रोजाना हजारों जानें जोखिम में! बिहार में नाव पर सफर क्यों है खतरनाक?

जिस जल परिवहन के जरिए बिहार में हर साल करीब 35 लाख लोग यात्रा करते हैं उसकी सुरक्षा व्यवस्थाओं को लेकर सरकार बेपरवाह दिखती है

ferry service near vikramshila setu (Photo : Pushyamitra)
भागलपुर के बरारी घाट पर फेरी सर्विस; विक्रमशिला सेतु (पीछे)

अररिया के रानीगंज से अपने घुटनों का इलाज कराने भागलपुर आ रहे बुजुर्ग रमेश प्रसाद साह बरारी घाट पर नाव से तो किसी तरह उतर गए. मगर वे घाट की पथरीली जमीन पर चढ़ नहीं पाए. उन्हें नाविकों ने हाथ का सहारा देकर आगे बढ़ाया. पूछने पर वे कहने लगे, "दिक्कत ये नहीं है कि पुल टूट गया और नाव की सवारी करनी पड़ रही है… 2001 से पहले तक तो हमलोग नाव-जहाज से ही इधर आते रहे हैं. असल दिक्कत है कि व्यवस्था ठीक नहीं है. यहां प्लेटफार्म तो ठीक होना चाहिए था."

3-4 मई की दरम्यानी रात विक्रमशिला सेतु का एक स्लैब टूटकर गिर जाने के बाद से ही इस रूट पर महादेवपुर घाट से बरारी घाट के बीच 75 से अधिक नावें और एक खुला जहाज चलाया जा रहा है. इस रास्ते से 12 से 15 हजार लोग रोज गंगा नदी को पार कर रहे हैं. मगर इस हादसे के लगभग एक पखवाड़ा बीत जाने के बाद भी सरकार यहां नौका परिचालन की बेहतर व्यवस्था नहीं कर पा रही है.

रमेश प्रसाद जैसे बुजुर्गों के लिए घाट पर उतरना-चढ़ना ही मुसीबत भरा काम है

इस स्पॉट को तो सरकार ने अपनी प्रतिष्ठा का विषय बनाया है और यहां कुछ इंतजाम भी हुए हैं. मगर राज्य के जिन 1550 अन्य नौका घाटों से रोज नावों का परिचालन हो रहा है वहां तो व्यवस्था और सुरक्षा के इंतजाम नहीं के बराबर हैं. इसकी वजह यह है कि जिस जल परिवहन के जरिए बिहार में हर साल करीब 35 लाख लोग यात्रा करते हैं वह बिहार सरकार के परिवहन विभाग की प्राथमिकताओं में नहीं है.

इसी वजह से इन घाटों पर न समतल प्लेटफार्म हैं, न यात्रियों के लिए शेड हैं और न नावों पर यात्रियों के बैठने की ढंग की व्यवस्था है. नावों पर न तो लोड लिमिट तय है और न ही किसी नाव पर यात्रियों के लिए लाइफ जैकेट के इंतजाम दिखते हैं. नावों पर छत भी नहीं है जिससे असामान्य मौसम में बारिश और धूप से यात्रियों का बचाव हो सके. इतना ही नहीं, राज्य की अधिकतर निजी नावों का सरकार के पास पंजीकरण भी नहीं है. यह पंजीकरण बिहार नौकाघाट बंदोबस्ती एवं प्रबंधन अधिनियम और बिहार आदर्श नौका नियमावली की आवश्यक शर्त है. इसके कारण भी अक्सर बिहार में नावें पलटती रहती हैं और लोग डूबते रहते हैं.

80 से अधिक नौका परिचालन के लिए उपयुक्त नदियों वाले राज्य बिहार में जल परिवहन हमेशा से यातायात का महत्वपूर्ण जरिया रहा है. महज तीन दशक पहले तक गंगा नदी में पटना, मुंगेर, भागलपुर समेत कई जगहों पर बड़े-बड़े जहाज चला करते थे. अभी भी कटिहार जिले के मनिहारी में जहाजों का परिचालन होता है. इसके अलावा राज्य के 29 जिलों में अभी नदियों में नावें चलती हैं.

भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग परिवहन के आंकड़ों के मुताबिक साल 2025-26 में बिहार के जहाजों से 5307 यात्रियों ने यात्रा की है और लकड़ी की नावों से 35,16,598 यात्रियों ने सफर किया है. परिवहन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में इस वक्त 1550 घाटों से लकड़ी की नावों के जरिए लोग नदी पार कर रहे हैं. इन घाटों पर सात हजार से अधिक नावों का परिचालन हो रहा है. परिवहन विभाग यह बताता है कि इनके अलावा 150 अन्य घाटों पर विभाग कम्युनिटी जेटी के निर्माण की तैयारी में है. इसके अलावा सरकार मनिहारी में रो-रो और रो-पैक्स की सुविधा देने की तैयारी कर रही है. सोन नदी में भी नौवहन की तैयारी है.

मगर इन तमाम घाटों पर यात्रियों के लिए बुनियादी सुविधाएं नहीं है. नावों पर चढ़ने के लिए अभी भी बांसों को जोड़कर छोटी सी पुलिया बनाई जाती है. ऐसा कोई समतल प्लेटफार्म नहीं है, जहां जाकर लोग सीधे नावों पर चढ़ सकें. चढ़ने से पहले यात्री नावों के इंतजार में कहां बैठें और नावों पर चढ़ने के बाद आराम से बैठ सकें, इसके भी इंतजाम नहीं हैं. ज्यादातर यात्रियों को नाव की जमीन पर बैठना पड़ता है. यह जिक्र पहले ही किया जा चुका है कि इनमें से किसी नाव के ऊपर छत नहीं है. ऐसे में यात्रा के दौरान अगर तेज बारिश हो गई तो यात्रियों का और उनके सामान का भीगना तय है. धूप और आंधी में भी दिक्कतें होती हैं.

रश्मि सरकारी टीचर हैं. उन्होंने 1200 रुपए में अपने लिए लाइफ जैकेट खरीदी है (फोटो : पुष्यमित्र)

जहां तक सुरक्षा का सवाल है, एक भी मानक पूरा नहीं होता है. बिहार आदर्श नौका नियमावली के मुताबिक हर नाव का रजिस्ट्रेशन अंचल कार्यालय में होना जरूरी है. इसके बाद अंचल कार्यालय के लोग नावों का आकार माप कर उसके लिए यात्रियों और सामान के लोड का निर्धारण करेंगे. यह लोड लिमिट हर नाव पर लिखी होगी. इसके अलावा हर नाव में एक गोताखोर और हर यात्री के लिए लाइफ जैकेट अनिवार्य है. नावों में पर्याप्त संख्या में ट्यूब भी होने चाहिए ताकि यात्री उसके सहारे आपदा की स्थिति में अपना बचाव कर सकें.

अब चूंकि राज्य की 90 फीसदी से अधिक नावों का रजिस्ट्रेशन ही नहीं हुआ है इसलिए न लोड लाइन तय हुई है और न ही सुरक्षा के इंतजाम हैं. इस वजह से बिहार में अक्सर नौका दुर्घटनाएं होती रहती हैं. 2009 में खगड़िया के फुलतोड़ा में नाव पलटने से 80 लोगों की मौत हो गई थी. 2010 में बक्सर में नाव डूबने की वजह से 30 लोगों की मौत हो गई और 2017 में पटना के पास गंगा नदी में नाव टूट जाने से 25 लोगों की जान चली गई. इनके अलावा छोटी-छोटी घटनाएं अक्सर होती हैं. हर बार इसको लेकर शोर-शराबा होता है लेकिन कोई खास कदम नहीं उठाए जाते.

हालांकि बिहार सरकार का आपदा प्रबंधन प्राधिकार समय-समय पर अपने स्तर से नाविकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था करता है. मगर असल काम इनकी निगरानी का है. यह निगरानी परिवहन विभाग को और स्थानीय स्तर पर अंचल अधिकारियों को करनी है जो पहले से तरह-तरह की जिम्मेदारियों से घिरे रहते हैं.

अगस्त, 2024 में इसी तरह गंगा नदी में पटना के पास एक शिक्षक के डूबने के बाद नावों के रजिस्ट्रेशन और सुरक्षा के इंतजाम की बात उठी थी. मगर उसका पालन नहीं हुआ. अभी विक्रमशिला में परिचालित हो रही 75 से अधिक नावों का रजिस्ट्रेशन और लोड लिमिट तो तय हुई है मगर लाइफ जैकेट की सुविधा किसी नाव पर नहीं दिखती.

बिहार की नदियों के अध्येता एवं जल संसाधन विभाग के पूर्व अधिकारी गजानन मिश्र कहते हैं, "बिहार में जल परिवहन की व्यवस्था हमेशा से बेहतरीन रही है. एक समय में यही बिहार की समृद्धि का आधार रहा है. अंग्रेजों ने साल 1900 के बाद से इससे परहेज करना शुरू किया, खास कर रेल लाइन बिछाए जाने के बाद. अब तो हर जगह सड़कें और पुल बन गए हैं. जहां नावें चल रही हैं वे इसलिए चल रही हैं क्योंकि वहां पुल बने नहीं हैं. जिस रोज पुल बन जाएंगे, वहां नावें खत्म हो जाएंगी. चूंकि जल परिवहन सरकार की प्राथमिकता में नहीं है इसलिए इन घाटों का यह हाल है."

वहीं नॉर्वे में रह रहे बिहार मूल के लेखक प्रवीण झा कहते हैं, "लोग बिहार में भले जल परिवहन को पिछड़ी व्यवस्था मानें, मगर नॉर्वे में ज्यादातर नदियों पर पुल नहीं हैं. वहां हाइवे नदियों के किनारे खत्म होता है और आगे का सफर फेरियों के जरिए करना पड़ता है. वहां प्लेटफार्म बने रहते हैं. हालांकि फेरियों की व्यवस्था अच्छी होती है. उसके निचले हिस्से में प्लेटफार्म बना होता है, जहां गाड़ियां चली जाती हैं. ऊपर बैठने, खाने-पीने और शौच की जगह होती है. सुरक्षा के इंतजाम बेहतरीन होते हैं. हर यात्री के लिए लाइफ जैकेट और लाइफ राफ्ट होती है. चालक दल की नियमित ट्रेनिंग होती है. इन फेरियों में जीपीएस, रडार और नेविगेशन सिस्टम होता है. साथ ही मेडिकल सहायता और फायर सेफ्टी भी होती है. वहां की भौगोलिक स्थिति ऐसी नहीं है कि हर जगह नदी पर पुल बनाया जा सके, इसलिए जल परिवहन को बढ़ावा दिया जाता है."

लगभग ऐसी ही स्थिति नदियों से घिरे उत्तर बिहार के कई इलाकों की है. खासकर सीमांचल के इलाके में अभी भी कई जगहों पर नावें चलती हैं और गर्मियों में चचरी के पुल बनाए जाते हैं. अगर सरकार सीमांचल समेत बिहार के दूसरे इलाकों में जल परिवहन से जुड़ी व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने की कोशिश करे तो यह न सिर्फ सुरक्षित और आरामदायक होगा बल्कि सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल भी होगा. मगर क्या सरकार इस दिशा में सोचेगी?

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