असम में BJP किन 6 वजहों से लगातार तीसरी बार जीत का दावा कर रही है?
असम में कमजोर-अनुभवहीन विपक्ष, बदले हुए चुनावी क्षेत्रों (परिसीमन), ध्रुवीकरण की राजनीति और हिमंता बिस्वा सरमा की लोकप्रियता के बल पर BJP तीसरी बार सरकार बनाने की स्थिति में दिख रही है

अप्रैल की 9 तारीख को असम में विधानसभा चुनाव होंगे और 4 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे. BJP के नेतृत्व वाली NDA गठबंधन के लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की संभावना जताई जा रही है. BJP पहली बार 2016 में इस उत्तर-पूर्वी राज्य में सत्ता में आई थी, जब उसने 126 विधानसभा सीटों में से 60 सीटें जीतीं थीं.
इस चुनाव में सहयोगी असम गण परिषद (AGP) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) के साथ NDA का कुल आंकड़ा 86 पहुंचा और सरबानंदा सोनोवाल मुख्यमंत्री बने. 2021 में BJP ने फिर 60 सीटें बरकरार रखीं और अपना वोट शेयर 29 फीसद से बढ़ाकर 33 फीसद कर लिया.
हालांकि, इस बार गठबंधन की 11 सीटें कम हो गई, जिसका मुख्य कारण AGP की सीटों में भारी कमी थी. 2016 की 14 सीटों से घटकर 2021 में 9 रह जाने के कारण NDA गठबंधन की सीटों में कमी आई थी. राष्ट्रीय नेतृत्व ने 2015 में कांग्रेस से आए हिमंता बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बना दिया, जो अभी सत्ता में हैं.
इस बार BJP, AGP और BPF ने 125 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. BJP 89 सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है और एक सीट के लिए अभी टिकट की घोषणा बाकी है. AGP 26 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि BPF निचले असम के स्वायत्त आदिवासी परिषद क्षेत्र बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र (BTR) में 11 सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
BPF की किस्मत BTR क्षेत्र में इस बात पर निर्भर करेगी कि BJP का कभी-कभी सहयोगी रहने वाला यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) इसे कितनी प्रभावी तरीके से चुनौती देता है. इन दोनों पार्टियों के बीच का रिश्ता असम की गठबंधन राजनीति की लेन-देन वाली प्रकृति का एक अच्छा उदाहरण है.
2016 में BPF यहां BJP का सहयोगी दल था, लेकिन जब 2020 में बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (BTC) के चुनाव हुए, तो BJP ने बोडो राजनीति में नई उभरती ताकत UPPL का साथ दिया. भले ही BPF सबसे ज्यादा सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन UPPL के साथ मिलकर BJP ने BTC में सत्ता संभाली.
इसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले BPF और BJP में टकराव देखने को मिला. BPF ने BJP से अलग होकर कांग्रेस के साथ गठबंधन किया. वहीं, BJP ने UPPL को अपना पार्टनर बनाकर चुनाव लड़ा. फिर 2025 के BTC चुनाव आए, जिनमें BPF ने UPPL को बुरी तरह हराया. खास बात यह थी कि हमेशा की तरह BJP ने एक बार फिर BPF का साथ दिया. UPPL तकनीकी रूप से NDA में बनी हुई है, लेकिन लगातार गठबंधन छोड़ने की धमकी दे रही है. इन्हीं कारणों से वह BTR विधानसभा में अकेले चुनाव लड़ रही है.
दूसरी ओर, कांग्रेस ने अब तक 87 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. उसके दो सहयोगी दल रायजोर दल (RD) और असम जातीय परिषद (AJP) व अन्य 21 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं. इन दोनों के अलावा, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) (CPM), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन (CPIML) और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस (APHLC) भी कांग्रेस गठबंधन में शामिल हैं.महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बार कांग्रेस का अखिल भारतीय संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (AIUDF) के साथ कोई गठबंधन नहीं है. 2021 के बाद असम की राजनीति में यह एक बड़ा बदलाव है, जब दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा था और 45 सीटें जीती थीं.
2026 में BJP के हैट्रिक लगाने की संभावना क्यों जताई जा रही है?
परिसीमन: NDA की जीत की भविष्यवाणी के पीछे पहला और शायद सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक कारण निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन है. 2023 में असम के 126 विधानसभा क्षेत्रों में बदलाव किया गया है. 26 नए निर्वाचन क्षेत्र बनाए गए, 23 निर्वाचन क्षेत्र मानचित्र से हटा दिए गए और छह को पुनर्गठित करके तीन कर दिए गए हैं.
अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटें 16 से बढ़कर 19 हो गईं, जबकि अनुसूचित जातियों के लिए आठ से बढ़कर नौ हो गईं. BTR में सीटें 16 से बढ़कर 19 हो गईं. लेकिन परिसीमन का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव मुस्लिम बहुल क्षेत्रों पर पड़ा है.
पहले, मुस्लिम मतदाता लगभग 35 सीटों पर चुनाव परिणामों को काफी हद तक प्रभावित कर सकते थे. अब यह संख्या घटकर 24 रह गई है. इन निर्वाचन क्षेत्रों में ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस या AIUDF को वोट मिलते रहे हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक, असम की मुस्लिम आबादी 34 फीसद थी. अब यह 40 फीसद से अधिक होने का अनुमान है.
मुस्लिम मतदाताओं का भारी बहुमत कांग्रेस या AIUDF का वोट बैंक माना जाता है. इसके कारण कांग्रेस को BJP के लगभग बराबर वोट शेयर मिलता है. उदाहरण के लिए, 2021 में, कांग्रेस ने लगभग 30 फीसद वोट हासिल किए, जबकि BJP को 33 फीसद वोट मिले. फिर भी कांग्रेस इसे BJP की 60 सीटों के मुकाबले केवल 29 सीटों में तब्दील कर सकी. कांग्रेस को ये 29 सीटें असम के 35 जिलों में से केवल 13 जिलों से ही आईं. मुस्लिम आबादी के अब कम निर्वाचन क्षेत्रों तक सीमित हो जाने से कांग्रेस के प्रदर्शन पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है.
कांग्रेस की चुनौती यहीं खत्म नहीं होती है. AIUDF के साथ गठबंधन के बिना, दोनों विपक्षी दलों के मुख्य वोट बैंक बंट जाएंगे. गोलपारा पूर्व और गौरीपुर - दो मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस और रायजोर दल के बीच सौहार्दपूर्ण मुकाबला दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है.
रायजोर दल को शेरमन अली जैसे नेताओं को पार्टी में शामिल कराने के बाद कितना फायदा होता है, यह भी देखने वाली बात होगी. शेरमन अली चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोड़कर पार्टी में शामिल हुए हैं. अगर उन्हें टिकट नहीं दिया गया, तो अली मांडिया से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ सकते हैं. इससे वोटों का और अधिक विभाजन होगा और मुकाबला और भी जटिल हो जाएगा.
इस बीच, BJP की सहयोगी AGP ने अपने आवंटित 26 सीटों पर 13 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जिनमें से कुछ AIUDF के दलबदलू हैं. हालांकि, इन नेताओं का अपना चुनावी आधार है. ऐसे में, मुस्लिम वोट कई हिस्सों में बंट सकता है. इससे कांग्रेस और उसके सहयोगियों के लिए गहरी अनिश्चितता पैदा हो सकती है. चूंकि NDA को इन 24 मुस्लिम बहुल सीटों पर कोई उम्मीद नहीं है, इसलिए यहां विपक्ष को मिलने वाली कोई भी हार उसके लिए एक तरह से बोनस ही होगी.
शासन और जमीनी स्तर से सरकार का जुड़ाव: गैर-मुस्लिम क्षेत्रों में BJP के पक्ष में कई कारक काम करते हैं. मुख्यमंत्री सरमा की जबरदस्त व्यक्तिगत लोकप्रियता, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में उनकी सरकार की भूमिका, लाभार्थी योजनाओं का व्यापक ढांचा और बांग्लादेशी घुसपैठिए के मुद्दे पर निरंतर ध्रुवीकरण.
सीएम सरमा की व्यक्तिगत लोकप्रियता को देखकर ही BJP के बढ़त का अनुमान लगाया जा सकता है. ऊपरी और निचले असम में उनकी आशीर्वाद यात्रा के दौरान, हर उम्र और समुदाय के लोग उनकी एक झलक पाने और उन्हें करीब से देखने के लिए उमड़ पड़ते हैं. भले ही सरमा के इन लोकप्रियता ने BJP को एक सशक्त छवि प्रदान की है, लेकिन BJP और RSS की संगठनात्मक मशीनरी साथ ही पार्टी की पर्याप्त वित्तीय शक्ति ही हर बूथ, हर संभावित मतदाता तक सीएम और सरकार की ये छवि पहुंचा पाती है.
यहीं पर BJP को भारी बढ़त हासिल है. बूथ स्तर पर कांग्रेस की संरचना कमजोर है, जबकि जमीनी स्तर पर BJP की पैठ हर चुनाव चक्र के साथ बढ़ती ही जा रही है.
ध्रुवीकरण की राजनीति: घुसपैठिए का मुद्दा असम की राजनीति में आज के समय में एक बड़ा मुद्दा है. इस मुद्दे पर ध्रुवीकरण अपने चरम पर है और इसके परिणाम स्पष्ट दिखते हैं. असम के लोगों को यह लगता है कि बांग्लादेश से आने वाले लोगों के कारण उनके राज्य में जनसांख्यिकीय परिवर्तन देखने को मिल रहा है. इसके अलावा, भाषा और संस्कृति पर भी इसके कारण गंभीर खतरा मंडरा रहा है. चुनावी नजरिये से इसी कारण यह एक गंभीर मुद्दा बन गया है. सरमा के जरिए बांग्लादेशी मूल के मुस्लिम समुदाय का लगातार जिक्र करने से स्थानीय मतदाताओं में यह भावना और भड़क उठी है. इसके कारण राज्य में तेजी से वोटों का ध्रुवीकरण हो रहा है.
सरमा असम के हिंदू के अंदर यह डर भरने में कामयाब रहे हैं कि सबकुछ ऐसे ही चला तो AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल एक दिन राज्य के सीएम बन जाएंगे. इस संभावना ने स्थानीय मतदाताओं को चिंतित कर दिया था क्योंकि अजमल को प्रवासी मूल के मुसलमानों के मसीहा के रूप में देखा जाता है.
हालांकि, इस बार कांग्रेस- AIUDF गठबंधन न होने और AIUDF के घटते प्रभाव के कारण, इस कहानी की धार फीकी पड़ गई है. सरमा ने अब एक नया विकल्प ढूंढ लिया है. सरमा ने अब अपने पूर्व मित्र और कांग्रेस सहयोगी रकीबुल हुसैन को मोहरा बनाया है. उन्होंने हुसैन के प्रति कुछ कांग्रेस नेताओं की नाराजगी का BJP के फायदे के लिए इस्तेमाल किया है.
BJP में शामिल होने से पहले, असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा और दो बार के सांसद और पूर्व मंत्री प्रद्युत बोरदोलोई ने पार्टी के भीतर अपने अपमान के लिए सार्वजनिक रूप से रकीबुल हुसैन को दोषी ठहराया था. सरमा ने इस मौके का फायदा उठाते हुए घोषणा की कि कोई भी स्वाभिमानी हिंदू कांग्रेस में टिक नहीं सकता.
यह देखने को मिल रहा है कि कांग्रेस अक्सर BJP को अपने ध्रुवीकरण वाले बयान को और तेज करने में मदद कर रही है. उम्मीदवारों के चयन के लिए स्क्रीनिंग कमेटी की चर्चा के दौरान, प्रियंका गांधी इमरान मसूद के साथ असम पहुंचीं, जो अपने भड़काऊ और ध्रुवीकरण वाले भाषणों के लिए जाने जाते हैं. प्रद्युत बोरदोलोई ने अपने अपमान के लिए मसूद को जिम्मेदार ठहराया.
मनोवैज्ञानिक बढ़त: बोरा और बोरदोलोई के दल-बदल से BJP के चुनावी समीकरणों में कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा. बोरा ने आखिरी बार 2011 में चुनाव जीता था. बोरदोलोई 2016 के विधानसभा चुनाव में अपने गृह क्षेत्र मार्गेरिटा से हार गए थे और उसके बाद मध्य असम की नागांव लोकसभा सीट पर चले गए, जो मुस्लिम बहुल और कांग्रेस के लिए जनसांख्यिकीय रूप से सुरक्षित सीट है. हालांकि, कांग्रेस को इन नेताओं के दल-बदल से जो नुकसान हुआ है, वह सिर्फ धारणा पर आधारित है. इससे कांग्रेस जंग की पूर्व संध्या बिखरी हुई सी लग रही है.
सरमा ने कांग्रेस में कई बड़े नेताओं के टिकट कटने की बात कहकर पार्टी के भीतर संदेह पैदा कर दिया है और आम मतदाताओं का कांग्रेस को लेकर विश्वास कम कर दिया है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई और पार्टी नेतृत्व की सबसे बड़ी लाचारी तब दिखी जब वे बोरा और बोरदोलोई को BJP के साथ समझौता करने के बाद सार्वजनिक रूप से उन्हें मनाने के लिए पहुंचे. ऐसा करके वे हताश और पराजित दिखे.
एक अनुभवहीन विपक्षी गठबंधन: कागज पर छह दलों के साथ गठबंधन वाला कांग्रेस काफी मजबूत दिखता है, लेकिन इनमें से पांच दलों के पास पिछली विधानसभा में केवल दो-दो सीटें थीं. उनका प्रभाव कुछ खास क्षेत्रों तक ही सीमित है और संगठनात्मक शक्ति बेहद कमजोर है.
रायजोर दल और AJP जिन सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं, उन 21 सीटों में से परिसीमन के बाद छह नई सीटें बनी हैं. एक सीट BTR में है, जहां किसी भी पार्टी का कोई खास प्रभाव नहीं है. दूसरी सीट मुस्लिम बहुल है, जहां मुख्य मुकाबला NDA से नहीं बल्कि AIUDF से है. शेष तीन नई सीटों पर BJP-AGP गठबंधन को स्पष्ट बढ़त हासिल है.
शेष 15 मौजूदा सीटों में से दो अल्पसंख्यक बहुल हैं, जिससे एक बार फिर मुकाबला मुख्य रूप से AIUDF या AGP के बीच हो जाता है. बाकी सीटों में से एक पर रायजोर दल का कब्जा है. इस तरह गठबंधन के पास BJP-AGP के साथ सीधी टक्कर में केवल 12 सीटें बचती हैं, और नई सीटों को शामिल करने पर यह संख्या 15 हो जाती है. लेकिन चुनाव सिर्फ गणित नहीं होते, उनमें आपसी तालमेल भी अहम होता है.
फिर भी, BJP विरोधी मतदाताओं में यह उम्मीद बनी हुई है कि तीन गोगोई भाइयों - कांग्रेस के गौरव, रायजोर दल के अखिल और AJP के लुरिनज्योति के एक साथ आने से ऊपरी असम में अहोम वोटों को मजबूती मिलेगी और BJP की सीटों को भारी नुकसान पहुंचेगा.
सरमा का निचले असम से ब्राह्मण होना ऊपरी असम में पहले से ही एक संवेदनशील मुद्दा है, जहां पिछले चुनावों में कम से कम 8 विधानसभा सीटों पर अहोम मतदाताओं के कारण इसका असर देखने को मिला था. परिसीमन यहां भी BJP के लिए मददगार साबित हो सकता है, क्योंकि इससे अहोम समुदाय की चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता काफी कम हो गई है.
ज़ुबीन का सवाल: क्या गायक ज़ुबीन गर्ग की मृत्यु इस चुनाव में मुद्दा बनेगी? इसका असर लगभग उतना ही होगा जितना नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), 2019 का था. वही कानून जिसके खिलाफ इस चहेते गायक ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया था.
2021 के विधानसभा चुनावों में असम के लोगों ने CAA के खिलाफ भावनात्मक विरोध प्रदर्शन किया था, लेकिन फिर भी उन्होंने BJP को वोट दिया. वही पार्टी जिसने इस विवादास्पद कानून को लागू किया था. ज़ुबीन गर्ग असम के लोगों के लिए एक भावनात्मक मुद्दा हैं, जो CAA से कहीं ज्यादा असरदार है. हालांकि, इससे चुनावी नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. लोग CAA के खिलाफ हैं, फिर भी यह उनके मत को तय करने वाला एकमात्र कारक नहीं है.