शराबबंदी के 10 साल : बिहार में कानून जीत रहा है या तस्कर?

सम्राट चौधरी सरकार नीतीश कुमार के शराबबंदी कानून को खत्म नहीं कर रही है लेकिन इसे लागू कराने का जोश पहले जैसा नहीं दिखता

सांकेतिक तस्वीर (फोटो : हिंदुस्तान टाइम्स)

18 जून को बिहार की शराबबंदी लागू कराने वाली मशीनरी हर जगह सक्रिय नजर आई. गोपालगंज में एक्साइज डिपार्टमेंट के अधिकारियों ने एक कार से 135 लीटर विदेशी शराब बरामद की. पटना में दो अलग-अलग कार्रवाई में 240 लीटर बीयर और 172 लीटर विदेशी शराब जब्त की गई.

जमुई में अधिकारियों ने 1,331 लीटर विदेशी शराब ले जा रहे एक पिकअप वाहन को पकड़ा और एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया. कटिहार में 101 लीटर विदेशी शराब जब्त की गई और तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया.

गया में अधिकारियों ने 96 लीटर बीयर बरामद की और एक व्यक्ति को हिरासत में लिया. सारण में भी 52 लीटर विदेशी शराब जब्त की गई.

तस्वीर साफ थी. एक ऐसा राज्य जिसने पिछले 10 साल से शराब की आपूर्ति रोकने की कोशिश की है, वह अब भी हाईवे, गांव की सड़कों और सीमा वाले रास्तों पर शराब की खेप पकड़ने में जुटा है. एक जिले से दूसरे जिले तक लगातार बरामदगी हो रही है. निजी वाहनों से लेकर व्यावसायिक गाड़ियों तक का इस्तेमाल हो रहा है. 

बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए 10 साल हो चुके हैं. इसके बावजूद शराब का कारोबार मजबूती से जारी है. हर सख्ती के बाद यह खुद को नए तरीके से ढाल लेता है और कानून लागू करने की हर कमजोरी का फायदा उठाता है. कानून के हिसाब से बिहार ड्राई स्टेट है. लेकिन व्यवहार में यहां शराब अब भी आसानी से पहुंच रही है.

यही बिहार की शराबबंदी का सबसे बड़ा विरोधाभास है. इस नीति ने शराब के कारोबार को खत्म नहीं किया. बल्कि उसे भूमिगत कर दिया जहां वह पकड़ से बचने में और ज्यादा माहिर, ज्यादा चालाक और कई बार ज्यादा खतरनाक बन गया है. राज्य छापों, गिरफ्तारियों, जब्ती, संपत्ति जब्त करने, सीमा चौकियों और लगातार निगरानी का मजबूत रिकॉर्ड दिखा सकता है. लेकिन वह यह भरोसे के साथ नहीं कह सकता कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से शराब गायब हो गई है. बाजार अब भी है. मांग अब भी है. जोखिम अब भी बना हुआ है.

इस बिल्ली-चूहे के खेल का पैमाना भी बहुत कुछ बताता है. पूर्व में भागलपुर से लेकर पश्चिम में बक्सर तक और दक्षिण में नवादा से लेकर उत्तर में पूर्वी और पश्चिमी चंपारण तक, शराबबंदी ने पूरे बिहार को स्थाई निगरानी वाले इलाके में बदल दिया है. दूसरी ओर तस्करों ने भी कम चालाकी नहीं दिखाई. वर्षों के दौरान उत्पाद विभाग और पुलिस ने शव वाहन, दूध के टैंकर, एंबुलेंस, डाक वाहन, सब्जी ढोने वाले ट्रक, स्कूटर और यहां तक कि साइकिलों से भी शराब बरामद की है.

शराब की बोतलें नकली फर्श के नीचे, बनावटी पैनलों के पीछे, बदले हुए फ्यूल टैंक के अंदर और खास तौर पर तैयार किए गए चेसिस के खानों में छिपाकर ले जाई गईं. हर बरामदगी के साथ शराब छिपाने का कोई नया तरीका सामने आता है. हर सख्ती के बाद तस्कर नया रास्ता निकाल लेते हैं. वजह साफ है. इस कारोबार में मुनाफा इतना ज्यादा है कि इसे छोड़ना आसान नहीं.

अप्रैल 2016 में बिहार ने पूरी शराबबंदी लागू की थी. इसे नैतिक अभियान और प्रशासनिक सुधार दोनों के रूप में पेश किया गया था. कहा गया कि इससे घरेलू हिंसा, परिवारों की आर्थिक बदहाली, सार्वजनिक अव्यवस्था, शराब में बर्बाद होने वाली कमाई और राज्य के कई हिस्सों में शराब से होने वाले सामाजिक नुकसान जैसे कई संकटों का समाधान होगा. संदेश साफ और मजबूत था. बिहार अब शराब की खुली बिक्री और सेवन को बर्दाश्त नहीं करेगा. 10 साल बाद भी कानून जस का तस है. लेकिन इसके नतीजे उतने सीधे नहीं हैं, जितनी इसके समर्थकों ने उम्मीद की थी.

2023-24 में किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के आंकड़े असहज करने वाली तस्वीर पेश करते हैं. इसके अनुसार बिहार में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 16.5 प्रतिशत पुरुष अब भी शराब पीते हैं. जबकि NFHS-5 (2019-21) में यह आंकड़ा 15.4 प्रतिशत था. ग्रामीण बिहार में यह हिस्सा 17.1 प्रतिशत है जबकि शहरी बिहार में 12.8 प्रतिशत. महिलाओं में यह आंकड़ा 0.4 प्रतिशत है. ये किसी आदत के खत्म हो जाने के आंकड़े नहीं हैं. बल्कि ऐसी आदत के हैं, जिसने शराबबंदी के बाद अपना तरीका बदला, रास्ते बदले और कई मामलों में और ज्यादा भूमिगत हो गई.

कानून लागू कराने के लिए भारी स्तर पर कार्रवाई हुई है. शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार में 10 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं. 16 लाख से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है. करीब 4.5 करोड़ लीटर शराब जब्त की गई है और लगभग 1.6 लाख वाहन जब्त किए गए हैं. राज्य ने एक्साइज जिलों की संख्या बढ़ाई है, सीमाओं पर निगरानी कड़ी की है और पूरे सीमा क्षेत्र को सघन निगरानी वाले इलाके में बदल दिया है. ड्रोन, नाव, स्कैनर, ब्रेद एनालाइजर और चेक पोस्ट अब इस व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं.

फिर भी इतनी बड़ी कार्रवाई खुद इस समस्या के आकार को दिखाती है. जिस नीति को लागू करने के लिए इतनी बड़ी कोशिश करनी पड़े, उसने उस समस्या का समाधान नहीं किया जिसके लिए उसे लाया गया था. उसने उसी संघर्ष को और ज्यादा थका देने वाला बना दिया है. हर बरामदगी एक तरह की जीत जरूर है. लेकिन हर बरामदगी इस बात का भी सबूत है कि सप्लाई चेन अब भी जिंदा है. हर गिरफ्तारी यह दिखाती है कि कारोबार पर दबाव है. लेकिन यह भी साबित करती है कि बिहार के हाईवे, नदी मार्गों और गांवों के रास्तों से शराब पहुंचाने का जोखिम अब भी फायदे का सौदा है. 18 जून की बरामदगियों ने यह बात किसी भी नीति दस्तावेज से ज्यादा स्पष्ट कर दी.

शराबबंदी के पीछे का सामाजिक तर्क इसके लागू होने के रिकॉर्ड की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत बना हुआ है. खासकर महिला मतदाताओं और उन परिवारों के बीच जो शराब को घरेलू उपेक्षा, हिंसा और कर्ज से जोड़कर देखते हैं. कई समर्थकों के लिए सरकार का अपने रुख में नरमी न लाना जिद नहीं बल्कि गंभीरता का संकेत है. यह दिखाता है कि सरकार सार्वजनिक अनुशासन के नाम पर निजी व्यवहार में भी दखल देने को तैयार है. यह नैतिक तर्क मामूली नहीं है. यही एक बड़ी वजह है कि लागू करने में लगातार मुश्किलें आने के बावजूद यह नीति अब भी कायम है.

व्यावहारिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं. बिहार की सीमा उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल से लगती है. इन तीनों राज्यों में शराब पर कोई प्रतिबंध नहीं है. उत्तर में करीब 800 किलोमीटर लंबी नेपाल सीमा है. यह खुली सीमा है जहां गांवों के लोग रोज व्यापार, पूजा या अन्य कामों के लिए आते-जाते हैं और चाहें तो शराब भी पी सकते हैं. ऐसी सीमा को पूरी तरह सील करना लगभग असंभव है. ऐसे में एक राज्य के भीतर लगाया गया प्रतिबंध भौगोलिक परिस्थितियों के सामने पूरी तरह टिक नहीं सकता.

लेकिन नैतिक संदेश आर्थिक सच्चाई को नहीं बदल सकता. शराबबंदी से पहले शराब से मिलने वाला उत्पाद शुल्क बिहार के लिए आय का बड़ा स्रोत था. शराबबंदी लागू होते ही यह आय लगभग खत्म हो गई. राज्य को एक प्रतीकात्मक सुधार तो मिला लेकिन आय का बड़ा और स्पष्ट स्रोत खो गया. उसकी जगह एक महंगी निगरानी व्यवस्था ने ले ली जिसे हर साल बनाए रखना पड़ता है. यानी बिहार ने कर राजस्व छोड़कर पुलिसिंग का भारी बोझ अपने ऊपर ले लिया. इसका असर अदालतों तक पहुंचा है. शराबबंदी से जुड़े मामलों ने अदालतों का काम बढ़ा दिया है. जमानत की सुनवाई बढ़ी है और न्याय व्यवस्था छोटे-बड़े आरोपियों के मामलों में लगातार उलझी हुई है.

तस्वीर को और चिंताजनक बनाने वाली बात यह है कि नशे का स्वरूप भी बदल रहा है. बिहार में कोडीन वाली कफ सिरप, गांजा, अफीम और दूसरे मादक पदार्थों को लेकर चिंता बढ़ी है. कानून लागू कराने का फोकस पहले शराब पर था. अब यह व्यापक नशीले पदार्थों के नेटवर्क तक फैल चुका है. इसका मतलब यह नहीं कि इस बदलाव की अकेली वजह शराबबंदी है. लेकिन इतना जरूर है कि शराबबंदी नशे की संस्कृति को रोक नहीं पाई. उसने केवल उसका रूप बदल दिया.

यही बिहार मॉडल का सबसे बड़ा विरोधाभास है. इसे नुकसान कम करने के लिए बनाया गया था. लेकिन कई मामलों में इसने जोखिम बढ़ा दिया. अवैध शराब पर नियंत्रण मुश्किल होता है और उसका सेवन कहीं ज्यादा खतरनाक होता है. जहरीली शराब से होने वाली मौतें इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं. जब शराब भूमिगत हो जाती है तो उसमें मिलावट करना आसान हो जाता है, गुणवत्ता पर नियंत्रण खत्म हो जाता है और इसकी पूरी कीमत उपभोक्ता को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है. अप्रैल में पूर्वी चंपारण में हुई मौतें इसकी याद दिलाती हैं.

शराबबंदी की राजनीति भी बदल रही है. बिहार के मद्यनिषेध, उत्पाद एवं निबंधन मंत्री मदन सहनी ने हाल ही में शराबबंदी का बचाव करते हुए कहा कि यह पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नैतिक सोच पर आधारित सामाजिक सुधार है. उन्होंने कहा कि सरकार कानून के लागू होने की समीक्षा कर रही है और जहां भी खामियां मिल रही हैं उन्हें दूर किया जा रहा है. 

सहनी ने यह भी कहा कि केवल बिहार में पकड़े जाने वालों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि राज्य के बाहर शराब का कारोबार करने वाले तस्करों और आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ भी मामले दर्ज होने चाहिए. लेकिन सहनी ने सार्वजनिक रूप से यह शिकायत भी की है कि पुलिस तंत्र पर्याप्त काम नहीं कर रहा, जिससे कानून लागू करने की प्रक्रिया कमजोर पड़ रही है. यही दोहरी स्थिति आज की तस्वीर को दिखाती है. राज्य शराबबंदी खत्म नहीं कर रहा लेकिन अब उसके बारे में पहले जैसी निश्चितता के साथ भी बात नहीं कर रहा.

मुख्यमंत्री बदलने के बाद की पृष्ठभूमि में यह बदलाव अहम है. सम्राट चौधरी सरकार ने शराबबंदी को जारी रखा है. लेकिन इसे लेकर पहले जैसा उत्साह नहीं दिखता. इसकी सबसे संभावित वजह व्यावहारिक है. वर्षों की कोशिशों के बाद अब यह समझ बढ़ रही है कि शराबबंदी वैसी सफल नहीं हुई, जैसी इसके निर्माताओं ने उम्मीद की थी. मदन सहनी के बयान भी यही संकेत देते हैं कि सरकार अब इस नीति को सफल बताने से ज्यादा इसे और सख्ती से लागू करने पर ध्यान दे रही है.

10 साल बाद बिहार की शराबबंदी की कहानी न पूरी तरह सफलता की है और न पूरी तरह असफलता की. यह राजनीतिक इच्छाशक्ति, सामाजिक आकांक्षा, प्रशासनिक अति-सक्रियता और बाजार की मजबूती की कई परतों वाली कहानी है. राज्य कहता है कि उसने करोड़ों लीटर शराब जब्त की, लाखों लोगों को गिरफ्तार किया और निगरानी की मजबूत दीवार खड़ी की. लेकिन बाजार हर बार नए वाहन, नया रास्ता, शराब छिपाने का नया तरीका और नया नशीला पदार्थ लेकर सामने आ जाता है. 

कानून के हिसाब से बिहार ड्राई है. सीमाओं पर शराब अब भी उपलब्ध है. कानून लागू कराने की कोशिश लगातार जारी है. और जिस कारोबार को खत्म करना था, वह अब भी जिंदा है. शराबबंदी के 10 साल की यही कहानी है. रोज की एक ऐसी जंग, जिसमें अब तक कोई निर्णायक जीत नहीं मिली. और एक ऐसा प्रतिबंध, जो इतना लंबा चल चुका है कि अब खुद उसी समस्या का हिस्सा बन गया है जिसे खत्म करने के लिए लागू किया गया था.

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