यूपी की राजनीति पर क्या असर डालेगा बिहार का बदलाव?

बिहार में संभावित नेतृत्व परिवर्तन और ओबीसी चेहरे की चर्चा ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है

Nitish Kumar Rajya Sabha
राज्यसभा के लिए नामांकन फॉर्म भरते नीतीश कुमार के साथ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह

बिहार की राजनीति में तेज़ी से हो रहे घटनाक्रम का असर अब पड़ोसी उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी महसूस किया जाने लगा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की तैयारी और बिहार में संभावित नेतृत्व परिवर्तन ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर नई राजनीतिक गणनाओं को जन्म दिया है. 

खास तौर पर यह संभावना कि बिहार को अपना पहला BJP मुख्यमंत्री मिल सकता है, पार्टी के लिए केवल एक राज्य तक सीमित फैसला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसका असर उत्तर प्रदेश के जातीय और चुनावी समीकरणों तक फैलता हुआ दिख रहा है.

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और BJP लगातार तीसरी बार सत्ता बरकरार रखने की रणनीति बना रही है. ऐसे समय में बिहार में नेतृत्व परिवर्तन और वहां से किसी बड़े ओबीसी चेहरे के उभरने की संभावना को BJP के रणनीतिकार सामाजिक संतुलन साधने के बड़े अवसर के रूप में देख रहे हैं. इसी दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी इस बीच उत्तर प्रदेश में अपने संगठनात्मक ढांचे के भीतर मंथन की प्रक्रिया तेज कर दी है.

हाल ही में संघ की छह क्षेत्रीय इकाइयों की कोऑर्डिनेशन मीटिंग शुरू हुई हैं, जिनमें जाति आधारित राजनीतिक समीकरण प्रमुख एजेंडा बने हुए हैं. इन बैठकों में BJP के शीर्ष प्रदेश पदाधिकारी भी शामिल हुए. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 3 मार्च को गोरखपुर में हुई गोरखपुर प्रांत की समन्वय बैठक में हिस्सा लिया, जिसमें संगठन महामंत्री धर्मपाल, प्रांत प्रचारक रमेश और संघ के अन्य पदाधिकारी भी मौजूद थे. इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य बदलते सामाजिक समीकरणों को समझना और 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले संगठनात्मक रणनीति को उसी के अनुरूप ढालना बताया जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BJP अब केवल विकास और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर नहीं, बल्कि जातीय संतुलन को भी पहले से अधिक व्यवस्थित तरीके से साधने की तैयारी कर रही है.

दरअसल, पिछले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति आधारित असंतोष की चर्चाएं तेज हुई हैं. ब्राह्मण समुदाय में नाराज़गी, कुछ ओबीसी समूहों की दूरी और लोकसभा चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन न होने से BJP के भीतर आत्ममंथन चल रहा है. पार्टी का मानना है कि इन सामाजिक समीकरणों को संतुलित किए बिना 2027 का चुनाव उतना आसान नहीं होगा, जितना 2017 या 2022 में था. इसी पृष्ठभूमि में BJP अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की तैयारी कर रही है. 

प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी मार्च के अंत तक पार्टी के प्रदेश पदाधिकारियों की नई टीम घोषित करने की दिशा में काम कर रहे हैं. पार्टी सूत्रों का कहना है कि इस बार नई टीम में क्षेत्रीय संतुलन से ज्यादा ध्यान जातीय प्रतिनिधित्व पर दिया जाएगा. इस बदलाव का संकेत हाल ही में तब मिला जब पार्टी ने 11 जिलों के अध्यक्षों की घोषणा की. इस सूची में एक अतिरिक्त कॉलम जोड़ा गया, जिसमें हर नियुक्त पदाधिकारी की जाति का उल्लेख था. इनमें कश्यप, ब्राह्मण, ठाकुर, पासी, वैश्य, मौर्य और कायस्थ जैसे समुदायों का प्रतिनिधित्व दिखाया गया. इन 11 अध्यक्षों में छह सवर्ण, तीन ओबीसी और दो अनुसूचित जाति वर्ग से हैं.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ पंकज चौधरी

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह कदम केवल संगठनात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि आने वाले चुनावों के लिए BJP की सामाजिक रणनीति का संकेत है. लखनऊ में बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय कहते हैं, “BJP लंबे समय से सामाजिक इंजीनियरिंग की राजनीति करती रही है. लेकिन अब उसे महसूस हो रहा है कि अलग-अलग जाति समूहों के बीच संतुलन को और सूक्ष्म तरीके से संभालने की जरूरत है. बिहार में अगर कोई बड़ा ओबीसी चेहरा उभरता है तो उसका मनोवैज्ञानिक असर उत्तर प्रदेश के ओबीसी वोटरों पर भी पड़ सकता है.” 

दरअसल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बीच सामाजिक और राजनीतिक संबंध काफी गहरे हैं. दोनों राज्यों में कई प्रमुख जाति समूह समान हैं और उनके बीच पारिवारिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्क भी लगातार बना रहता है. यही कारण है कि बिहार में होने वाले राजनीतिक बदलावों को पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी गंभीरता से देखा जाता है.

BJP के भीतर यह आकलन किया जा रहा है कि अगर बिहार में पार्टी किसी ओबीसी नेता को मुख्यमंत्री बनाती है तो इससे उत्तर प्रदेश में भी सामाजिक संतुलन मजबूत करने का संदेश जाएगा. खास तौर पर उस स्थिति में, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद ठाकुर समुदाय से आते हैं. BJP के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, “बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली जाति समूह लगभग समान हैं. ऐसे में अगर बिहार में ओबीसी मुख्यमंत्री होता है तो इससे BJP की सामाजिक छवि संतुलित होगी. इससे यह संदेश जाएगा कि पार्टी सभी वर्गों को बराबर प्रतिनिधित्व दे रही है.” 

इस संदर्भ में बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी का नाम भी चर्चा में है. वे कुशवाहा समुदाय से आते हैं और ओबीसी राजनीति में उनका प्रभाव माना जाता है. BJP और JDU दोनों के कुछ नेताओं का मानना है कि यदि नेतृत्व परिवर्तन होता है तो कुर्मी, कुशवाहा या अत्यंत पिछड़ा वर्ग से किसी नेता को आगे लाया जा सकता है. इसका असर उत्तर प्रदेश के उन ओबीसी समूहों पर पड़ सकता है जो राजनीतिक रूप से बेहद सक्रिय हैं. इनमें कुशवाहा, मौर्य, सैनी और शाक्य समुदाय प्रमुख हैं. ये समूह अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभाव रखते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सैनी समुदाय का प्रभाव है, जबकि मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुशवाहा और मौर्य समुदाय मजबूत माने जाते हैं. वहीं बुंदेलखंड और ब्रज क्षेत्र में शाक्य समुदाय की उल्लेखनीय मौजूदगी है. 

यूपी की तीन दर्जन से ज्यादा सीटों का सवाल

पूर्वी उत्तर प्रदेश में बिहार से सटी सीमा वाले जिलों महाराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, बलिया, गाजीपुर, चंदौली और सोनभद्र जैसे जिलों में कुल मिलाकर 41 विधानसभा सीटें आती हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में BJP और उसकी सहयोगी निषाद पार्टी ने इन सीटों में से 27 पर जीत हासिल की थी. वहीं समाजवादी पार्टी और उसकी तत्कालीन सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को 12 सीटें मिली थीं. कांग्रेस और बीएसपी को एक-एक सीट पर जीत मिली थी. 

हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में BJP को झटका लगा. समाजवादी पार्टी ने बलिया, गाजीपुर, चंदौली, रॉबर्ट्सगंज और सलेमपुर जैसी पांच सीटें जीत लीं, जबकि BJP केवल कुशीनगर, महाराजगंज और देवरिया जैसी तीन सीटों तक सिमट गई. पूर्वांचल के व्यापक परिदृश्य में देखें तो यह बदलाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में पूर्वांचल की 27 सीटों में से 20 पर BJP की अगुवाई वाले गठबंधन एनडीए ने जीत दर्ज की थी. लेकिन 2024 में इंडिया ब्लॉक ने इस क्षेत्र में BJP के मजबूत गढ़ को चुनौती दे दी. 

2019 में BJP ने यहां 18 सीटें जीती थीं और उसकी सहयोगी अपना दल (एस) को दो सीटें मिली थीं. लेकिन 2024 में BJP की सीटें घटकर 10 रह गईं, जबकि अपना दल (एस) को दो में से केवल एक सीट मिली. दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने इस क्षेत्र में बड़ा उछाल दिखाते हुए 15 सीटें जीत लीं, जबकि कांग्रेस ने इलाहाबाद सीट जीतकर गठबंधन को मजबूती दी. 

इन नतीजों ने BJP के भीतर चिंता बढ़ा दी है. पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि अगर पूर्वांचल में गिरावट का यह रुझान जारी रहा तो 2027 के विधानसभा चुनाव में चुनौती और बढ़ सकती है. यही कारण है कि पार्टी अब बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बीच राजनीतिक तालमेल को मजबूत करने की रणनीति पर भी विचार कर रही है. BJP के एक क्षेत्रीय नेता का कहना है, “अगर बिहार के किसी बड़े ओबीसी नेता का पूर्वी उत्तर प्रदेश में लगातार दौरा और राजनीतिक संवाद होता है तो इससे यहां के ओबीसी और सवर्ण वोटरों को फिर से जोड़ने में मदद मिल सकती है.”

इस राजनीतिक समीकरण को सामाजिक कारक भी मजबूत बनाते हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बिहार से आने वाले लोगों की बड़ी आबादी रहती है. गोरखपुर और वाराणसी जैसे शहरों में बिहार के लोगों के लिए प्रमुख मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिसके कारण दोनों राज्यों के बीच लगातार आवाजाही बनी रहती है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय संतुलन का सवाल और अधिक प्रमुख हो सकता है. BJP संगठन में बदलाव, संभावित कैबिनेट विस्तार और बिहार में नेतृत्व परिवर्तन जैसे फैसले मिलकर एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन सकते हैं.

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