन बिताए हैं. इस दौरान उन्होंने न केवल चुनाव प्रचार किया बल्कि एक रणनीतिक बैठक (वॉर-रूम) का संचालन भी किया. शाह ने महेश शर्मा, सीपी जोशी और संजय भाटिया जैसे सांसदों को स्थानीय स्तर पर समन्वय स्थापित करने, चुनाव प्रचार को दिशा देने और संसाधनों को जुटाने के लिए तैनात किया है.

यह लगभग वैसा ही है जैसा शाह ने पिछले साल बिहार चुनावों के लिए किया था. उन्होंने उत्तर बंगाल, जंगलमहल, सीमावर्ती जिलों और औद्योगिक क्षेत्रों में बारीकी से योजनाबद्ध तरीके से दौरे किए हैं. मुख्य रूप से पार्टी के जरिए चिह्नित 100-120 'जीतने योग्य' और 80-100 'प्रतिस्पर्धी' सीटों पर शाह ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.

उनका लक्ष्य मौजूदा सीटों को बरकरार रखना और 40-50 नई सीटें जीतना है. इससे BJP का लक्ष्य 135-160 सीटें हो जाता है. पश्चिम बंगाल में 148 साधारण बहुमत का आंकड़ा है. पार्टी का अनुमान है कि राज्यव्यापी स्तर पर 3-5 फीसद मतदान में बदलाव से यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है. इसका यह भी मतलब होगा कि हर बूथ पर बड़ी संख्या में BJP को अतिरिक्त मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है, लेकिन चुनौतियां गंभीर हैं.

प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों में अल्पसंख्यक वोट एकजुट हो सकता है. ममता बनर्जी की कल्याणकारी नीतियों के प्रति मतदाताओं की वफादारी बरकरार रह सकती है. BJP को 'बाहरी' होने का टैग अब भी सता रहा है. इसके अलावा, ममता बनर्जी एक सशक्त प्रचारक बनी हुई हैं.

पर्दे के पीछे, BJP ने पिछले चुनावों के आंकड़ों के आधार पर 294 निर्वाचन क्षेत्रों को समूहों में विभाजित किया है. कार्यकर्ताओं के जरिए घर-घर जाकर संपर्क करने का काम जल्दी शुरू हो गया था. चुनाव तिथियों की घोषणा से पहले ही, संघ परिवार के कार्यकर्ताओं ने छोटे समूहों में 100,000 से अधिक बैठकें पूरी कर ली थीं.

इनमें कल्याणकारी योजनाओं के वितरण संबंधी मुद्दे, बांग्लादेशी घुसपैठ, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था, विशेष रूप से 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार और हत्या का मुद्दा उठाया गया था. BJP ने उत्तर 24 परगना के पानीहाटी सीट से मृतक डॉक्टर की मां को उम्मीदवार बनाया है.

BJP के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि एक मतदान केंद्र (बूथ) में आमतौर पर 900 से 1,200 मतदाता होते हैं.  2021 में पार्टी कई सीटें सिर्फ 150 से 300 वोटों के अंतर से हारी थीं. अमित शाह का निर्देश बहुत साफ और स्पष्ट है कि हर बूथ पर 10 से 15 अतिरिक्त वोट जोड़ो. 250 से 300 बूथों वाले एक विधानसभा क्षेत्र में यह 2,500 से 3,500 अतिरिक्त वोट बन जाता है, जो कई सीटों को पलटने के लिए काफी हो सकता है.

BJP यह बात समझती है कि बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में समीकरण अलग-अलग हैं. प्रत्येक क्षेत्र की निगरानी एक केंद्रीय मंत्री और संगठन के एक अनुभवी नेता (जिनमें से अधिकांश संघ के प्रचारक हैं) के जरिए की जा रही है.

उत्तर बंगाल, BJP का सबसे मजबूत क्षेत्र है, यहां पार्टी के वोट शेयर में 2014 के लोकसभा चुनाव की तुलना में 20 फीसद का इजाफा 2019 में हुआ था. 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी को यहां 8 में से 7 लोकसभा सीटों पर जीत मिलीं. कई महत्वपूर्ण सीटों पर वोट शेयर 50 फीसद से ऊपर चला गया था.

2021 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में 30 से ज्यादा सीटों पर पार्टी को सफलता मिली. 2024 में भी BJP का वोट शेयर 45-49 फीसद के बीच रहा. 2026 के चुनाव में BJP की रणनीति यहां राजबंशी समुदाय पर आधारित रहा. यहां इस समुदाय के करीब 10 लाख से ज्यादा चाय बागान मजदूर रहते हैं. इसलिए यहां BJP की रणनीति इनकी परेशानी और सीमा सुरक्षा पर केंद्रित है. BJP के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि अगर सिर्फ 2 फीसद वोट भी अगर स्विंग हुए तो पार्टी यहां 35-40 सीटें जीत सकती है.

जंगलमहल में मुकाबला काफी कड़ा है. 2014 में BJP को यहां 10 फीसद से भी कम वोट मिले थे लेकिन 2019 उसने वोट हिस्सेदारी 35-42 फीसद तक बढ़ा ली. 2021 में BJP यहां 18 सीटें जीती थीं. अब स्थिति में बदलाव के संकेत दिख रहे हैं. हालांकि, इस बार भी 15-20 सीटें निर्णायक दौर में हैं. वोट शेयर में 2-3 फीसद का बदलाव पार्टी के पक्ष में 5-7 सीटें पलट सकता है.

यहां के चुनाव प्रचार में ममता बनर्जी की कल्याणकारी योजनाओं की तुलना नरेंद्र मोदी सरकार की योजनाओं से की जा रही है. बंगाल सरकार की लक्ष्मी भंडार योजना, जिससे राज्य की 200 लाख से अधिक महिलाओं को लाभ मिल रहा है. इस योजना का यहां व्यापक प्रभाव है. वहीं BJP मोदी के विस्तारित और राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत कल्याणकारी योजनाओं के वादे को जोर-शोर से पेश कर रही है. पार्टी महिलाओं को प्रति माह 2,000 से 3,000 रुपए तक की राशि देने का प्रस्ताव भी रख रही है.

दक्षिण बंगाल में वोट में बदलाव एक बड़ी समस्या है. 2021 में BJP उम्मीदवारों को 70,000-90,000 वोट मिले, फिर भी वे हार गए. यही पैटर्न 2024 में भी दोहराया गया. अब BJP की यहां रणनीति यह है कि मतदान फीसद को 3-5 फीसद तक बढ़ाया जाए. इसके अलावा, प्रति सीट 3,000-6,000 वोट जोड़े जाएं. इतना ही नहीं व्यापारियों, महिलाओं और निम्न मध्यम वर्ग के बीच लक्षित संपर्क के माध्यम से भी वोट हासिल करने की कोशिश की जा रही है.

सीमावर्ती जिलों में BJP तेजी से मजबूत हो रही है. 2016 के राज्य चुनावों में उसका वोट शेयर 15-20 फीसद था, जो 2021 में बोंगांव जैसी सीटों पर बढ़कर लगभग 48 फीसद हो गया. मतुआ समुदाय, जो 25-30 सीटों को प्रभावित करता है, BJP के भविष्य के लिए काफी अहम है. इस समुदाय को दी जाने वाली नागरिकता को टकराव के बजाय अधिकार और सम्मान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. BJP का मानना ​​है कि 5 फीसद वोटों का बदलाव, यानी लगभग 8,000-12,000 वोटों का अंतर, 10-12 सीटों के परिणाम को प्रभावित कर सकता है.

बीरभूम-सूरी क्षेत्र, जो अल्पसंख्यक बहुल मुर्शिदाबाद और औद्योगिक-कृषि प्रधान बर्धमान के बीच स्थित है. यहां मुस्लिम आबादी 35-37 फीसद है. साथ ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और कृषि प्रधान अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग भी बड़ी संख्या में रहते हैं. 2016 में, महिष्य समुदाय के अधिकांश सदस्य TMC के साथ थे. 2019 तक, कुछ वर्ग BJP की ओर झुकने लगे थे, और 2021 तक मतदाता वर्ग विभाजित हो गया. इससे BJP को मेदिनीपुर में गहरी पैठ बनाने का मौका मिला, जबकि TMC सत्ता में बनी रही. BJP अब यहां धीरे-धीरे बढ़त बनाने के बजाय अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रही है.

यह अस्थिरता पूर्वी और उत्तरी बंगाल में फैले व्यापक अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र में गहराई से समाई हुई है. राज्य की जनसंख्या में मुसलमानों की संख्या लगभग 27 फीसद है. मुर्शिदाबाद (66 फीसद), मालदा (51 फीसद) और उत्तर दिनाजपुर (50 फीसद) जैसे जिलों में वे बहुमत में हैं, जबकि दक्षिण 24 परगना (35 फीसद), नादिया (लगभग 27 फीसद) और उत्तर 24 परगना (लगभग 25 फीसद) में भी उनकी मजबूत पकड़ है.

ये जिले हाल ही में हुए मतदाता सूची संशोधन के केंद्र में थे, जिसमें मुर्शिदाबाद में 11 लाख से अधिक और मालदा में 8 लाख मतदाताओं की जांच की गई. इससे ठीक उन्हीं क्षेत्रों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक नया पहलू जुड़ गया है, जहां ऐतिहासिक रूप से अल्पसंख्यक मतदाताओं की एकजुटता ने चुनावों के परिणामों को प्रभावित किया है.

BJP के लिए, यह पूरा क्षेत्र एक सीमा और एक अवसर दोनों को परिभाषित करता है. पार्टी की रणनीति अल्पसंख्यक वोटों के इर्द-गिर्द चुनावी संतुलन को फिर से आकार देना है. इसमें दो समानांतर कदम शामिल हैं. पहला, एकजुटता: BJP जातिगत सीमाओं (अनुसूचित, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग) से परे हिंदू वोटों को एकजुट करने के लिए काम कर रही है. बीरभूम, नादिया और उत्तर 24 परगना जैसे क्षेत्रों में इसका अर्थ है नामासुद्र दलितों, राजवंशियों, आदिवासी समूहों और कृषि प्रधान अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को पार्टी के समर्थन में एकजुट करना है.

बंगाल की लगभग 70 फीसद आबादी हिंदुओं की है. BJP का अनुमान है कि 2021 में हिंदुओं के बीच उसका वोट शेयर 45-48 फीसद था. यहां तक ​​कि 4 फीसद वोटों की एकजुटता भी 40-50 सीटों पर असर डाल सकता है. महिला मतदाता भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं. यहां 5 फीसद वोटों के बदलाव से 30-40 सीटें प्रभावित हो सकती हैं.  

यही वजह है कि BJP ममता बनर्जी पर सीधे तौर पर हमला नहीं कर रही है, जो बंगाली गौरव की भावना को बढ़ावा दे रही हैं. BJP के सत्ता में आने पर बंगाली संस्कृति पर हमले की आशंका जता रही हैं, जिसमें बंगालियों की मांसाहारी भोजन संबंधी पसंद भी शामिल है.

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