बिहार में लाखों एकड़ जमीन पर 11 नए शहर बनेंगे, मगर इनमें रहेगा कौन?

बिहार सरकार ने 11 नई टाउनशिप की परियोजना के लिए चुने गए इलाकों में अगले एक साल तक जमीन की खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी है

LDA Making New Township
इन नए शहरों को बसाने के लिए सरकार खुद जमीन अधिग्रहण करेगी (सांकेतिक तस्वीर)

बिहार का औद्योगिक विकास न होने के पीछे एक बड़ी वजह यहां शहरीकरण का अभाव माना जाता है. जनगणना के अनुमानित आंकड़े बताते हैं कि जहां 2026 तक देश में शहरीकरण की दर 36.1 फीसदी है, वहीं बिहार में यह सिर्फ 15.3 फीसदी है. हालांकि सरकार ने इसके लिए पहले भी कुछ प्रयास किए हैं.

जैसे 31 ग्राम पंचायतों को सीधे शहर में बदल दिया गया, ताकि शहरी आबादी बढ़ सके. अब सरकार एक नई योजना लेकर आई है. राज्य की 11 जगहों पर ग्रीनफील्ड सैटेलाइट टाउनशिप तैयार की जा रही है, ताकि 11 नए शहर विकसित हों. मगर क्या सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना कारगर होगी?

बिहार सरकार ने 2026-27 के बजट में 11 नई टाउनशिप विकसित करने की योजना की घोषणा की है. ये नए शहर नौ प्रमंडलीय मुख्यालयों के पास और सीतामढ़ी एवं सोनपुर जैसे धार्मिक शहरों के आसपास बनेंगे. इसे प्लानिंग के तहत बसाए गए शहरों के विकास की योजना का पहला चरण बताया जा रहा है. इसके लिए इस वित्तीय वर्ष में 1800 करोड़ रुपए की राशि का प्रावधान किया गया है.

इसकी वजह बताते हुए कहा गया है कि आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य में शहरी आबादी बढ़ी है. बढ़ती शहरी आबादी की आवासीय जरूरतों को पूरा करने के लिए यह योजना बनाई जा रही है. हालांकि, आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े इस दावे की पुष्टि नहीं करते. वहां भी यही दर्ज है कि बिहार की शहरी आबादी 15.3 फीसदी की दर से ही बढ़ रही है और राज्य की करीब 15 फीसदी आबादी ही शहरों में रहती है.

इसके बावजूद सरकार 11 नई टाउनशिप के लिए हजारों करोड़ खर्च करने की तैयारी में है. नगर विकास एवं आवास विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, सरकार इसके कोर एरिया के लिए लगभग 12,500 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करेगी. अगर स्पेशल एरिया को भी जोड़ दिया जाए, तो लगभग 2.5 लाख एकड़ जमीन का इस्तेमाल इस परियोजना में होने वाला है. इस परियोजना को लागू कराने के लिए सरकार ने अगले एक साल के लिए इन इलाकों में जमीन की खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी है.

हालांकि, इस रोक की वजह से जब राज्य में कई जगह किसानों ने प्रदर्शन शुरू किया, तो विभाग की तरफ से स्पष्टीकरण आया. विभाग ने कहा कि यह रोक सिर्फ बिचौलियों और भू-माफियाओं को इस योजना का गलत लाभ लेने से रोकने के लिए लगाई गई है और यह किसानों के हित में है.

यह भी कहा गया कि जमीन विकसित करके इसमें से 55 फीसदी हिस्सा किसानों को वापस लौटा दिया जाएगा और वे अपने हिसाब से उसे बेच सकेंगे. 22 फीसदी जमीन का उपयोग सड़कें और बुनियादी ढांचा विकसित करने में किया जाएगा. पांच फीसदी हिस्सा पार्क और हरियाली के लिए होगा, जबकि तीन फीसदी जमीन आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए सुरक्षित रखी जाएगी.

मगर मूल सवाल यह है कि बिहार सरकार की यह अति महत्वाकांक्षी योजना क्या सचमुच अपने लक्ष्य में कामयाब होगी? यह समझने के लिए हमने पटना के शहरी विकास के इतिहास पर शोध करने वाली शीमा फातमी से बात की. वे इस वक्त मुंबई के एक आर्किटेक्चर कॉलेज में पढ़ाती हैं.

शीमा कहती हैं, “देश में ऐसे ग्रीनफील्ड सैटेलाइट टाउनशिप का एक इतिहास रहा है. इनमें राउरकेला, भिलाई और जमशेदपुर जैसे शहर हैं, जहां बड़े उद्योगों की वजह से शहर विकसित किए गए. उसी तरह महाराष्ट्र के सचिवालय को शिफ्ट करने के लिए नवी मुंबई बनाया गया. हम देखते हैं कि या तो उद्योग या दफ्तरों के लिए ऐसे सैटेलाइट टाउनशिप विकसित किए जाते हैं. यानी ऐसे शहरों के पीछे एक आर्थिक कारण होता है, तभी लोग वहां जमीन लेकर बसते हैं. अब बिहार में जो 11 टाउनशिप तैयार होंगी, क्या वहां कोई आर्थिक गतिविधि संचालित होगी? यह तो दिखता नहीं. एक बार राजधानी पटना को लेकर मान भी लें कि यहां कुछ आर्थिक गतिविधि होगी, मगर क्या सहरसा और मुंगेर जैसे शहर जहां आर्थिक गतिविधि न्यूनतम है, वहां विकसित होने वाली टाउनशिप में भी लोग रहना चाहेंगे? यह बड़ा सवाल है, सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए.”

इस बात को और विस्तार देते हुए शीमा कहती हैं, “जैसे मुंगेर शहर में हमारा काफी बड़ा और सुविधासंपन्न घर है, फिर भी हम मुंबई में वन बीएचके में रहते हैं क्योंकि मुंगेर में मेरे लिए आजीविका का साधन नहीं है. ऐसे में इन छोटे शहरों के आसपास जो टाउनशिप विकसित होंगे, वहां कौन रहेगा?”

हालांकि कई बार ऐसा भी होता है कि किसी शहर की आबादी इतनी बढ़ जाती है कि आवास की दिक्कतें होने लगती हैं. ऐसे में नया शहर बसाया जाता है. जैसे पटना में काफी पहले ऐसा हुआ, तो बोरिंग रोड और पाटलिपुत्र कॉलोनी बसाए गए. अभी तो पटना भी हर तरफ आसानी से फैल रहा है. दूसरे शहरी इलाकों में भी ऐसी गुंजाइश है. 

शीमा बिहार सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण करके शहरों को विकसित करने के इतिहास को लेकर भी फिक्रमंद नजर आती हैं. वे कहती हैं, “इसका इतिहास बहुत बुरा है. चाहे हाउसिंग बोर्ड हो या पटना इंप्रूवमेंट ट्रस्ट, इन्होंने जो भी कॉलोनियां बसाईं, उनमें ज्यादातर संपन्न लोगों को ही जमीन मिली. LIG तक में गरीब नहीं आ पाए और बाद में रिहायशी कॉलोनियों को बाजार में बदलने जैसे उदाहरण भी दिखे. पटना में राजीव नगर के हाउसिंग बोर्ड की जमीन के विवाद से हम अभी भी जूझ रहे हैं. इसलिए मुझे लगता है कि सरकार को भूमि अधिग्रहण करने के बदले भूमि के उपयोग का डिमार्केशन करना चाहिए. वह क्यों प्रॉपर्टी डीलर बनना चाहती है? वह तय कर दे कि यहां सड़क, यहां पार्क, यहां स्कूल और यहां बाजार होंगे. सरकार को ऐसी स्थिति में हाउसिंग को-ऑपरेटिव बनाना चाहिए.”

शीमा कहती हैं, “अभी हमारे शहरों की सबसे बड़ी जरूरत वहां बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास करना है. सड़क, पानी, ड्रेनेज, पार्क, शौचालय, कूड़ा निस्तारण और पब्लिक हेल्थ की सुविधा किसी भी शहर के लिए जरूरी मानक हैं. हमारे एक भी शहर में ये सब नहीं है. सरकार को पहले इधर ध्यान देना चाहिए.”

बिहार में रहने वाली अधिकांश आबादी यह बता सकती है कि सरकार अपने मौजूदा शहरों को बेहतर नहीं बना पा रही. शीमा के मुताबिक इसलिए उसने तय कर लिया है कि वह नए शहर बनाएगी. मगर सवाल यह है कि इतने सरकारी खर्च के बावजूद, पटना को छोड़ दें तो क्या दूसरे शहरों में लोग रहने आएंगे? क्या सचमुच सहरसा और मुंगेर जैसे शहरों से कोई मांग है कि उन्हें नए शहर चाहिए? क्या उन शहरों में कोई उद्योग, कारोबार या आर्थिक गतिविधि होगी? क्या रोजगार की सुविधा होगी जिससे लोग वहां बसना चाहें? इन सवालों को उठाते हुए शीमा कहती है कि उन्हें फिलहाल उन्हें यह योजना हवा-हवाई ही लग रही है.

Read more!