असम में हेमंत का चुनाव अभियान : महज इवेंट या कुछ हासिल भी?
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) इस बार असम की 16 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रहा है. टी ट्राइब की बहुलता वाली इन सीटों पर परंपरागत रूप से कांग्रेस मजबूत रही है

बीते 7 अप्रैल को असम विधानसभा चुनाव का अभियान समाप्त हो चुका है. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अभियान समाप्त कर रांची लौट आए हैं. इससे पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन पत्नी कल्पना सोरेन सहित सभी बड़े नेताओं को लेकर असम पहुंचे थे. पार्टी ने कुल 21 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी उतारने की घोषणा की थी.
इसके बाद 19 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और फिर स्क्रूटनी के बाद 16 विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्याशी मैदान में हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि जिन 16 सीटों पर JMM चुनाव लड़ रही है, उनमें एक भी एसटी आरक्षित सीट नहीं है. सभी केवल टी-ट्राइब बहुल इलाकों की सीटें हैं. इनमें से पार्टी ने मात्र एक महिला उम्मीदवार को टिकट दिया है.
इससे पहले बीते फरवरी में JMM ने बिहार चुनाव में इंडिया गठबंधन की ओर से कोई सीट न मिलने के बाद पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा चुनाव लड़ने की योजना बनाई थी. लेकिन पार्टी ने बंगाल के बजाय अपना पूरा ध्यान असम में लगाया. हेमंत सोरेन ने पहली बार 1 फरवरी को वहां एक जनसभा को संबोधित किया. फिर चुनाव की तारीखें घोषित होने के बाद 28 मार्च से 7 अप्रैल तक वह वहीं जमे रहे. साथ में पत्नी कल्पना सोरेन के अलावा JMM कोटे के दो मंत्रियों सहित पूरे 20 नेताओं की टीम वहां लगातार कैंप करती रही.
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, हेमंत और कल्पना ने हर दिन लगभग तीन जनसभाओं को संबोधित किया. अधिकतर जगहों पर खुद पहुंचकर तो कहीं-कहीं फोन से भी चुनावी सभा को संबोधित किया गया, क्योंकि उन्हें कुछ जगहों पर जाने के लिए हवाई उड़ान की अनुमति नहीं दी गई. अन्य नेताओं ने छोटी-छोटी सभाएं कीं.
दरअसल, हेमंत सोरेन ने अपने पूरे कैंपेन को केवल और केवल टी-ट्राइब के बीच केंद्रित रखा. इसकी वजहें भी हैं. असम टी प्लांटेशन प्रोविडेंट फंड और पेंशन फंड योजना के 2017 के आंकड़ों के अनुसार, 9,84,455 चाय बागान मजदूर इसके सदस्य थे. राजनीतिक दल नियमित रूप से इस समुदाय के लोगों को टिकट देते हैं और पिछले दशकों में इनमें से कई राज्य और केंद्र सरकार में मंत्री भी बने हैं. लेकिन इस समुदाय के अधिकांश लोगों की स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं हुआ है. स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता के स्तर अभी भी खराब हैं, जिससे वे बड़ी संख्या में होने के बावजूद सबसे हाशिए पर रहने वाले वर्गों में शामिल हैं.
यह समुदाय पारंपरिक रूप से कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में BJP ने इसमें पैठ बनाई है. साल 2016 में पहली बार असम में सत्ता में आने के बाद, BJP सरकार ने चाय-जनजाति समुदाय के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं. इनमें भूमि अधिकार, शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण, चाय बागानों में स्कूल स्थापित करना, मोबाइल फोन, साइकिल, मेधावी छात्रों को आर्थिक सहायता और युवाओं को छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए फंड देना शामिल है. लेकिन समुदाय की दो प्रमुख मांगें- अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा और चाय बागानों में काम करने वालों के लिए न्यूनतम दैनिक मजदूरी में सुधार, अब तक पूरी नहीं हो सकी हैं, जबकि BJP ने इन्हें पूरा करने के वादे किए थे. हालांकि ये सभी वादे इस बार भी किए गए हैं.
JMM उम्मीदवार क्या कहते हैं
क्या JMM एक भी सीट जीतने की स्थिति में दिखाई दे रही है? क्या 10 लाख से अधिक लोग, जो असम के 825 चाय बगानों में सन 1841 से काम कर रहे हैं और जिनमें से अधिकतर झारखंड के छोटानागपुर इलाकों से आते हैं, वे हेमंत सोरेन में अपनी उम्मीद देख रहे हैं? हेमंत सोरेन ने बिश्वनाथ विधानसभा क्षेत्र से अपने कैंपेन की शुरुआत की थी. तेहारू गौड़ यहां से पार्टी के उम्मीदवार हैं. वे कहते हैं, “मुझे पूरा विश्वास है, JMM तीसरी बड़ी पार्टी बनने जा रही है.” चुनाव प्रचार खत्म करने के बाद समर्थकों से घिरे होने की वजह से उन्होंने इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा.
खुमताई से अमित नाग प्रत्याशी हैं. वे कहते हैं, “कोई सीट निकले न निकले, मैं यह सीट निकाल कर हेमंत सोरेन को गिफ्ट करने जा रहा हूं. जहां तक बात अन्य 15 सीटों की है, तो मुझे लगता है 4 से 5 सीटें हम निकाल रहे हैं. BJP और कांग्रेस दोनों ने एसटी दर्जा, जमीन का पट्टा और 500 रुपए दिहाड़ी का वादा किया, लेकिन किसी ने पूरा नहीं किया. हेमंत सोरेन ने तो हर महीने 5000 रुपए देने का वादा किया है.”
दावों के इतर तांती समुदाय से आने वाले अमित पार्टी की आंतरिक गुटबाजी से नाराज भी हैं. वे कहते हैं, “मेरी सीट पर पार्टी ने बहुत कम फंड दिया है. झारखंड से आए नेताओं ने सही से आकलन नहीं किया. खासकर पंकज मिश्रा ने मेरे बारे में गलत सूचनाएं फैलाई हैं.” बता दें कि पंकज मिश्रा हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि और पार्टी के प्रवक्ता भी हैं.
वहीं चाबुआ सीट से भूपेन मुरारी उम्मीदवार हैं. यहां हेमंत सोरेन की सभा थी, लेकिन अनुमति नहीं मिलने पर वे शामिल नहीं हो सके. यहां कल्पना सोरेन ने चुनावी रैली की. मुरारी कहते हैं, “हम 16 में से कम से कम 10 सीटों पर जीत की उम्मीद कर रहे हैं. प्रतिद्वंद्वी भले ही हमारी उपेक्षा कर रहे हों लेकिन परिणाम के दिन हम चौंकाने जा रहे हैं. टी-ट्राइब इस बार BJP-कांग्रेस के इतर तीसरे विकल्प पर भरोसा करने जा रही है.”
तीनों प्रत्याशियों की बातों पर गौर करें तो एक बात साफ नजर आ रही है कि बिना संगठन और कैडर बनाए चुनाव लड़ने का असर दिख रहा है. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और ‘टी-ट्राइब्स एंड देयर वोटिंग ट्रेंड्स’ पुस्तक के लेखक अबू नसर सईद अहमद दोनों उम्मीदवारों से अलग राय रखते हैं. वे कहते हैं, “यह बात सही है कि टी-ट्राइब पहले कांग्रेस को वोट करती रही और बीते दो चुनावों में एक बड़ी आबादी BJP की तरफ शिफ्ट हुई. लेकिन इस बार छोटे-छोटे संगठन JMM सहित असम गण परिषद जैसे अन्य दलों के साथ भी जाते हुए दिख रहे हैं. अगर ये एकमुश्त हेमंत के साथ जाते तो कुछ अंदाजा लगाया जा सकता था.”
वे आगे कहते हैं, “अगर कोई हेमंत सोरेन की चुनावी सभा की भीड़ को देखकर कुछ अंदाजा लगा रहा है, तो मोदी और अमित शाह की सभाओं में उससे कहीं अधिक भीड़ हुई है. खुद असम के मुख्यमंत्री ने टी-ट्राइब के बीच से अपनी नजरें नहीं हटाई हैं. हालांकि मुझे JMM के एक भी सीट मिलने की संभावना कम दिख रही है. अभी यह अंदाजा लगाना भी मुश्किल है कि उन्हें मिले वोट से किसको फायदा और किसको नुकसान होगा.”
बाकी यह राय ज्यादातर लोगों की है कि JMM ने राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए असम में चुनाव लड़ने का फैसला किया था. हालांकि इससे आगे उसे क्या हासिल हो पाता है, यह नतीजों के बाद ही समझ आएगा.