बिहार : मांझी या चिराग, कौन कर रहा जातिगत आरक्षण पर 'स्वार्थ' की राजनीति?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एससी,एसटी आरक्षण में सब-कैटेगराइजेशन के फैसले के बाद जहां चिराग पासवान इस मामले पर आक्रामक नजर आ रहे हैं, वहीं जीतन राम मांझी इसे स्वागतयोग्य बता रहे हैं

"मेरी राय में संपन्न तबके से आने वाले लोगों को आरक्षण का लाभ लेना बंद कर देना चाहिए. इससे समुदाय के दूसरे लोगों को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी. वहीं जिन्हें आरक्षण की सचमुच बहुत जरूरत है, उन्हें इसका अधिकतम लाभ मिलना चाहिए." यह बयान लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान का है.
अप्रैल, 2016 में चिराग ने यह बात एक बड़े अंग्रेजी अखबार को दिए गए खास इंटरव्यू में कही थी. अतीत को देखें तो चिराग दलित समुदाय से संबंधित होने और दलितों की राजनीति करने के बावजूद आरक्षण और दलित उत्पीड़न के मसले कुछ खास आक्रामक कभी नहीं दिखे हैं.
मगर हाल के दिनों में वे आरक्षण और दलितों के साथ समाज में होने वाले उत्पीड़न के मसले पर लगातार बोल रहे हैं. खास कर सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद, जिसमें अदालत ने राज्यों के एससी-एसटी कोटे में सब कैटेगरी बनाने के अधिकार को वैधता दी है.
चिराग पासवान ने इस फैसले के बाद कहा है कि सिर्फ आर्थिक आधार पर दलितों के साथ भेदभाव नहीं होता. वे कहते हैं, "एक दलित समाज से आने वाले युवा को ही घोड़ी पर चढ़ने से रोका जाता है. एक दलित समाज के व्यक्ति को ही मंदिर में प्रवेश करने से रोका जाता है. कई ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जहां संपन्न लोगों को भी, जो समाज में अच्छी पहचान बना चुके हैं. वे लोग भी अगर दलित समाज से आते हैं, वे जब मंदिर में जाते हैं तब मंदिर धुलवाया जाता है. आज भी इस तरह का भेदभाव चल रहा है."
चिराग पासवान सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ हैं, और वे इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला कर चुके हैं.
चिराग की राजनीति को लंबे अरसे से देखने वाले लोगों को उनका यह रुख चौंकाने वाला लग रहा है. वैसे तो एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ने इस फैसले पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है. मगर एनडीए में शामिल बिहार की ही एक पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के नेता जीतन राम मांझी ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है और इसका विरोध करने वालों को स्वार्थी बताया है.
केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने कहा है, "दलित वर्ग की सिर्फ चार जातियां ही अब तक आरक्षण का लाभ लेती रही है. जो लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहे हैं, वे स्वार्थी हैं. उनके ही समाज से आईएएस, आईपीएस, इंजीनियर बनते रहे हैं. मुसहर और भुइयां समाज में तो कोई आईएएस, आईपीएस नहीं है. आरक्षण में कोटे का फार्मूला तो काफी पहले लागू हो जाना चाहिए था."
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर एनडीए के बीच के अंतर्विरोध को लेकर काफी चर्चाएं हैं. मगर जानकार मानते हैं कि इन दोनों की राजनीतिक और वोट बैंक की मजबूरी ही है कि वे इस पर अलग-अलग रुख अख्तियार कर रहे हैं.
बिहार में वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कहते हैं, "मैं वैचारिक रूप से सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ हूं और मानता हूं कि ऐसा फैसला देने का उसको संवैधानिक अधिकार नहीं है. यह एक तरह का जुडीशियल एक्टिविज्म है. मगर जहां तक चिराग और मांझी के अलग-अलग बयानों का सवाल है. दोनों अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण ऐसा कह रहे हैं. अगर मांझी जी की ही बात ली जाए तो जब उनके पास कुछ करने का मौका आया, तो उन्होंने किसका भला किया. अपनी समधिन, समधी, दामाद, बेटी, बेटा-पतोहू से बाहर तो वे गए नहीं. चिराग पासवान ने किसके लिए किया, अपनों के लिए किया. उनके पिताजी ने अपने भाईयों को आगे बढ़ाया."
वे आगे कहते हैं, "जीतनराम मांझी हो या चिराग पासवान, दोनों पोलिटिकली गाइड हो रहे हैं. चिराग पासवान ने पहले आरक्षण छोड़ने का भी बयान दिया था. उन्हें तो सबसे पहले एनडीए में बात करनी चाहिए. वहां लोगों का क्या विचार है. मेरे ख्याल से वे आधी-अधूरी बात कर रहे हैं. गर्दन के ऊपर से बोल रहे हैं, नीचे से नहीं बोल रहे हैं. उनकी मजबूरी भी है, क्योंकि उनके मतदाता इस फैसले से नाराज हैं. मगर इसके बावजूद मुझे लगता है कि अगर उन्हें निर्देश मिला तो वे चुप भी हो सकते हैं. अगर नहीं चुप हों तो यह अच्छी बात है."
ऐसा माना जा रहा है कि जीतनराम मांझी भी अपनी राजनीतिक मजबूरी की वजह से इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं, क्योंकि उनका कोर वोटर जो मुसहर और भुइयां समाज का है, वह इस फैसले को पसंद कर रहा है. कुछ लोगों का यह आकलन भी है, चिराग इस लिए भी उग्र विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है, यह फैसला अगर आगे बढ़ा तो व्यक्तिगत रूप से उनकी राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है.
इस मसले पर लोजपा(रामविलास) के मुख्य प्रवक्ता राजेश कुमार भट्ट कहते हैं, "जब तक समाज में छुआ-छूत और भेदभाव की भावना रहेगी, तब तक सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उस तबके को खतरा है. इसलिए हमारी पार्टी इस फैसले की पक्षधर नहीं है. हमारे संस्थापक स्व. रामविलास पासवान भी हमेशा कहते रहे हैं, कोटे में कोटा को तब तक लागू नहीं किया जाये, जब तक समाज में भेदभाव मौजूद है. हमारी पार्टी इस मामले को लेकर पुनर्विचार याचिका दाखिल करने जा रही है."
जीतनराम मांझी के बयान पर उन्होंने कुछ भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.