भाजपा की सहयोगी पार्टियां महिला आरक्षण पर उससे अलग रुख क्यों दिखा रही हैं?

एनडीए में शामिल चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा ने लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण के मसले पर भाजपा से अलग राय जाहिर की है

चिराग पासवान उपेंद्र कुशवाहा
चिराग पासवान उपेंद्र कुशवाहा

“महिला आरक्षण विधेयक-2023 माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की कर्मठता,  उच्च कोटि की संकल्प शक्ति एवं समाज के सभी वर्गों को मुख्य धारा में जोड़ने के लक्ष्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का परिणाम है. इस कदम के लिए उनको दिल से साधुवाद देता हूं. साथ ही अपनी पार्टी की ओर से प्रस्तावित आरक्षण के अन्दर ही एससी-एसटी, अति पिछड़े एवं पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से स्थान आरक्षित करने के प्रावधान (अर्थात कोटा के अन्दर कोटा) की मांग करता हूं.”

देखें ट्वीट
https://twitter.com/UpendraKushRLJD/status/1704369946946666665

यह ट्वीट इंडिया गठबंधन के किसी नेता का नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय लोकजनता दल के नेता उपेंद्र कुशवाहा का है. कुशवाहा ने इसी साल जद(यू) से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बनायी है और अब उनकी पार्टी एनडीए का हिस्सा है. अमूमन ऐसा माना जाता है कि महिला आरक्षण में कोटे के भीतर कोटा मांगने वाले लोग इंडिया गठबंधन के हैं. मगर कुशवाहा एनडीए का हिस्सा होकर भी ऐसी मांग कर रहे हैं. हालांकि ऐसी मांग करने वालों में एनडीए की एक और पार्टी लोजपा(रामविलास) के नेता चिराग पासवान भी हैं. उन्होंने तो लोकसभा में ऐसी इच्छा जाहिर कर दी कि मोदी जी को महिला आरक्षण में पिछड़ों और अतिपिछड़ों के लिए अलग से कोटा निर्धारित करना चाहिए.

इंडिया टुडे से हुई बातचीत में उपेंद्र कुशवाहा कहते हैं, “संसद में वैसे तो पिछड़ा समाज के नेताओं की ही उपस्थिति कम है, मगर जहां तक ओबीसी महिलाओं का संबंध है, उनकी उपस्थिति तो बहुत कम है. ऐसे में अगर महिला आरक्षण मौजूदा स्वरूप में लागू हुआ तो पिछड़ी महिलाएं फिर से संसद नहीं आ पायेंगी. उनके लिए काफी दिक्कत होगी. इसलिए हम महिला आरक्षण में कोटे के भीतर कोटा की मांग कर रहे हैं.”

यह पूछने पर कि आपकी यह मांग महज औपचारिकता है, या इसमें कोई गंभीरता भी है? महिला आरक्षण विधेयक तो संसद से पारित हो गया. अब आप क्या करेंगे? वे कहते हैं, “हमने पूरी गंभीरता से यह मांग की है और हम लगातार ऐसी मांग करते रहेंगे. यह ठीक है कि अभी विधेयक पारित हो गया है, मगर इसे लागू होने में 2029 तक का वक्त है. हम उम्मीद रखते हैं, इससे पहले इसमें संशोधन कर पिछड़ी और अतिपिछड़ी महिलाओं के लिए कोटे के भीतर कोटा का प्रावधान किया जायेगा.”

वहीं लोक जनशक्ति पार्टी(रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने लोकसभा में महिला आरक्षण बिल के समर्थन में बोलते हुए कहा, वैसे तो मुझे अपने प्रधानमंत्री पर पूरा विश्वास है, इसके साथ मैं उनसे यह आग्रह भी करूंगा कि जल्द से जल्द इसमें यह प्रावधान भी जोड़ा जाये कि इसमें अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़ा-अतिपिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाये. मुझे भरोसा है कि हमारे प्रधानमंत्री जिन्होंने पिछड़ा वर्ग के लिए हमेशा बेहतर कदम उठाये हैं, यह काम भी वे करेंगे.”

https://twitter.com/iChiragPaswan/status/1704448116580397206


चिराग पासवान ने हालांकि प्रधानमंत्री मोदी पर भरोसा जताते हुए यह आग्रह किया है. मगर इससे यह भी साफ है कि चिराग एनडीए का हिस्सा होने के बावजूद यह समझते हैं कि महिला आरक्षण में कोटे के भीतर कोटा की मांग आज की राजनीति के हिसाब से जायज है.
इस मुद्दे पर बात करते हुए बहुजनवादी विचार की पत्रिका 'सबाल्टर्न' के प्रधान संपादक एवं राजनीतिक विश्लेषक महेंद सुमन कहते हैं, “बिहार ही नहीं देश के दूसरे इलाकों में जो भी अस्मितावादी राजनीतिक दल हैं, उनकी मजबूरी है पिछड़ा वर्ग के अधिकार की बात करना. इसलिए एनडीए में रहने के बावजूद उनकी मजबूरी कोटे के भीतर कोटा की मांग करते रहना है.” 

वे कहते हैं, “चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा तो दोनों तरफ आते जाते रहते हैं. भाजपा की तरफ से भी उमा भारती ऐसी मांग कर चुकी हैं. दरअसल यह भाजपा की राजनीति का अपना तरीका है. वह हमेशा मिक्स्ड सिग्नल देती है. वह न ओबीसी वोटरों को नाराज करना चाहती है, न सवर्ण वोटरों को. इसलिए उनके धड़ों के नेता दोनों तरह की बातें करते रहते हैं. मगर उनका मूल स्वभाव क्या है, असली नीति क्या है, यह उनके फैसले से समझ आता है. जैसे इस बार भी उन्होंने कोटे के भीतर कोटा की मांग को स्वीकार नहीं किया है. जाति जनगणना की मांग नहीं मानी. महिला आरक्षण पर उनके सहयोगी जो भी कहें, एनडीए का आखिरी फैसला यही है.“ 

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