अल्फांसो का अकाल : कैसे खत्म हो रहा कोंकण की खुशहाली का दौर

जलवायु परिवर्तन और दशकों से चली आ रही गलत कृषि पद्धतियों के कारण आम उत्पादक और कोंकण की अर्थव्यवस्था एक बड़े संकट का सामना कर रही है

अल्फांसो आम के प्राकृतिक चक्र में गड़बड़ी आ गई है

गर्मी का मौसम आते ही आम प्रेमी अल्फांसो के मलाईदार गूदे का स्वाद चखने का बेसब्री से इंतजार करते हैं. लेकिन, महाराष्ट्र का कोंकण तट, जहां यह प्रसिद्ध आम उगाया जाता है, इस समय अभूतपूर्व संकट से जूझ रहा है.

सालों से इसकी फसल ले रहे किसान कहते हैं कि यह उनके जीवनकाल का सबसे भीषण संकट है और इसका प्रभाव भूकंप के समान भयावह है. कोंकण के लोगों के लिए आम सिर्फ एक स्वादिष्ट फल नहीं है, बल्कि उनके जीवन में बदलाव लाने का एक अहम साधन भी रहा है.

आम की खेती ने न सिर्फ यहां से पलायन रोका है, बल्कि नेपाल समेत अन्य जगहों से आने वाले लोगों के लिए कमाई का पसंदीदा ठिकाना भी बना दिया है. रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग जिलों के आम के बगीचों में नेपाल से आए करीब 12,000 से 14,000 मजदूर और चौकीदार काम करते हैं.

कई दशकों तक कोंकण को 'मनी-ऑर्डर इकोनॉमी' के नाम से जाना जाता था, यहां के पुरुष मुंबई और आसपास के इलाकों में मजदूरी के काम करते थे और घर पर पैसे भेजकर परिवार का गुजारा चलाते थे. 1990 के दशक से स्थिति बदलनी शुरू हुई, और इसका श्रेय अल्फांसो आम की खेती को जाता है. अल्फांसो आम के स्वाद की वजह से इसे भारत के साथ-साथ विदेशों में भी अच्छा बाजार मिल गया.

अल्फांसो आम की खेती के साथ-साथ मछली पालन, पर्यटन और काजू की खेती में हुई बढ़ोतरी ने पूरे क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बदल दिया. लेकिन, अब जलवायु परिवर्तन, मौसम की अनियमितताओं और कई वर्षों से चली आ रही गलत कृषि प्रथाओं के कारण आम के किसानों को संकट का सामना करना पड़ रहा है. कुछ किसानों की कहानी के जरिए पूरे मामले को समझिए :

किसान: इंद्रनील ठाकुर
स्थान: जमसंदे, देवगढ़ तालुका, सिंधुदुर्ग

फसल के नुकसान की कहानी: ठाकुर के 550 आम के पेड़ों से औसतन 3,000 से 4,000 बक्से आम टूटते हैं, लेकिन उनका कहना है कि इस बार 200 बक्से आम भी मिल जाएं तो वे खुद को किस्मत वाला मानेंगे. ठाकुर शिकायत करते हैं कि आम के प्राकृतिक चक्र में गड़बड़ी आ गई है. वैसे तो 14 डिग्री सेल्सियस से 18 डिग्री सेल्सियस के बीच का तापमान फूल आने के लिए अनुकूल होता है. इसके अलावा, 18 डिग्री सेल्सियस से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच का तापमान फल लगने के लिए जरूरी होता है. लेकिन, इस बार पारा 29 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया, जिससे फूल मुरझा गए. न्यूनतम तापमान में गिरावट के कारण परागण करने वाले कीट ज्यादा नहीं लगे, जिससे फल आने पर असर पड़ा.

किसान: जयवंत लाड
स्थान: देवगढ़ तालुका, सिंधुदुर्ग
फसल के नुकसान की कहानी:
लाड के पास लगभग 400 आम के पेड़ हैं, लेकिन इस साल वे सिर्फ 150 बक्से आम ही तोड़ पाएंगे, जो पिछले साल के 1,000 बक्सों से काफी कम है. उन्होंने बताया कि फसल की पहली बहार खराब हो गई है. किसानों के लिए यह दोहरी मार है, क्योंकि फरवरी-मार्च में बाजार में आने वाले इन आमों की कीमत काफी अधिक होती है. लाड के मुताबिक, फूल आने की पहली दो बहारें खराब रहीं.

किसान: कौस्तुभ गोगेट
स्थान: जमसंदे, देवगढ़ तालुका, सिंधुदुर्ग
फसल बर्बादी की कहानी
: गोगेट आम की खेती करने के अलावा इसके खरीदने और बेचने का काम भी करते हैं. उनका कहना है कि अल्फोंसो आम की फसल खराब होने से पूरी आर्थिक व्यवस्था ठप हो गई है. वे आगे कहते हैं, “हम आम के प्रोडक्ट से दूसरे तरह के माल भी तैयार करते हैं, लेकिन इस बार आम की कमी है तो कच्चा माल कहां से लाएं?” किसानों से आम की खेप लाकर बाजारों तक पहुंचाते समय गोगेट बताते हैं कि माल ढुलाई कम होने, ईंधन जैसे अतिरिक्त खर्चों और श्रम लागत में कटौती के कारण मुनाफा घट रहा है.

कमर्शियल LPG की उपलब्धता में मौजूदा बाधाओं ने गोगेट जैसे आम के कारोबारियों को प्रभावित किया है. वे कहते हैं, “कुछ माल तो हम गैस से बॉयलर से बना रहे हैं, लेकिन 'हापुस मावा' जैसे कुछ उत्पाद ऐसे हैं जिनके लिए केवल गैस ही उपयुक्त है. इसके अलावा, छोटे इकाइयां महंगे बॉयलर स्थापित नहीं कर सकतीं.”

किसान: किरण धुरी
स्थान: वानीवाडे, देवगढ़ तालुका, सिंधुदुर्ग

फसल के नुकसान की कहानी: धुरी के पास लगभग 700 आम के पेड़ हैं, जिनसे सामान्यतः 700 से 800 बक्से आम टूटते हैं. लेकिन, इस बार उन्हें केवल 100 से 150 बक्से ही मिलने की उम्मीद है. धुरी, जो मुंबई के पास कृषि उपज बाजार समिति (APMC) और निजी बाजारों में अल्फोंसो आम बेचते हैं, उनका कहना है कि वहां के व्यापारियों ने पश्चिम एशिया युद्ध के कारण निर्यात प्रभावित होने की बात कहकर आम की कीमतें कम कर दी हैं.

किसान: ओमकार कुलकर्णी
स्थान: निवेंडी, रत्नागिरी तालुका, रत्नागिरी

फसल के नुकसान की कहानी: कुलकर्णी के पास खानदानी आम के बागीचे हैं. ये बागीचे गणपतिपुले तीर्थस्थल से लगभग 7 किलोमीटर दूर हैं. वे कुछ साल पहले नौकरी छोड़कर आए थे. अब वे मानते हैं कि इस व्यवसाय की अस्थिर और अनिश्चित प्रकृति को देखते हुए किसानों को आय के अतिरिक्त स्रोतों की तलाश करनी होगी. उदाहरण के लिए, कुलकर्णी निर्माण क्षेत्र में भी हाथ आजमा रहे हैं.

अल्फोंसो आम की पैदावार में आई गिरावट ने कुलकर्णी को बुरी तरह प्रभावित किया है. उन्हें लगभग 1,500 से 1,750 बक्से अल्फोंसो आम की पैदावार की उम्मीद थी, लेकिन अब मुश्किल से 700 से 800 बक्से ही मिल पा रहे हैं. कुलकर्णी इसके लिए बागों पर बंदरों के हमले और कोंकण में प्रदूषण फैलाने वाली परियोजनाओं, जैसे उनके गांव के पास लगा थर्मल प्लांट, को जिम्मेदार बताते हैं. उनका सुझाव है कि सरकार को इसके बजाय क्षेत्र में फूड प्रोसेसिंग इकाइयों को बढ़ावा देना चाहिए.

किसान: मकरंद केन
स्थान: रील, रत्नागिरी तालुका, रत्नागिरी

फसल के नुकसान की कहानी: आम उत्पादक और उससे पैक करके सप्लाई करने वाले मकरंद केन कहते हैं, "इस बार का मौसम खराब है." उन्हें लगता है कि इस साल आम की पैदावार घटकर मात्र 15-20 फीसद रह जाएगी. चौथी पीढ़ी के आम किसान केन पुणे में अल्फांसो आम को खाने के फल के रूप में बेचते हैं. इसके अलावा, वे इस आम को डिब्बाबंद करके सप्लाई भी करते हैं. वे बताते हैं कि पहले वे प्रतिदिन लगभग 100 से 125 बक्से पैक करते थे, जिनमें से प्रत्येक में पांच से आठ दर्जन आम होते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर 25-35 बक्से रह गई है. केन ने बताया कि उन्होंने कर्मचारियों की संख्या 60 से घटाकर 45 कर दी है. आगे भी इसे कम करने की योजना है.  

किसान: प्रकाश गोगेट
स्थान: जमसंदे, देवगढ़ तालुका, सिंधुदुर्ग

फसल के नुकसान की कहानी: BJP के पूर्व विधायक अप्पा गोगेट के बेटे के पास लगभग 600 आम के पेड़ हैं. पिछले साल की 2,000 पेटियों के मुकाबले इस साल उन्हें सिर्फ 100 से 150 पेटियां ही मिल पाएंगी. गोगेट का कहना है कि आम उत्पादकों की समस्याओं का समाधान और अल्फोंसो आम के भविष्य अनुसंधान पर निर्भर करता है. उनका अफसोस है कि कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों ने किसानों को आवश्यक मार्गदर्शन नहीं दिया. अन्य फसलों के लिए बने रसायन और उर्वरक आम उत्पादकों को बेच दिए गए. इसका बुरा असर आम के फसल पर पड़ रहा है.

किसान: बापुकाका जोशी
स्थान: कुंकेश्वर, देवगढ़ तालुका, सिंधुदुर्ग

फसल के नुकसान की कहानी: जोशी एक प्रगतिशील किसान के रूप में जाने जाते हैं, जिनके बागों से औसतन 10 टन प्रति हेक्टेयर उपज होती है, जबकि कोंकण में यह 1.96 टन और रत्नागिरी जिले में 2.6 टन है.

जोशी का कहना है कि इस साल उनकी फसल 70 से 75 टन की वार्षिक उपज के मुकाबले सिर्फ 10 से 12 टन ही हो पाएगी. अपने घर के बाहर आंगन में बड़े-बड़े फलों से भरे बक्से रखे जोशी इस स्थिति के लिए मौसम की अनिश्चितताओं और तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराते हैं.

उनके खेतों में काम करने वाले 10 मजदूरों में से सिर्फ छह ही बचे हैं. वे पिछले 50 सालों से इस व्यवसाय में हैं और उन्होंने पहले भी बुरे दौर देखे हैं, लेकिन इस साल का नुकसान अभूतपूर्व है.

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