भगवान के आगे सब बराबर : बांके बिहारी मंदिर में VIP कल्चर होगा खत्म!
सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने बांके बिहारी मंदिर में सुरक्षा, समानता और भीड़ नियंत्रण को बताया जरूरी, परंपराओं में दखल के आरोप खारिज, अगली सुनवाई 18 मई को होगी

मथुरा ज़िले के वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर में दर्शन व्यवस्था को लेकर लंबे समय से चल रही बहस अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है. सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गठित हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) ने अपने हालिया स्टेटस रिपोर्ट में मंदिर प्रबंधन में किए गए बड़े बदलावों का न सिर्फ बचाव किया है, बल्कि उन्हें मौजूदा हालात में अनिवार्य और न्यायसंगत कदम बताया है.
कमेटी का साफ कहना है कि VIP दर्शन जैसी व्यवस्था को खत्म करना, दर्शन के समय में बदलाव करना और भीड़ प्रबंधन के नए उपाय लागू करना, इन सबका मकसद मंदिर में आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए समान, सुरक्षित और व्यवस्थित दर्शन सुनिश्चित करना है. कमेटी की रिपोर्ट का सबसे अहम बिंदु VIP दर्शन स्लिप को पूरी तरह खत्म करना है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह फैसला सर्वसम्मति से लिया गया और इसके पीछे मूल सोच यह थी कि भगवान के दरबार में किसी तरह का विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए. VIP सिस्टम के तहत कुछ लोगों को लंबी कतारों से बचाकर सीधे दर्शन की सुविधा दी जाती थी, जिसे कमेटी ने समानता के सिद्धांत के खिलाफ बताया. रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि यह व्यवस्था न केवल आम श्रद्धालुओं के साथ भेदभाव करती थी, बल्कि इससे भीड़ प्रबंधन भी और जटिल हो जाता था. ऐसे में इसे खत्म करना दर्शन प्रक्रिया की पवित्रता और निष्पक्षता को बहाल करने की दिशा में एक जरूरी कदम माना गया.
यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच के सामने आया, तो कमेटी की यह विस्तृत रिपोर्ट रिकॉर्ड में ली गई. कमेटी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शरण देव सिंह ठाकुर ने अदालत को बताया कि ये सभी फैसले सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए अधिकार क्षेत्र के भीतर ही लिए गए हैं और इनका उद्देश्य केवल प्रशासनिक सुधार और सुरक्षा सुनिश्चित करना है. अदालत ने फिलहाल इस रिपोर्ट पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है और मामले की अगली सुनवाई 18 मई को तय की गई है.
दर्शन समय में भी बदलाव
VIP संस्कृति खत्म करने के साथ-साथ कमेटी ने मंदिर के दर्शन समय में भी बड़े बदलाव किए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, मंदिर के खुलने का समय पहले कर दिया गया है और गर्मियों व सर्दियों दोनों मौसमों में आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन की अवधि बढ़ा दी गई है. कमेटी का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में श्रद्धालुओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जिसके चलते पुराना टाइम-टेबल पूरी तरह नाकाफी हो गया था.
इससे मंदिर परिसर में भारी भीड़ जमा हो जाती थी, जिससे न सिर्फ श्रद्धालुओं को असुविधा होती थी बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी गंभीर खतरे पैदा हो जाते थे. कमेटी के अध्यक्ष, इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अशोक कुमार की अगुवाई में तैयार इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दर्शन के समय को बढ़ाकर और धार्मिक अनुष्ठानों के कार्यक्रम को व्यवस्थित कर, भीड़ को पूरे दिन में संतुलित तरीके से बांटने की कोशिश की गई है. इसका मकसद यह है कि किसी एक समय पर भारी भीड़ न जमा हो और श्रद्धालुओं को अपेक्षाकृत सहज और सुरक्षित तरीके से दर्शन मिल सकें. साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया है कि मंदिर की परंपरागत धार्मिक गतिविधियां बिना किसी व्यवधान के चलती रहें.
सुरक्षा पर ज्यादा जोर
कमेटी को सबसे ज्यादा आलोचना इस बात को लेकर झेलनी पड़ी कि उसके फैसले मंदिर की सदियों पुरानी परंपराओं में दखल देते हैं. इस पर रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि कमेटी ने खुद को केवल प्रशासनिक और धर्मनिरपेक्ष पहलुओं तक सीमित रखा है. धार्मिक रस्मों, पूजा-पद्धति या परंपराओं में किसी तरह की कोई दखलंदाजी नहीं की गई है. रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि कमेटी के सभी फैसले गोस्वामी समाज के प्रतिनिधियों की भागीदारी और जहां तक संभव हो, उनकी सहमति से ही लिए गए हैं.
सुरक्षा के मुद्दे पर कमेटी का रुख और भी स्पष्ट है. रिपोर्ट में 2022 में मंदिर परिसर में हुई भगदड़ की घटना का जिक्र करते हुए कहा गया है कि उस हादसे ने मौजूदा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया था. इसी के बाद भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कई अहम कदम उठाए गए. इनमे प्रवेश और निकास के लिए अलग-अलग मार्ग निर्धारित करना, दर्शन की लाइव स्ट्रीमिंग शुरू करने की पहल और मंदिर परिसर का संरचनात्मक मूल्यांकन शामिल है. कमेटी का मानना है कि इन उपायों से भविष्य में किसी भी अप्रिय घटना की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए कमेटी ने मंदिर के आसपास जमीन अधिग्रहण की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं. इसके लिए एक विशेष सब-कमेटी बनाई गई है, जिसमें सरकारी अधिकारियों के साथ-साथ गोस्वामी समुदाय के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, इस सब-कमेटी ने जमीन खरीद के मामले में शुरुआती स्तर पर ठोस प्रगति भी की है. इसका उद्देश्य लंबे समय में मंदिर परिसर और उसके आसपास के क्षेत्र का समग्र विकास करना है, ताकि बढ़ती भीड़ को बेहतर तरीके से संभाला जा सके.
'देहरी पूजा' बंद नहीं
सबसे विवादित मुद्दों में से एक ‘देहरी पूजा’ को लेकर भी कमेटी ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है. याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इस पारंपरिक रस्म को खत्म कर दिया गया है, लेकिन कमेटी ने इसे सिरे से खारिज किया. रिपोर्ट में कहा गया है कि देहरी पूजा को बंद नहीं किया गया है, बल्कि इसे मंदिर के अंदर एक वैकल्पिक स्थान पर स्थानांतरित किया गया है. ऐसा इसलिए किया गया ताकि मुख्य मार्ग पर होने वाली भीड़ और अव्यवस्था को रोका जा सके. पहले इस रस्म के दौरान श्रद्धालु एक झलक पाने के लिए बैरिकेड्स पर चढ़ जाते थे और कई बार बच्चों को भी ऊपर उठा लेते थे, जिससे गंभीर दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता था.
कमेटी ने यह भी स्पष्ट किया कि पवित्र स्थल के सामने बने चबूतरे तक पहुंच को सीमित करना भी सुरक्षा के लिहाज से उठाया गया कदम था. इसका उद्देश्य किसी भी धार्मिक परंपरा को खत्म करना नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना था. रिपोर्ट में बार-बार इस बात पर जोर दिया गया है कि हर फैसला श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही लिया गया है.
पुरानी व्यवस्था नहीं होगी बहाल
गोस्वामी प्रतिनिधियों के चयन को लेकर उठे सवालों पर भी कमेटी ने विस्तृत जवाब दिया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि इस प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी रखा गया. इसके लिए सार्वजनिक नोटिस जारी किया गया, आवेदन आमंत्रित किए गए और सभी उम्मीदवारों को अपनी बात रखने का अवसर दिया गया. कमेटी ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं जिस पुरानी बैठक का हवाला दे रहे हैं, उसका कोई कानूनी आधार नहीं है, क्योंकि वह बैठक सुप्रीम कोर्ट की कमेटी के गठन से पहले हुई थी.
वित्तीय पहलुओं पर भी कमेटी ने स्थिति स्पष्ट की है. रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है कि फिलहाल कुछ अंतरिम खर्च, जैसे मानदेय और संचालन से जुड़े खर्च, मंदिर के कोष से पूरे किए जा रहे हैं. हालांकि, राज्य सरकार से अनुरोध किया गया है कि वह इस वित्तीय जिम्मेदारी को अपने ऊपर ले. कमेटी ने यह भी स्पष्ट किया कि इसमें शामिल सरकारी अधिकारी अपनी नियमित तनख्वाह राज्य सरकार से ही लेते हैं और मंदिर के कोष पर अतिरिक्त बोझ नहीं डालते.
आखिरकार कमेटी ने याचिकाकर्ताओं की उस मांग का भी विरोध किया है, जिसमें उन्होंने पुरानी व्यवस्था बहाल करने या 1939 की प्रबंधन योजना के तहत चुनाव कराने की बात कही थी. कमेटी का कहना है कि ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के 8 अगस्त 2025 के आदेश को निष्प्रभावी करने जैसा होगा, जिसके तहत वर्तमान व्यवस्था लागू की गई है.
अब नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर है, जहां यह तय होगा कि इन सुधारों को अंतिम मंजूरी मिलती है या नहीं. लेकिन इतना साफ है कि वृंदावन के इस ऐतिहासिक मंदिर में दर्शन की परंपरा अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां आस्था के साथ-साथ व्यवस्था और समानता को भी उतनी ही अहमियत दी जा रही है.