BJD क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर पा रही?
ओडिशा में राज्यसभा चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों को कांग्रेस ने तुरंत निलंबित कर दिया लेकिन BJD ने अभी ऐसा कोई फैसला नहीं लिया है

हाल ही में हुए राज्यसभा चुनावों के दौरान कथित क्रॉस-वोटिंग ने ओडिशा में बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है. यहां कांग्रेस और बीजू जनता दल (BJD) दोनों ही पार्टियों को आंतरिक असंतोष का सामना करना पड़ रहा है. बीते 16 मार्च को राज्यसभा की चार सीटों के लिए हुए मतदान में कांग्रेस के तीन विधायकों ने पार्टी निर्देश का उल्लंघन किया और विरोधी खेमे के उम्मीदवार को वोट दिया. वहीं BJD के कुल आठ विधायकों ने पार्टी समर्थित उम्मीदवार को वोट नहीं किया.
तेजी से कार्रवाई करते हुए कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भक्त चरण दास ने पार्टी के तीन विधायकों- रमेश जेना, सोफिया फिरदौस और दसरथी गमांग को पार्टी के आधिकारिक रुख के खिलाफ वोट करने के आरोप में निलंबित कर दिया. साथ ही विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर इन सभी विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की मांग की है.
दास ने कहा, "इन विधायकों से इस तरह के विश्वासघात की उम्मीद नहीं थी. हम सुनिश्चित करेंगे कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत उन्हें विधानसभा से अयोग्य घोषित किया जाए." इस कदम को कांग्रेस नेतृत्व की ओर से कड़ा अनुशासनात्मक संदेश माना जा रहा है.
वहीं दूसरी तरफ, BJD के कुल आठ विधायकों ने व्हिप का उल्लंघन किया है. लेकिन पार्टी ने अब तक अपने इन विधायकों के खिलाफ कोई त्वरित दंडात्मक कार्रवाई नहीं की है. इनमें दो विधायक पहले से ही निलंबित चल रहे हैं. बाकी बचे छह विधायकों- सौविक बिस्वाल, देवी रंजन त्रिपाठी, सुभासिनी जेना, चक्रमणि कंहर, रमाकांत भोई और नबा किशोर मलिक को फिलहाल केवल कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है. इन विधायकों को 20 मार्च शाम पांच बजे तक अपना जवाब जमा करने को कहा गया है.
इस बीच दोनों पार्टियों की अलग-अलग प्रतिक्रिया ने राज्यभर में राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है. जहां कांग्रेस ने तुरंत अनुशासनात्मक कार्रवाई का रास्ता अपनाया, वहीं BJD नेतृत्व की कार्रवाई में देरी पर सवाल उठाए जा रहे हैं. ऐसी परिस्थिति में राज्य में इस बात की चर्चा हो रही है कि क्या BJD में अनुशासन तोड़ने का डर खत्म हो गया है? पार्टी की मुख्य सचेतक और कारण बताओ नोटिस जारी करने वाली प्रमिला मलिक कहती हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं है. विधायकों को लिखे पत्र में साफ कहा गया है कि निर्धारित समयसीमा में संतोषजनक जवाब नहीं देने पर यह मान लिया जाएगा कि उनके पास कोई स्पष्टीकरण नहीं है. इसके बाद पार्टी कानून तथा BJD के संविधान एवं नियमों के अनुसार एकतरफा कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगी.
क्या यह इतना आसान होगा? पार्टी के विधायक गौतम बुद्ध दास कहते हैं, "बिल्कुल आसान होगा. उन छह विधायकों ने खुद तय किया है कि वे BJD के साथ नहीं रहेंगे. उन्होंने BJP समर्थित प्रत्याशी को वोट करना पसंद किया. जाहिर है, वे अब हमारी पार्टी के साथ नहीं हैं."
वे आगे कहते हैं, "सीधे निलंबित करने के बजाय हमने कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर पहले उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया है. ताकि आगे जब मामला कोर्ट में जाए, तो केवल इस आधार पर उनका तर्क मजबूत न हो कि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया. बस कुछ दिनों की बात है, उनका निलंबन तय है. हम विधानसभा अध्यक्ष के पास भी जाएंगे, ताकि उन सभी की सदस्यता रद्द की जा सके. चूंकि अध्यक्ष BJP के हैं, तो वे शायद ही समय पर कोई फैसला दें. ऐसी परिस्थिति में हम यह भी सलाह ले रहे हैं कि कोर्ट जाने के लिए क्या किया जा सकता है."
क्या पांडियन फैक्टर है वजह
इधर जिन विधायकों को नोटिस भेजा गया है, उनके समर्थक वक्फ बिल वाली घटना याद दिला रहे हैं. अप्रैल 2025 में जब वक्फ बिल पास करने के लिए मतदान होना था, तब पहले BJD ने बिल के विरोध में मतदान करने की बात कही थी, लेकिन बाद में सांसदों को अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने को कह दिया गया. उस समय पांच सांसदों ने बिल के पक्ष में और एक सांसद ने विरोध में वोट किया था. हालांकि, पार्टी ने किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. उनके समर्थक यही तर्क दे रहे हैं कि जब सांसदों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो विधायकों पर कार्रवाई पार्टी किस आधार पर करेगी?
विधायकों का एक तबका इस बात से भी नाराज है कि पार्टी ने इस राज्यसभा चुनाव में भी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के मुकाबले धनकुबेरों को महत्व दिया. वे यह बात मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि नवीन पटनायक ये सभी निर्णय खुद ले रहे हैं. विधायकों को लग रहा है कि नवीन पटनायक अब केवल हस्ताक्षर कर रहे हैं और बाकी सारे निर्णय वीके पांडियन ही ले रहे हैं. वे उन्हें अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं. राज्यसभा के लिए चुने गए सांसद संतृप्त मिश्रा ने बीते विधानसभा चुनाव के वक्त चुनावी हलफनामे में अपनी कुल संपत्ति 482 करोड़ रुपए बताई थी. वे नवीन पटनायक के राजनीतिक सचिव जरूर हैं, लेकिन पार्टी में मात्र दो साल पहले आए हैं.
असल सवाल यह भी है कि क्या पार्टी एक साथ छह और विधायकों को निलंबित कर उन्हें बाहर जाने या आंतरिक कलह को और हवा देने का मौका देना चाहेगी? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, BJD इस वक्त अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है. अगर कार्रवाई नहीं होती है तो यह नेतृत्व की कमजोरी और भविष्य में ऐसा करने वालों को बढ़ावा देने जैसा संदेश होगा. यदि कार्रवाई होती है तो पार्टी की कलह खुद सतह पर आ जाएगी. यही नहीं, एक गुट जो लगातार वीके पांडियन के खिलाफ खड़ा होने की कोशिश कर रहा है, उसके लिए यह कार्रवाई ऑक्सीजन की तरह काम करेगी.