बंगाल में 27 लाख वोटरों का नाम कटने से चुनाव नतीजे पर क्या असर पड़ेगा?

जब लाखों वोटरों वाले जिलों में 40 से 80 प्रतिशत तक नाम काट दिए जाएं, तो यह पूरी कवायद सिर्फ प्रशासनिक काम नहीं रह जाती, बल्कि चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन जाती है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में 'अयोग्य' करार दिए गए लोगों का डेटा ऊपर से देखने पर भले ही कोई प्रशासनिक काम लगे, लेकिन ये आंकड़े एक ऐसा पैटर्न दिखाते हैं जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है. जिन करीब 60 लाख लोगों के नामों की जांच की गई, उनमें से 27 लाख से ज्यादा को अयोग्य मान लिया गया है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा हिस्सा है.

लेकिन असली कहानी इस बात में छिपी है कि ये नाम किन जिलों में और कितनी बड़ी संख्या में काटे गए हैं. 6 अप्रैल की देर शाम, कोलकाता में मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय ने इस बात का डेटा जारी किया कि जांच के दायरे में आए 60,06,675 नामों में से कितनों को लिस्ट में रखा गया है और कितने काट दिए गए हैं.

डेटा के मुताबिक, 22,163 नामों पर अभी फैसला होना बाकी है, जबकि कुल 32,68,119 नामों को बरकरार रखा गया है.

नाम कटने वालों की इस लिस्ट में सबसे ऊपर मुर्शिदाबाद है, जहां जांचे गए 11,01,145 मामलों में से 4,55,137 नाम काट दिए गए हैं. इसके बाद उत्तर 24 परगना (5,91,252 में से 3,25,666), मालदा (8,28,127 में से 2,39,375), और दक्षिण 24 परगना (5,22,042 में से 2,22,929) का नंबर आता है. पुरबा बर्धमान में 3,65,539 में से 2,09,805 और नदिया में 2,67,940 में से 2,08,626 नाम काटे गए हैं. उत्तर दिनाजपुर में 1,76,972 नाम और कटे हैं. हावड़ा 1,32,151, हुगली 1,20,813 और कूचबिहार 1,20,725 पर हैं. अकेले इन 10 जिलों में ही राज्य के कुल कटे हुए नामों का दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा है, जो बताता है कि यह पूरी छंटनी कितनी 'कंसंट्रेटेड' (एक ही जगह पर केंद्रित) रही है.

हालांकि, सिर्फ आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते. अगर जांच के दायरे में आए लोगों के अनुपात के हिसाब से देखें, तो कुछ जिलों में नाम कटने की दर असाधारण रूप से ज्यादा है. नदिया इसमें सबसे अलग दिखता है, जहां लगभग 77.8 प्रतिशत मामलों को 'अयोग्य' करार दिया गया है (2,67,940 में से 2,08,626). इसके बाद हुगली में करीब 70.3 प्रतिशत (1,71,778 में से 1,20,813) और कोलकाता उत्तर में लगभग 64 प्रतिशत (61,236 में से 39,164) नाम काटे गए हैं.

पुरबा बर्धमान 57.4 प्रतिशत के करीब है, जबकि दक्षिण 24 परगना और पश्चिम बर्धमान जैसे जिले 40 प्रतिशत की लाइन में हैं. इसके उलट, पुरुलिया और बांकुड़ा जैसे जिलों में (भले ही वहां कुल संख्या कम हो) नाम कटने की दर काफी कम है, जो बताता है कि वहां छंटनी की प्रक्रिया उतनी आक्रामक नहीं थी.

कुछ जिलों में भारी संख्या में नाम कटना और कुछ में बहुत ज्यादा प्रतिशत में छंटनी होना. यह दोहरा पैटर्न बंगाल की 'पॉलिटिकल जियोग्राफी' से पूरी तरह मेल खाता है. मुर्शिदाबाद, मालदा, नदिया और उत्तर 24 परगना सिर्फ भारी आबादी वाले जिले ही नहीं हैं, बल्कि ये तृणमूल कांग्रेस (TMC) और बीजेपी (BJP) के बीच सियासी जंग के सबसे बड़े अखाड़े भी हैं. 2021 के विधानसभा चुनावों में, इन जिलों में TMC के दबदबे ने ही उसकी जीत में सबसे बड़ा रोल निभाया था. यहां वोटरों के समीकरण में कुछ प्रतिशत का बदलाव भी दर्जनों सीटों के चुनावी नतीजे पलट सकता है.

बीजेपी के लिए, ये आंकड़े एक बना-बनाया हथियार हैं. पार्टी लंबे समय से आरोप लगाती रही है कि मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना जैसे सीमावर्ती जिलों की वोटर लिस्ट में अवैध घुसपैठ के कारण बहुत ज्यादा नाम जुड़ गए थे. अकेले मुर्शिदाबाद में 4,55,000 या उत्तर 24 परगना में 3,25,000 से ज्यादा नामों का कटना इस दावे को ताकत देता है कि उसकी चिंताएं बेबुनियाद नहीं थीं. नदिया में लगभग 78 प्रतिशत का भारी 'डिलीशन रेट' इस बात को मजबूत करती है कि ये गड़बड़ियां सिर्फ इक्का-दुक्का नहीं थीं, बल्कि कुछ खास इलाकों में 'सिस्टेमिक' थीं. राजनीतिक तौर पर, यह एक सुधार का नैरेटिव सेट करता है, जिसे बीजेपी इस चुनाव प्रचार में बहुत आक्रामकता के साथ भुनाना चाहेगी.

TMC के लिए इसके मायने कहीं ज्यादा उलझे हुए हैं. इनमें से कई जिले उसके चुनावी गढ़ हैं जहां ऐतिहासिक रूप से उसकी जीत का बड़ा मार्जिन एक बड़े और एकजुट वोटर बेस पर टिका रहा है. नदिया में 2,00,000 से ज्यादा या मुर्शिदाबाद में 4,00,000 से ज्यादा नामों का कम होना यह चिंता पैदा करता है कि कहीं उसके सपोर्ट बेस का एक बड़ा हिस्सा तो इसका शिकार नहीं हो गया. भले ही दावों और आपत्तियों के जरिए इनमें से कुछ नाम वापस जुड़ जाएं, लेकिन फिलहाल इतने बड़े पैमाने पर नामों का कटना एक भारी अनिश्चितता पैदा कर रहा है.

उसी समय, TMC की संगठनात्मक ताकत को भी कम करके नहीं आंका जा सकता. अपने मजबूत बूथ-लेवल नेटवर्क के दम पर, पार्टी प्रभावित वोटरों की पहचान करने और उनके नाम वापस जुड़वाने का दबाव बनाने की ताकत रखती है. यहां 'अस्थायी रूप से' नाम कटने और 'पूरी तरह से' नाम कटने के बीच का फर्क बहुत अहम होगा. अगर काटे गए नामों में से 10-15 प्रतिशत भी वापस नहीं जुड़े, तो कांटे की टक्कर वाली सीटों पर इसका चुनावी असर बहुत बड़ा हो सकता है.

कुल मिलाकर, इन आंकड़ों का राजनीतिक वजन इसी बात में है कि ये एक ही जगह पर कितने ज्यादा केंद्रित हैं. जब लाखों वोटरों वाले जिलों में 40 से 80 प्रतिशत तक नाम कटने लगें, तो यह प्रक्रिया सिर्फ कोई प्रशासनिक काम नहीं रह जाती. यह चुनावी मैदान का एक सबसे बड़ा मुद्दा बन जाती है.

जैसे-जैसे बंगाल 2026 के विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ रहा है, यह लड़ाई सिर्फ रैलियों और चुनाव प्रचार के जरिए ही नहीं लड़ी जाएगी, बल्कि वोटर लिस्ट में कौन बना रहता है, यह तय करने की उस खामोश लेकिन कहीं ज्यादा असरदार प्रक्रिया के जरिए भी लड़ी जाएगी.

एक दिलचस्प बात. 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के चुनाव के लिए वोटर लिस्ट 6 अप्रैल को ही फ्रीज कर दी गई थी. 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण की लिस्ट 9 अप्रैल को फ्रीज की गई है. जिन लोगों के नाम कटे हैं और जो इसे चुनौती देना चाहते हैं, उनके लिए बनी 'अपीलीय ट्रिब्यूनल' ने अभी तक ठीक से काम करना शुरू ही नहीं किया है.

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