भरत तिवारी एनकाउंटर : जब एक युवक और पुलिस, दोनों ने लांघ दी सीमा
भरत तिवारी शिकायतों से कितने भी परेशान रहे हों, उनका हथियार लहराना गलत था लेकिन क्या सरकार के पास गोलियों के अलावा कोई दूसरा जवाब नहीं था?

भारत तिवारी को अवैध हथियार लेकर, मानसिक रूप से अस्थिर और उत्तेजित हालत में फेसबुक लाइव करते हुए फायरिंग नहीं करनी चाहिए थी. कोई भी सभ्य समाज इसे सही नहीं ठहरा सकता. उनकी शिकायतें चाहे जितनी भी गंभीर या जायज रही हों लेकिन जिस पल उन्होंने पिस्तौल उठाकर पुलिसकर्मियों की ओर तान दी, उसी पल उन्होंने एक सीमा लांघ दी.
लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही असहज करने वाला है. कोई सभ्य समाज इस संभावना को भी सहजता से स्वीकार नहीं कर सकता कि जब आत्मसमर्पण का मौका आया, तब भी जवाब गोलियों से दिया गया. यही इस मामले की सबसे बड़ी विडंबना है, जिसने कई दिनों से बिहार का ध्यान अपनी ओर खींच रखा है.
एक तरफ सोशल मीडिया पर पिस्तौल लहराते हुए कथित तौर पर 26 वर्षीय युवक की तस्वीर है तो दूसरी तरफ पुलिस मुठभेड़ में उसकी मौत के बाद का दृश्य. इन दोनों तस्वीरों के बीच कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब अब तक नहीं मिला है. भरत तिवारी अस्थिर, जिद्दी और अपनी नाराजगी, गुस्से व बागीपन को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने में लगातार डूबते नजर आते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या पुलिस ने सिर्फ जरूरी कार्रवाई की या फिर जरूरत से ज्यादा आगे बढ़ गई?
17 जून को भोजपुर में हुई यह मुठभेड़ अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गई है. यह इस बात की परीक्षा बन गई है कि जब कोई हथियारबंद और मानसिक रूप से परेशान व्यक्ति सामने हो, तब सरकार नियंत्रण और हत्या के बीच की पतली रेखा को कैसे संभालता है.
पुलिस का कहना है कि भरत तिवारी हथियारबंद थे, मानसिक रूप से अस्वस्थ थे और उनका व्यवहार असामान्य था. पुलिस के मुताबिक पहले उन्हें शांतिपूर्वक काबू करने की कोशिश की गई और सुरक्षित हिरासत में लेकर मानसिक इलाज की तैयारी भी की जा रही थी. भोजपुर पुलिस का दावा है कि भरत तिवारी बीच-बीच में लगातार फायरिंग करते रहे जिसके बाद आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी. घटनास्थल से एक पिस्तौल, मैगजीन, दो जिंदा कारतूस और दो खाली खोखे बरामद किए गए.
वहीं परिवार की कहानी बिल्कुल अलग है. उनका आरोप है कि भरत आत्मसमर्पण के लिए तैयार हो गए थे, इसके बावजूद उन्हें गोली मार दी गई. परिवार फेसबुक लाइव वीडियो का हवाला देता है, जिसमें वे कहते दिखाई देते हैं कि अगर उनकी शिकायतें सुनी जाएं तो वे हथियार डाल देंगे. वीडियो में वे पिस्तौल फेंकते भी नजर आते हैं. परिवार का कहना है कि गोली चलने के समय वे किसी के लिए तत्काल खतरा नहीं थे.
इन्हीं दो विरोधाभासी दावों के बीच अब पूरा मामला खड़ा है जो आक्रोश से जांच तक पहुंच चुका है. इस मामले में एफआईआर दर्ज हो चुकी है और न्यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं. थाना प्रभारी समेत छह पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया है. शाहाबाद रेंज के डीआईजी की निगरानी में अलग से पुलिस जांच भी शुरू की गई है. मामला पटना हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है जहां याचिकाएं दायर की गई हैं.
यह मामला इसलिए भी अलग नजर आता है क्योंकि भरत तिवारी किसी पेशेवर अपराधी जैसे नहीं दिखते थे. बीएससी ग्रेजुएट तिवारी कभी खुद पुलिस में भर्ती होने का सपना देखते थे. यही तथ्य इस पूरे मामले को आसान निष्कर्षों से दूर ले जाता है.
परिवार और गांव के लोग उन्हें समाजसेवी बताते हैं. उनका कहना है कि भोजपुर में बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास में हो रही देरी को लेकर वे लगातार सवाल उठा रहे थे. उनके मुताबिक, इसी वजह से स्थानीय अधिकारियों से उनका टकराव बढ़ा और शायद उन पर निगरानी भी तेज हुई. यह शिकायत राजनीतिक रूप से प्रेरित थी, भावनात्मक प्रतिक्रिया थी या वास्तव में जनहित से जुड़ी थी, इसका फैसला जांच के बाद ही होगा. लेकिन इससे यह जरूर समझ आता है कि उनके वीडियो में गुस्से के साथ आदर्शवाद का भी मिश्रण क्यों दिखाई देता है.
यहीं सोशल मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. भरत तिवारी के फेसबुक लाइव वीडियो ने स्थानीय पुलिस कार्रवाई को सार्वजनिक तमाशे में बदल दिया. एक वीडियो में उन्होंने खुद को क्रांतिकारी बताया. दूसरे में उन्होंने खुद को पागल कहे जाने का जिक्र करते हुए भगत सिंह से अपनी तुलना की. मौत से ठीक पहले रिकॉर्ड किए गए वीडियो में वे यह कहते नजर आते हैं कि अगर उनकी बात सुनी जाए तो वे आत्मसमर्पण करने को तैयार हैं.
ये वीडियो इसलिए भी अहम हैं क्योंकि वे दिखाते हैं कि हालात कितने अस्थिर हो चुके थे. साथ ही यह भी कि सोशल मीडिया किसी संकट को वास्तविक समय में और ज्यादा जटिल बना सकता है जहां दोनों पक्षों के लिए पीछे हटना मुश्किल हो जाता है.
भरत तिवारी के कदम का महिमामंडन नहीं किया जा सकता. लेकिन सरकार के पास बल प्रयोग का जो विशेष अधिकार होता है, उसके साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं. बल प्रयोग संतुलित, अनुशासित और कानूनी रूप से उचित होना चाहिए. यदि कोई आरोपी आत्मसमर्पण करने को तैयार हो या उसे बिना जान लिए हिरासत में लिया जा सकता हो तो सरकार का कर्तव्य है कि वह पहले उसी रास्ते को अपनाए.
यही वजह है कि घटनाक्रम का सही क्रम बेहद महत्वपूर्ण है. परिवार का कहना है कि 16 जून को पुलिस पहले घर पहुंची, तलाशी ली और लौट गई. बाद में दोबारा आने पर लगातार दबाव और शिकायतें सुनने के आश्वासन के बाद भरत तिवारी बाहर आए. परिवार का आरोप है कि उन्हें खेत में ले जाकर गोली मार दी गई. दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि तिवारी लगातार फायरिंग करते रहे और आत्मरक्षा में जवाब देना पड़ा. दोनों दावों में जमीन-आसमान का फर्क है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट इस मामले में अहम भूमिका निभाएगी.
यह मामला इसलिए भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया है क्योंकि इसमें पुलिसिंग, राजनीति, युवाओं का आक्रोश और सरकार के बल प्रयोग जैसे कई मुद्दे एक साथ जुड़े हैं. राजनीतिक प्रतिक्रियाओं में भी यही असहजता दिखाई देती है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जांच के आदेश दिए हैं. अन्य नेताओं ने भी घटना की आलोचना की है. यहां तक कि सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं ने भी बिना शर्त मुठभेड़ का बचाव करने से परहेज किया. सत्ता पक्ष के भीतर से भी सवाल उठे कि क्या पूरे मामले को पर्याप्त सावधानी से संभाला गया.
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि शायद इस घटना का अंत ऐसा नहीं होना चाहिए था. यदि भरत तिवारी वास्तव में मानसिक तनाव से जूझ रहे थे तो यह मुठभेड़ और भी ज्यादा चिंताजनक बन जाती है. पुलिस का कहना है कि उन्हें सुरक्षित हिरासत में लेकर इलाज की प्रक्रिया शुरू की जा रही थी. अगर यह सही है तो फिर कहीं न कहीं निर्णय लेने की प्रक्रिया में गंभीर चूक हुई. अब सरकार को यह बताना होगा कि नतीजा गिरफ्तारी, नियंत्रण या इलाज की जगह मौत क्यों बना.
इस कहानी में एक आखिरी विडंबना भी है. भरत तिवारी शायद खुद को एक क्रांतिकारी और संघर्ष करने वाले व्यक्ति के रूप में देखे जाने की इच्छा रखते थे. लेकिन आखिरकार वे एक ऐसी याद बन गए जो बताती है कि गुस्सा, शिकायतें और सरकार की ताकत जब एक साथ बेकाबू हो जाएं, तो उनका अंजाम त्रासदी ही होता है. भरत तिवारी का हथियार उठाना गलत था. लेकिन क्या सरकार के पास गोलियों के अलावा कोई बेहतर जवाब नहीं था?