राजस्थान का भैराणा धाम विवाद : संतों की चिंता या जमीनों का बड़ा खेलॽ
दादू पंथ की तपोस्थली माने जाने वाले भैराणा में राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम (रीको) की परियोजना के खिलाफ संत समाज का आंदोलन लगातार तीखा होता जा रहा है

जयपुर ग्रामीण के दूदू इलाके में स्थित भैराणा धाम इन दिनों राजस्थान की सबसे चर्चित सियासी और धार्मिक लड़ाई में बदल चुका है. दादू पंथ की तपोस्थली माने जाने वाले इस क्षेत्र में राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम (रीको) की प्रस्तावित औद्योगिक परियोजना के खिलाफ 39 दिनों से चल रहा साधु-संत, ग्रामीण और स्थानीय संगठनों का आंदोलन अब लगातार तेज होता जा रहा है.
यह आंदोलन अब केवल जमीन अधिग्रहण तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसके केंद्र में राजनीति, आस्था, पर्यावरण और जमीन कारोबार जैसे कई सवाल खड़े हो गए हैं. इस विवाद की जड़ भैराणा धाम की वह 800 बीघा जमीन है, जिसे औद्योगिक विकास के लिए रीको को दिए जाने की प्रक्रिया चल रही है.
संत समाज और स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिस क्षेत्र में फैक्ट्रियां लगाने की तैयारी की जा रही है, वह जमीन दादू पंथ की करीब 500 साल पुरानी तपोस्थली का हिस्सा है. भैराणा धाम के महंत राम प्यारेदास का कहना है, "साधु-संतों ने कई साल की मेहनत से इस धाम को विकसित किया है. फैक्ट्रियां स्थापित करने के लिए हजारों पेड़ों की कटाई होगी और क्षेत्र का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ेगा. यह केवल जमीन का मामला नहीं बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत बचाने की लड़ाई है."
भैराणा धाम बचाओ संघर्ष समिति के नेतृत्व में पिछले कई हफ्तों से धरना और महापड़ाव चल रहा है. आंदोलन में बड़ी संख्या में महिलाएं, ग्रामीण और साधु-संत शामिल हो रहे हैं. रीको हटाओ, भैराणा धाम बचाओ जैसे नारों के बीच यह आंदोलन अब सरकार के लिए भी बड़ा राजनीतिक सिरदर्द बन चुका है. इस पूरे आंदोलन को उस समय और ज्यादा राजनीतिक धार मिल गई जब नागौर सांसद और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के प्रमुख हनुमान बेनीवाल अपने हजारों समर्थकों के साथ खुलकर आंदोलन के समर्थन में उतर आए.
बेनीवाल ने 27 मई को भैराणा धाम में हुई महापंचायत में सरकार को अल्टीमेटम देते हुए जयपुर कूच का ऐलान कर दिया. इसके बाद सरकार हरकत में आई और जयपुर जिला कलेक्टर संदेश नायक और जयपुर रेंज आईजी राहुल प्रकाश को आंदोलनकारियों से बातचीत के लिए भेजा गया. रात एक बजे तक दोनों पक्षों में बातचीत चली और इस बात पर सहमति बनी कि जब तक समस्या का समाधान नहीं होगा यहां काम बंद रहेगा.
हनुमान बेनीवाल आरोप लगाते हुए कहते हैं, "राजस्थान सरकार में उप मुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा समेत कई प्रभावशाली लोगों और उद्योग समूहों के हित साधने के लिए संतों और ग्रामीणों की भावनाओं की अनदेखी की जा रही है. हम सरकार की यह मंशा किसी भी सूरत में पूरी नहीं होने देंगे."
इसी बीच इलाके में जमीन खरीद-फरोख्त को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं. स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहे हैं कि औद्योगिक क्षेत्र की घोषणा से पहले और बाद में यहां कई प्रभावशाली लोगों ने जमीनें खरीद ली. आंदोलनकारी और विपक्षी दल यह मांग कर रहे हैं कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और यह स्पष्ट किया जाए कि कहीं परियोजना के नाम पर कुछ लोगों को मालामाल करने का खेल तो नहीं हुआ.
इस पूरे मसले पर सरकार का पक्ष रखने के लिए गृह राज्यमंत्री जवाहर सिंह बेढ़म आगे आए. बेढ़म ने कहा, "सूबे के विकास के लिए उद्योग और रोजगार बढ़ाने के लिए औद्योगिक परियोजनाएं जरूरी हैं. सरकार संत समाज और आम जनता की भावनाओं का सम्मान करती है और मामले पर गंभीरता से विचार किया जाएगा. लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है लेकिन इस मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए."
आंदोलन के दौरान हनुमान बेनीवाल और अन्य नेताओं की बयानबाजी ने विवाद को और भड़का दिया. हनुमान बेनीवाल ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और उनकी सरकार में शामिल मंत्रियों पर कई तल्ख टिप्पणियां की जिसके बाद BJP भी इसे लेकर आक्रामक हो गई. पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ सहित कई नेताओं ने बेनीवाल की भाषा को अमर्यादित बताते हुए उन पर राजनीति चमकाने का आरोप लगाया.
यही वजह है कि अब भैराणा धाम का आंदोलन धार्मिक और पर्यावरणीय मुद्दे से निकलकर सीधी सियासी लड़ाई में बदलता नजर आने लगा है. कुल मिलाकर भैराणा धाम विवाद अब केवल एक औद्योगिक परियोजना का विरोध नहीं रह गया है. यह मामला आस्था बनाम विकास, पर्यावरण बनाम उद्योग और राजनीति बनाम जन भावनाओं की बहस में बदल चुका है.