सेंट्रलाइज्ड किचन बेहतर या स्कूल की रसोई? मिड-डे मील में सांप मिलने के बाद छिड़ी बहस

बिहार के जिस स्कूल के मिड-डे मील में मरा सांप मिला, वहां बना-बनाया खाना एक NGO के सेंट्रलाइज्ड किचन से आता है

Students withdrew their admission from a government school after a Dalit woman cooked the mid-day meal
सांकेतिक फोटो

मध्य विद्यालय बलुआहा के छात्रों और अभिभावकों ने मिलकर 13 मई को भी पीएम पोषण योजना के तहत मिलने वाला मिड-डे मील वापस कर दिया है. इसी स्कूल में छह दिन पहले मिड-डे मील में सांप मिलने की बात सामने आई थी और 115 बच्चे बीमार पड़ गए थे. 

इसके बाद से स्कूल के बच्चे और अभिभावक मिड-डे मील खाने से इनकार कर रहे हैं. दरअसल इस स्कूल में मिड-डे मील की आपूर्ति ‘भीमराव आंबेडकर दलित उत्थान सेवा समिति’ नाम के NGO की तरफ से की जा रही है.

इस गांव के लोगों का कहना है कि जब से यह संस्था मिड-डे मील खिला रही है, कुछ न कुछ दिक्कत बनी रहती है.

बलुआहा गांव के अजय साह, जिनके चार बच्चे इस स्कूल में पढ़ते हैं, कहते हैं, “सांप वाली घटना के बाद तो हमलोगों का विश्वास ही उठ गया. उम्मीद नहीं थी कि हमारे बच्चे बचेंगे. उनका महिषी और सहरसा के अस्पताल में इलाज हुआ, फिर वे ठीक होकर लौटे.” वे यह भी दावा करते हैं, “इससे पहले भी एक बार दाल खट्टी लगने लगी थी और इस संस्था की तरफ से जो अंडा बांटा जा रहा है, वह अजीब ही है. पहले इस स्कूल में ही मिड-डे मील बनता था तब कोई शिकायत नहीं थी. जब से यह संस्था मिड-डे मील का वितरण कर रही है, कोई न कोई दिक्कत आ रही है.”

मिड-डे मील में सांप मिलने की घटना इसी स्कूल की है

यह संस्था इस साल फरवरी से इस स्कूल में मिड-डे मील का वितरण कर रही है. इससे पहले स्कूल में ही मिड-डे मील बनता था. अब स्कूल के अभिभावक मांग कर रहे हैं कि फिर से पुरानी व्यवस्था शुरू हो जाए और स्कूल में ही मिड-डे मील बने.

इस स्कूल के शिक्षक सुशील कुमार कहते हैं, “जिस रोज यह घटना हुई मैं जनगणना के काम से बाहर था. लौटने इस बारे में पता चला. इस घटना के बाद अभिभावक काफी परेशान हैं.” उस रोज स्कूल में मौजूद प्रभारी प्राचार्य अनुपमा झा काफी परेशान नजर आती हैं. वे कहती हैं, “उस रोज हमारे प्राचार्य आकस्मिक अवकाश पर थे, उन्हें सस्पेंड कर दिया गया. मेरे ऊपर, मिड-डे मील चखने वाले शिक्षक और जितने रसोइए थे, सब पर FIR हो गई. बताइए, हमलोग क्या कर सकते थे? मैं अकेली महिला, स्कूल के बाहर 15 हजार ग्रामीण जुट गए थे. किसी तरह पुलिस को बुलाया और बच्चों को अस्पताल भेजा. कुल 115 बच्चे बीमार हो गए थे, इनमें से 105 सहरसा सदर अस्पताल भेज दिए गए. अभिभावक नहीं चाहते कि बच्चे बाहर से आया मिड-डे मील खाएं. वे विरोध करते हैं. फिर भी आज दो बच्चों को हमने समझा-बुझाकर खिलाया. मैंने तो अधिकारियों से कहा है कि अगर मैं आरोपी हूं तो मुझे स्कूल का जिम्मा क्यों दिया जा रहा है? मुझे छोड़ दिया जाए.”

इस घटना का असर सिर्फ मध्य विद्यालय बलुआहा तक सीमित नहीं है. सहरसा जिले के 1308 सरकारी स्कूलों में से 681 स्कूलों में इसी संस्था के जरिए मिड-डे मील बांटा जा रहा है. लोगों का कहना है कि उस रोज कई स्कूलों के बच्चे बीमार हुए थे. कुछ शिक्षक सौर बाजार और नवहट्टा के स्कूलों का नाम लेते हैं. हालांकि मिड-डे मील वितरण करने वाली संस्था के स्थानीय प्रतिनिधि रोहित कहते हैं, “अगले दिन सौर बाजार के एक स्कूल में ऐसी घटना की बात हमलोगों ने सुनी. बाकी कहीं और शिकायत नहीं हुई.”

जहरीला मिड-डे मील खाने के बाद अस्पताल में भर्ती बच्चे

रोहित बताते हैं कि उनकी संस्था 2023 से सहरसा में मिड-डे मील वितरण का काम कर रही है. वे छह प्रखंडों में मिड-डे मील बांटते हैं. वे कहते हैं, “हमलोग अलग-अलग लेवल पर चेक करके खाना भेजते हैं. जिस स्कूल में दिक्कत होती है, वहां वीडियो बनाकर खाना देते हैं. इसलिए ऐसा नहीं लगता कि हमारी तरफ से कोई दिक्कत हुई है. मुमकिन है कि स्कूल में कुछ हुआ होगा.”

मगर अभिभावक और स्कूल के कर्मचारी मानते हैं कि दिक्कत की वजह इस संस्था का सेंट्रलाइज्ड किचन ही है. दिलचस्प यह है कि इस इलाके में संस्था का किचन इसी गांव में है. इस घटना के बाद स्कूलों में रसोइया का काम करने वाली महिलाएं भी आक्रोश में हैं. उन्होंने सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (CITU) के बैनर तले सहरसा में विरोध मार्च निकाला और स्कूल में ही मिड-डे मील बनाने की मांग की.

बहरहाल इस घटना के बाद यह बहस तेज हो गई है कि मिड-डे मील स्कूल में पकाकर खिलाया जाए, या किसी संस्था की तरफ से केंद्रीकृत तरीके से आपूर्ति की जाए. दरअसल पहले बिहार के स्कूलों में ही मिड-डे मील पकता था मगर पिछले कुछ वर्षों से कुछ संस्थाएं केंद्रीकृत किचन के जरिए खाने की आपूर्ति करती हैं. अप्रैल 2026 तक के बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इस वक्त बिहार में कुल 71,772 स्कूलों में मिड-डे मील बांटा जाता है. इनमें प्राथमिक और मध्य विद्यालय के साथ-साथ नवाचारी स्कूल, संस्कृत विद्यालय और मदरसा भी शामिल हैं. इनमें से ज्यादातर स्कूलों में स्कूल के रसोइया ही भोजन पकाते हैं और प्रधानाचार्य इसकी व्यवस्था करते हैं.

लेकिन 12,234 स्कूल ऐसे हैं, जहां मिड-डे मील बनना बंद हो गया है. वहां NGO के जरिए सेंट्रलाइज्ड किचन में खाना पकने लगा है और संस्था का स्टाफ इसे गाड़ियों से स्कूल-स्कूल जाकर बांटता है. ऐसे सेंट्रलाइज्ड किचन अक्षय-पात्र जैसी प्रतिष्ठित संस्थाएं भी चला रही हैं. हालांकि मिड-डे मील कहां पके, इसको लेकर लोगों की राय अलग-अलग है. कुछ लोगों का कहना है कि इसे स्कूल में नहीं पकना चाहिए क्योंकि एक तो शिक्षक बेवजह व्यवस्था में उलझ जाते हैं और दूसरा यह भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है. वहीं कुछ लोग सेंट्रलाइज्ड किचन के खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं.

मध्य विद्यालय बीहट के प्राचार्य रंजन, जो अपने स्कूल की बेहतर व्यवस्था के लिए जाने जाते हैं, कहते हैं, “मेरे जिला बेगुसराय में भी कई स्कूलों में सेंट्रलाइज्ड किचन से खाना बंटता है, मगर अधिकारियों ने यह कहते हुए मेरे स्कूल को छोड़ दिया है कि यहां व्यवस्था अच्छी है. मैं यह समझ सकता हूं कि सेंट्रलाइज्ड किचन के खाने में कुछ गिर सकता है क्योंकि वहां खाना पकना रात दो बजे से ही शुरू हो जाता है. सुबह से ही उन्हें खाना वितरित करना होता है ताकि नौ बजे के आसपास जब लंच हो तब बच्चों को खाना दिया जा सके.”

रंजन कहते हैं, “यह ठीक बात है कि स्कूल में मिड-डे मील की व्यवस्था बनाना मुश्किल काम है, फिर भी बच्चों के नजरिए से देखें तो स्कूल में पकने वाला मिड-डे मील ही अच्छा होगा क्योंकि वह ताजा होता है. हां, इसके लिए सरकार को अच्छे व्यवस्थापक और अच्छे रसोइया की नियुक्ति करनी होगी. इसे सिर्फ शिक्षकों या प्रधानाध्यापक पर छोड़ देने से काम नहीं चलेगा.”

बलुआहा का स्कूल जहां यह घटना घटी, वह महिषी विधानसभा में आता है. वहां के विधायक गौतम कृष्ण भी स्कूल में ही मिड-डे मील पकाने की वकालत करते हैं. वे कहते हैं, “स्कूल में मिड-डे मील पकता है तो कम से कम शिक्षक देखते तो हैं कि क्या और कैसे पक रहा है. NGO वालों की क्या जिम्मेदारी? मेरा स्पष्ट मानना है कि मिड-डे मील स्कूल में पके और शिक्षक तथा विद्यालय शिक्षा समिति की निगरानी में रहे.” वहीं भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल कहते हैं, “पुरानी व्यवस्था के तहत स्कूलों में स्थानीय रसोइयों का बना ताजा भोजन बनाकर बच्चों को उपलब्ध कराया जाए ताकि खाने की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके.”

पोषण के मसले पर कई राज्यों में अभियान चला रहे ‘विकास संवाद’ संस्था के निदेशक सचिन कुमार जैन कहते हैं, “अगर हम मध्यान्ह भोजन के कॉन्सेप्ट को देखें तो उसके दो मकसद महत्वपूर्ण माने जाते रहे हैं. पहला, स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़े और उन्हें पोषण मिले. दूसरा मकसद सामाजिक भेदभाव को कम करना है क्योंकि अगर मिड-डे मील स्कूलों में बनेगा तो बच्चे एक साथ बैठकर खाएंगे और पकाने वाले विभिन्न समूहों से आएंगे. इससे छुआछूत और जातिवादी मानसिकता खत्म होती है.”

वे कहते हैं, “इसे स्कूलों में इसलिए भी पकाना चाहिए ताकि इसकी निगरानी समुदाय के लोग कर सकें. अगर वह सेंट्रलाइज्ड किचन में पकता है तो वहां आम लोगों का प्रवेश नहीं हो पाता. सामग्री की गुणवत्ता की निगरानी लोग नहीं कर सकते. कम्युनिटी मॉनिटरिंग भी नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट का हिस्सा है. यह तभी मुमकिन है जब स्कूल में खाना पके.”

यह पूछे जाने पर कि स्कूल में पकने से भ्रष्टाचार और शिक्षकों की व्यस्तता बढ़ जाती है, वे कहते हैं, “अभी जो राशि इसके लिए मिलती है, वह प्रति बच्चा काफी कम है. सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए. भ्रष्टाचार की एक वजह यह भी है. सरकार को चाहिए कि वह अलग किचन और बेहतर व्यवस्थापक व रसोइयों की नियुक्ति करे. यह तभी मुमकिन है जब सरकार इसके लिए प्रतिबद्ध हो.”

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