ट्रेनी आईपीएस, नेता और वसूली गैंग; भीलवाड़ा खनन कांड की अंदरूनी कहानी
भीलवाड़ा में अवैध खनन की इस कहानी में माफिया, सत्ता और पुलिस, तीनों का बड़ा ही पुख्ता गठजोड़ उजागर होता है

राजस्थान के भीलवाड़ा में 'रेत का सोना' कहे जाने वाले गारनेट के अवैध खनन और वसूली का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़ की परतें उधेड़ दी हैं. खनन माफिया, सत्ता और पुलिस के तिकड़मी नेटवर्क की यह कहानी अब जयपुर से लेकर नई दिल्ली तक सियासी हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है.
पांच अप्रैल को भीलवाड़ा जिले के जहाजपुर से भारतीय जनता पार्टी (BJP) विधायक गोपीचंद मीणा का प्रतिनिधि बनकर अवैध वसूली करने वाले अजय पांचाल की गिरफ्तारी ने इस पूरे खेल का पर्दाफाश किया. पांचाल के मोबाइल से मिले सबूतों ने पुलिस को भी हैरान कर दिया है.
जांच में सामने आया कि गारनेट के अवैध खनन से जुड़े कारोबारियों से वसूली करने वाले नेटवर्क में प्रशिक्षु आईपीएस माधव उपाध्याय और कुछ थानों के प्रभारियों के नाम भी शामिल हैं. उपाध्याय भीलवाड़ा के सदर थाने में पुलिस उपाधीक्षक के रूप में तैनात थे और उन्होंने अपनी पहली पोस्टिंग में ही अवैध खनन से जुड़े लोगों से वसूली शुरू कर दी थी. नाम सामने आते ही सरकार ने उन्हें पद से हटाकर एपीओ कर दिया है.
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि अजय पांचाल, माधव उपाध्याय और दो थानों के सर्किल ऑफिसर मिलकर वसूली का यह नेटवर्क चला रहे थे. खनन कारोबारियों से रकम वसूलने और उसके बंटवारे की कहानी काफी दिलचस्प है.
हाल ही में इस गिरोह ने गारनेट कारोबारियों से करीब 6 लाख रुपए वसूले थे. बंटवारे के दौरान रकम कम पड़ने पर ये लोग भीलवाड़ा के एक इलेक्ट्रॉनिक शोरूम पहुंचे, जहां क्रेडिट कार्ड से एक लाख रुपए का ट्रांजेक्शन कर नकद राशि ली गई. जिस वक्त यह पूरा लेनदेन और बंटवारा हुआ, उस समय माधव उपाध्याय भी मौके पर मौजूद थे. बताया जा रहा है कि वसूली की रकम पहले इसी शोरूम पर जमा होती थी और बाद में आपस में बांटी जाती थी.
हालांकि, उपाध्याय ने अपने बचाव में कहा है कि अजय पांचाल उनके लिए एक मुखबिर के तौर पर काम करता था और उसी की सूचना पर पुलिस अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई करती थी. उन्होंने शोरूम पर अपनी मौजूदगी को निजी संबंध बताते हुए इसे सामान्य बात करार दिया.
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि यह गठजोड़ उन्हीं खनन कारोबारियों पर कार्रवाई करता था जो वसूली देने से इनकार करते थे. इतना ही नहीं, पुलिस अधीक्षक धर्मेंद्र सिंह यादव द्वारा भेजी गई छापेमारी टीमों की जानकारी भी यह गिरोह पहले ही लीक कर देता था, जिससे अवैध खनन में लगे लोगों को बचने का मौका मिल जाता था.
एसपी धर्मेंद्र सिंह यादव को जब इस गठजोड़ की भनक लगी, तो उन्होंने अपने विश्वस्त अधिकारियों के जरिए गुप्त जांच शुरू करवाई. कई महीनों तक इंटेलिजेंस टीम ने इस नेटवर्क पर नजर रखी, जिसमें स्थानीय जनप्रतिनिधियों, उनके सहयोगियों और पुलिस की संदिग्ध भूमिका सामने आई.
एसपी ने जैसे ही जिले में अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई तेज की, स्थानीय जनप्रतिनिधियों में उनके प्रति नाराजगी बढ़ गई. बताया जा रहा है कि जिले के कई विधायकों ने उनका तबादला करवाने के लिए मुख्यमंत्री और उच्च अधिकारियों तक शिकायतें पहुंचाईं. बीते13 मार्च को जारी 64 आईपीएस अधिकारियों की तबादला सूची में धर्मेंद्र सिंह यादव का नाम नहीं आने पर यह नाराजगी और खुलकर सामने आ गई. इसका असर तब दिखा जब भीलवाड़ा दौरे पर आए उप मुख्यमंत्री प्रेम चंद बैरवा की बैठक का जिले के सातों विधायकों ने बहिष्कार कर दिया.
खनन मामलों के जानकार किशोर कुमावत के अनुसार, "राजस्थान में अवैध बजरी और चेजा पत्थर खनन से माफिया हर साल करीब 10 हजार करोड़ रुपए कमाते हैं, जिसके बदले पुलिस और राजनीतिक तंत्र को भारी कमीशन दिया जाता है. खनन क्षेत्रों में पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति तक माफियाओं और स्थानीय नेताओं के प्रभाव में होती है."
गृह विभाग के आंकड़े भी इस खतरनाक गठजोड़ की पुष्टि करते हैं. पिछले पांच वर्षों में खनन माफियाओं ने 122 पुलिसकर्मियों पर हमले किए, जिनमें पांच की मौत हो गई. वहीं अवैध बजरी खनन में लगे वाहनों से कुचलकर सूबे में 33 लोगों की जान जा चुकी है.
भीलवाड़ा का यह मामला राजस्थान में खनन माफिया की उस सच्चाई को उजागर करता है, जहां कानून, राजनीति और प्रशासन के बीच की सीमाएं लगभग मिट चुकी हैं. अब सवाल सिर्फ चार आरोपियों या एक आईपीएस अधिकारी की भूमिका तय करने का नहीं है, बल्कि यह है कि आखिर इस पूरे नेटवर्क को संरक्षण कौन दे रहा था.