इस बार का राज्यसभा चुनाव बिहार के लिए ऐतिहासिक क्यों माना जा रहा है?

नीतीश कुमार की विदाई और तीन पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्षों की दावेदारी ने इस राज्यसभा चुनाव बेहद खास बना दिया है

Nitin Nabin
BJP के राष्ट्रीय नितिन नवीन भी बिहार से ही राज्यसभा जा रहे हैं (फाइल फोटो)

वैसे तो हर दो साल पर राज्यसभा के चुनाव हुआ करते हैं, मगर इस बार 16 मार्च को हो रहा राज्यसभा चुनाव बिहार के लोगों को हमेशा याद रहने वाला है. इसकी सबसे बड़ी वजह तो यह है कि इस चुनाव के जरिए ही 20 साल तक बिहार की सत्ता संभालने वाले नीतीश कुमार जैसे कद्दावर नेता की मुख्यमंत्री की पारी का समापन हो रहा है. मगर इसके अलावा भी कई ऐसी वजहें हैं, जिसके कारण इस चुनाव को बिहार के राजनीतिक इतिहास में लंबे अरसे तक याद किया जाता रहेगा.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के बीच यह अहम खबर कम चर्चा में रही कि BJP जैसी देश की सबसे बड़ी पार्टी के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन भी राज्यसभा चुनाव लड़ रहे हैं और वे जीतकर देश के उच्च सदन में पहुंचेंगे. सिर्फ इस बात से बिहार के इस राज्यसभा चुनाव का महत्व बढ़ जाता है. मगर दिलचस्प है कि उनके अलावा दो अन्य पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बिहार से राज्यसभा का चुनाव लड़ रहे हैं.

इनमें पहले तो खुद नीतीश कुमार हैं, जो अपनी पार्टी JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. दूसरे उपेंद्र कुशवाहा, जो अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. इस तरह बिहार के तीन दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों का उच्च सदन में पहुंचना लगभग तय है.

12 साल बाद राज्यसभा चुनाव में होगी वोटिंग

यह चुनाव इसलिए भी खास है, क्योंकि 12 साल बाद बिहार में राज्यसभा चुनाव में मतदान की प्रक्रिया अपनाई जा रही है. इससे पहले के चुनावों में दोनों पक्ष मतदान से बचते रहे हैं. दरअसल अभी बिहार से जो पांच सीटें खाली हो रही हैं, उनमें दो सीटें RJD की रही हैं, दो JDU की और एक BJP की तरफ से उपेंद्र कुशवाहा की सीट. इनमें उपेंद्र कुशवाहा और JDU के रामनाथ ठाकुर की सीट पर तो पुराने सदस्य को ही दोबारा भेजा जा रहा है. कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर तो तीसरी बार राज्यसभा जा रहे हैं.

मगर जहां JDU राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह के बदले नीतीश कुमार को राज्यसभा भेजने की तैयारी में है, वहीं BJP ने RJD की दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं, क्योंकि 2025 के विधानसभा चुनाव में RJD और महागठबंधन दोनों काफी कमजोर हुए हैं.

RJD अपनी एक सीट किसी भी कीमत पर बचाना चाह रहा है. गणित यह कहता है कि 41 विधायकों के समर्थन से राज्यसभा में एक सांसद भेजा जा सकता है. महागठबंधन के अपने 35 विधायक हैं. वह ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के पांच और BSP के एक विधायक के समर्थन के भरोसे अपने एक निवर्तमान राज्यसभा सांसद अमरेंद्रधारी सिंह को फिर से राज्यसभा भेजने की तैयारी में है.

क्रॉस वोटिंग का खतरा और होटल में विधायक

चूंकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) हर हाल में अपने पांचवें उम्मीदवार शिवेश राम को राज्यसभा भेजने की कोशिश में है, इसलिए विपक्षी दलों के बीच क्रॉस वोटिंग का खतरा है. NDA इस चुनाव को लेकर लगातार बैठकें कर रहा है. अपने विधायकों से मॉक पोल करा रहा है. चूंकि पांचवें उम्मीदवार के लिए तीन अतिरिक्त विधायकों का समर्थन चाहिए, ऐसे में कहा जा रहा है कि BJP दूसरे दलों के विधायकों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर सकती है. कांग्रेस के विधायकों के बागी होने का अंदेशा जताया जा रहा है.

इधर RJD ने अपने विधायकों को राजधानी में ठहराने का इंतजाम पटना के एक होटल में किया है, ताकि वे हॉर्स ट्रेडिंग का शिकार न हो जाएं. बिहार के पुराने पत्रकार प्रवीण बागी इस बात की तस्दीक करते हैं कि बिहार में ऐसा पहली बार हुआ है कि राज्यसभा चुनाव में विधायकों को होटल में रखा जाए.

AIMIM और RJD पहली बार साथ आ रहे

इस चुनाव में पहली बार ऐसा हो रहा है कि AIMIM और RJD एक साथ मिलकर कोई काम करेंगे. दोनों आपस में सहयोग करेंगे. अब तक RJD, AIMIM के साथ आने से परहेज करता रहा है. उसे BJP की बी-टीम कहा जाता रहा है. बीते विधानसभा चुनाव में AIMIM ने पुरजोर कोशिश की थी कि उसे महागठबंधन का हिस्सा बना लिया जाए, मगर RJD ने इन कोशिशों को बिल्कुल तवज्जो नहीं दी.

अब चूंकि गणित ऐसा बन गया है कि AIMIM के सहयोग के बिना RJD जीत नहीं सकता, ऐसे में दोनों मजबूरन साथ आए हैं. मगर ऐसा लगता है कि यह सहयोग आने वाले दिनों में भी जारी रह सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार फैजान अहमद कहते हैं, “मैं पिछले चुनाव के वक्त से ही कहता रहा हूं कि RJD को AIMIM की ताकत को समझना चाहिए और उसे अपने साथ रखना चाहिए. मगर RJD ने तब AIMIM की ताकत नहीं समझी. पिछले दो चुनाव से पांच-पांच सीटें जीतने वाली AIMIM अब ऐसी पार्टी बन गई है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती. इस चुनाव से AIMIM के ऊपर लगा अछूत का लेबल भी हटेगा और सभी विपक्षी दलों के एकजुट होने से महागठबंधन को भी फायदा होगा.”

टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं कि इसे हाई प्रोफाइल चुनाव बताते हैं. वे कहते हैं, “तीन दलों के राष्ट्रीय अध्यक्ष मैदान में हैं. इनमें देश की सबसे बड़ी पार्टी BJP के अध्यक्ष और नीतीश की विदाई का चुनाव तो है ही. चुनाव का महत्व आप इसी से समझ सकते हैं कि दोनों धड़े एक सीट के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं. अगर महागठबंधन एक सीट निकाल लेता है, तो उसके लिए यह बड़ी बात होगी.”

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