उत्तर प्रदेश : बगावती तेवर क्यों दिखा रही हैं भाजपा की पुरानी सहयोगी अनुप्रिया पटेल?
अपना दल (एस) की अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने भी जातीय जनगणना के अलावा आउटसोर्सिंग से होने वाली भर्तियों में आरक्षण की मांग उठाकर सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है

अपना दल (एस) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल के रवैये ने एक बार फिर सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है. अनुप्रिया ने 4 अगस्त को लखनऊ में लोकभवन के बगल में मौजूद सहकारिता भवन में अपनी पार्टी की मासिक बैठक के दौरान जातीय जनगणना की मांग की. अनुप्रिया पटेल का यह रुख कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव समेत विपक्ष दलों से मेल खा रहा है.
अपना दल (एस) उत्तर प्रदेश में भाजपा की पुरानी सहयोगी पार्टी है और जाति जनगणना की मांग को दोहराना एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि भाजपा अब तक इस पर कोई प्रतिबद्धता नहीं जता रही. पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक के दौरान अनुप्रिया ने कहा कि केंद्र को जाति जनगणना करानी चाहिए, ताकि उन लोगों को लाभ मिल सके, जिनके लिए यह तय है.
अपना दल की प्रमुख का कहना है, "जाति भारत में सामाजिक संरचना का आधार है. विभिन्न जातियों की प्रामाणिक संख्या होना बहुत जरूरी है, ताकि विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं में उनकी हिस्सेदारी उसी के अनुसार तय की जा सके." बाद में मीडियाकर्मियों से बात करते हुए अनुप्रिया पटेल ने निजी क्षेत्र में चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में आरक्षण लागू करने की अपनी मांग भी दोहराई.
उन्होंने आउटसोर्सिंग की व्यवस्था को कैंसर से तुलना करते हुए कहा, "निजी क्षेत्र में आउटसोर्सिंग के माध्यम से चतुर्थ श्रेणी के पदों पर की जाने वाली नियुक्तियों में आरक्षण का पालन नहीं किया जाता. इससे समाज के वंचित वर्ग से आने वाले उम्मीदवारों के हितों को नुकसान पहुंचता है."
अनुप्रिया पटेल अपने उठाए मुद्दों में मुख्य तौर पर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को ही निशाने पर ले रही हैं. यह बात 2 जुलाई को अपना दल के संस्थापक सोने लाल पटेल की 75वीं जयंती के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में स्पष्ट हो गई. लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में अपने पिता सोने लाल पटेल की याद में आयोजित जन स्वाभिमान दिवस कार्यक्रम में अनुप्रिया पटेल ने कहा कि सरकार 69 हजार शिक्षक भर्ती में आरक्षण की गड़बड़ी अभी तक ठीक नहीं करा पाई हैं, जबकि वे राज्य सरकार के सामने यह मामला कई बार उठा चुकी हैं.
दरअसल 69 हजार शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थी 19 हजार सीटों पर आरक्षण में घोटाले का आरोप लगा रहे हैं. अनुप्रिया इन पिछड़े वर्ग के अभ्यर्थियों का समर्थन कर रही हैं. हालांकि इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित कार्यक्रम में अनुप्रिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफों के पुल बांधने वाली अपनी लाइन भी स्पष्ट कर दी. अनुप्रिया ने कहा, “मोदी ने पिछड़ों के हक में तमाम कार्य किए हैं. पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया, विश्वविद्यालय में आरक्षण के 13 प्वाइंटर रोस्टर को लागू किया, केंद्रीय स्कूलों व नीट में ओबीसी श्रेणी के विद्यार्थियों को आरक्षण दिलाया.”
इससे पहले लोकसभा चुनाव के बाद अनुप्रिया पटेल द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखे पत्र के पीछे, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि सरकारी भर्ती प्रक्रिया के दौरान अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षित सीटें “अनारक्षित” हो जाती हैं, दलित और ओबीसी वोटों के विपक्ष की ओर ‘शिफ्ट’ होने पर चिंता दिखी थी. केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री पटेल ने यूपी सीएम को लिखे अपने पत्र में लिखा था, "पिछड़े और एससी/एसटी समूहों से आने वाले उम्मीदवार नियमित रूप से नीचे हस्ताक्षरकर्ता को सूचित कर रहे हैं कि राज्य सरकार द्वारा केवल साक्षात्कार-आधारित नियुक्ति प्रक्रिया के आधार पर आयोजित की जा रही विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में इन समूहों से संबंधित उम्मीदवारों को 'उपयुक्त नहीं पाया गया' घोषित किया जाता है और इन समूहों से किसी भी उम्मीदवार का चयन नहीं किया जाता है."
उन्होंने आगे लिखा कि इस प्रक्रिया को कई बार अपनाने के बाद पिछड़ों और एससी/एसटी के लिए आरक्षित सीटों को अंततः अनारक्षित घोषित कर दिया जाता है. हालांकि पटेल को योगी सरकार से कड़ा जवाब मिला. अपर मुख्य सचिव (नियुक्ति) देवेश चतुर्वेदी ने उन्हें जवाब देते हुए लिखा कि यूपी लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) एक कोड-आधारित साक्षात्कार प्रक्रिया आयोजित करता है जिसमें उम्मीदवार का नाम, आरक्षण श्रेणी, आयु आदि छिपाए जाते हैं, इसकी साक्षात्कार समिति किसी भी उम्मीदवार के लिए "उपयुक्त नहीं" का उल्लेख नहीं करती, बल्कि एक ग्रेड का उल्लेख करती है जिसे बाद में अंकों में बदल दिया जाता है. यदि किसी श्रेणी के उम्मीदवार आवश्यक न्यूनतम अंक प्राप्त करने में असमर्थ हैं या अनुपलब्ध हैं, तो आयोग को इन सीटों को अनारक्षित में बदलने का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन मानदंडों के अनुसार ऐसी रिक्तियों को आगे बढ़ाया जाता है.
राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि अनुप्रिया पटेल द्वारा मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र के दो-आयामी उद्देश्य थे, पहला, उन समुदायों को लुभाने की कोशिश करना जो उनकी पार्टी से दूर चले गए हैं, और दूसरा, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में योगी के विरोधियों के बीच कुछ बढ़त हासिल करना.
लोकसभा चुनाव नतीजों ने ओबीसी के प्रमुख घटक कुर्मियों में निष्ठा बदलने का संकेत दिया है, जो पूर्वी और मध्य यूपी में अपना दल के समर्थन का आधार हैं. लोकसभा चुनाव में केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया ने मिर्जापुर में अपनी जीत का अंतर 2.3 लाख से 37,810 पर गिरते देखा. पार्टी ने लोकसभा चुनाव में जिन दो सीटों पर चुनाव लड़ा था - मिर्जापुर और रॉबर्ट्सगंज - उसमें से एक पर उसे हार का सामना करना पड़ा.
सोने लाल पटेल की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में अपने भाषण में, अनुप्रिया पटेल ने “सामाजिक न्याय की मौसमी पार्टियों” पर भी निशाना साधा, जो कि समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस पर एक अप्रत्यक्ष कटाक्ष था, जिनके गठबंधन ने लोकसभा चुनावों में पिछड़ों और दलितों से काफी समर्थन हासिल किया. लोकसभा में यूपी से 34 ओबीसी सांसदों में से 21 विपक्षी खेमे से हैं - उनमें से 16 गैर-यादव हैं – इससे पता चलता है कि कैसे उन्होंने एनडीए के वोट बैंक के एक महत्वपूर्ण हिस्से को अपने पाले में कर लिया है. इसी कार्यक्रम में, पटेल ने संविधान को हाथ में थामकर अपने समर्थकों को चेतावनी दी कि वे उन लोगों से सावधान रहें जो सत्ता से बाहर होने पर ही सामाजिक न्याय की बात करते हैं. जाहिर है अनुप्रिया पटेल विपक्षी खेमे में गए अपनी पार्टी के वोटबैंक को लाने की कोशिश में हैं.
अनुप्रिया पटेल को सबसे ज्यादा खतरा समाजवादी पार्टी (सपा) से महसूस हो रहा है. जून के अंतिम हफ्ते में सपा सांसद और पार्टी के कुर्मी चेहरा लालजी वर्मा ने लखनऊ के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) की भर्ती में ओबीसी अभ्यर्थियों के साथ भेदभाव का आरोप लगाया था. एसजीपीजीआई में जिस डॉ. सर्वेश कुमार चौधरी का मुद्दा उन्होंने उठाया है, वे लालजी वर्मा के रिश्तेदार हैं. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सोशल मीडिया पर वर्मा द्वारा उठाए गया यह मुद्दा गरम हुआ तो इससे अनुप्रिया पर भी दबाव बढ़ गया. माना जा रहा है कि उनको यह लगा कि कहीं इस मुद्दे के जरिए लालजी वर्मा कुर्मी बिरादरी में उनके लिए मुश्किल न खड़ी कर दें.
लोकसभा चुनाव में कुर्मी मतदाताओं ने भाजपा और उसके सहयोगियों के साथ वैसा जुड़ाव नहीं दिखाया जैसा 2014 और 2019 में दिखाया था. यूपी से जीते कुल 11 कुर्मी सांसदों में से सात इंडिया गठबंधन से हैं, जिनमें अपना दल (एस) के गढ़ प्रतापगढ़ में एस. पी. सिंह पटेल, बांदा में कृष्णा पटेल और फतेहपुर में नरेश उत्तम पटेल शामिल हैं. नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में दो विधानसभा क्षेत्रों - रोहनिया, जहां अनुप्रिया पहली बार 2012 में विधायक बनीं, और सेवापुरी में कुर्मी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं - लेकिन प्रधानमंत्री ने भी इस बार अपनी जीत का अंतर कम होते देखा.
लखनऊ में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय बताते हैं, “लोकसभा चुनाव में जिस तरह से ओबीसी मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा इंडिया गठबंधन के साथ गया उसने अपना दल (एस) के सामने बड़ी चुनौती पैदा कर दी है. अनुप्रिया पटेल अपने परंपरागत कुर्मी वोट के छिटकने से भी काफी दबाव में हैं. यही वजह है कि यूपी की सरकारी भर्तियों में आरक्षण का मुद्दा उठाकर अनुप्रिया पटेल यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि उनकी पार्टी ही पिछड़ों की असली हितैषी है.”
हालांकि अपना दल (एस) के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि जो लोग यह कह रहे हैं कि अपना दल का वोट बैंक खिसक रहा है, उन्हें स्वाभिमान दिवस के लिए लखनऊ में उमड़ी समर्थकों की भीड़ देखनी चाहिए थी. उन्होंने कहा, "यह इस बात का सबूत है कि लोग हमसे जुड़ रहे हैं और कोई कहीं नहीं जा रहा. यह भीड़ कोई जबरदस्ती इकट्ठी की गई भीड़ नहीं थी. आरक्षण के मुद्दे को मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाया जाना चाहिए था, इसलिए इसे उठाया गया है. "
आरक्षण के मुद्दे पर जिस तरह अनुप्रिया पटेल योगी सरकार पर हमलावर हैं उसे दबाव की राजनीति माना जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि जिस तरह सिराथू से विधायक और अनुप्रिया पटेल की बहन पल्लवी पटेल को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तवज्जो दे रहे हैं, उससे भी केंद्रीय मंत्री काफी खफा हैं. इसके अलावा लोकसभा चुनाव में जीतने वाले दो मंत्रियों के स्थान पर प्रदेश मंत्रिमंडल में होने वाले विस्तार और एमएलसी के रिक्त पदों पर चुनाव को देखते हुए ही अनुप्रिया ने आरक्षण का मुद्दा उठाना शुरू किया है जिससे प्रदेश सरकार पर दबाव बनाया जा सके. वे पहले से ही प्रदेश सरकार में अपने कोटे से एक और मंत्री बनाने का मुद्दा उठाती रही हैं. अब देखना है कि अनुप्रिया पटेल का रुख अपना दल (एस) को कितना फायदा पहुंचाता है.