शिव के सहारे राम तक; अखिलेश की नई सियासी राह

केदारनाथ की तर्ज पर इटावा में बन रहा केदारेश्वर महादेव मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि अखिलेश यादव की सांस्कृतिक राजनीति और 2027 की सियासी रणनीति का भी अहम प्रतीक बन रहा है

इटावा में बन रहे केदारेश्वर महादेव मंदिर का मुख्य भवन और ग्रेनाइट से तैयार नंदी की प्रतिमा
इटावा में बन रहे केदारेश्वर महादेव मंदिर के आगे ग्रेनाइट से तैयार नंदी की प्रतिमा

इटावा जिले के लोहन्ना चौराहे से ग्वालियर रोड पर लायन सफारी पार्क की तरफ बढ़ते ही सड़क के बाईं ओर अचानक एक विशाल मंदिर का शिखर दिखाई देता है. कुछ क्षणों के लिए भ्रम होता है कि कहीं उत्तराखंड का केदारनाथ मंदिर तो मैदानों में नहीं उतर आया.

जैसे-जैसे आप मंदिर के करीब पहुंचते हैं, लगभग दस फीट ऊंचे चबूतरे पर स्थापित काले ग्रेनाइट के विशाल नंदी की प्रतिमा सामने आ जाती है. नंदी की दृष्टि सीधे मंदिर के गर्भगृह की ओर है और उसके पीछे पत्थरों से आकार ले रहा है केदारेश्वर महादेव मंदिर.

इसी मंदिर के बारे में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि मंदिर के पूर्ण होने के बाद वह सबसे पहले यहां भगवान शिव के दर्शन करेंगे और उसके बाद अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करेंगे.

करीब 11 एकड़ क्षेत्र में विकसित हो रहा यह मंदिर पहली नजर में धार्मिक परियोजना लगता है लेकिन इसकी कहानी इससे कहीं आगे जाती है. इसमें निजी आस्था, स्थापत्य कला, सांस्कृतिक संदेश और राजनीतिक प्रतीकवाद एक साथ दिखाई देते हैं. यही कारण है कि मंदिर परिसर अभी पूरी तरह तैयार भी नहीं हुआ है, फिर भी प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचने लगे हैं. सावन शुरू होने से पहले ही यहां रोजाना दो हजार से अधिक लोगों के आने का दावा किया जा रहा है.

निर्माणाधीन केदारेश्वर मंदिर परिसर में अखिलेश यादव

मंदिर की चर्चा पहली बार लोकसभा चुनाव से पहले फरवरी 2024 में उस समय राष्ट्रीय स्तर पर हुई थी, जब नेपाल से लाई गई शालिग्राम शिला देर रात ट्रक के जरिए लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय पहुंची. अगले दिन अखिलेश यादव, उनकी पत्नी डिंपल यादव और पार्टी नेताओं ने पूरे वैदिक विधि-विधान से उसकी पूजा-अर्चना की. उस समय देश का राजनीतिक माहौल अयोध्या के राम मंदिर के उद्घाटन के बाद धार्मिक विमर्श से भरा हुआ था. ऐसे में समाजवादी पार्टी ने पहली बार सार्वजनिक रूप से इस मंदिर परियोजना को सामने रखा.

बाद में यही शालिग्राम शिला इटावा लाई गई, जिसे मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया जा रहा है. यह शिला नेपाल के रौतहट जिले के प्रसिद्ध गरीबनाथ महादेव मंदिर की ओर से उपहार के रूप में मिली है और इसे स्वयंभू शिवलिंग माना जाता है. ऐसी देवशिलाएं केवल नेपाल की काली गंडकी नदी में ही मिलती हैं.

एक नंदी की प्रतिमा से शुरू हुई थी इस मंदिर की पूरी कहानी

केदारेश्वर महादेव मंदिर की परिकल्पना किसी राजनीतिक रणनीति के तहत नहीं बल्कि एक नंदी की प्रतिमा से शुरू हुई थी. मंदिर निर्माण कर रही आंध्र प्रदेश की कंपनी के निदेशक मधु बोट्टा बताते हैं कि वर्ष 2009 में नई दिल्ली में उनकी पहली मुलाकात अखिलेश यादव से हुई थी. उस समय अखिलेश ने उनसे केवल एक विशाल नंदी की प्रतिमा बनाने को कहा था. दरअसल, मैसूर के जयचामाराजेंद्र कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ाई के दौरान अखिलेश यादव अक्सर चामुंडेश्वरी मंदिर जाया करते थे. वहां स्थापित विश्वप्रसिद्ध काले ग्रेनाइट के नंदी ने उन पर गहरी छाप छोड़ी थी. उन्होंने उसी शैली की प्रतिमा इटावा में स्थापित करने की इच्छा जताई.

कई वर्षों की तैयारी के बाद वर्ष 2017 में मधु बोट्टा मैसूर स्थित नंदी की लगभग हूबहू प्रतिकृति बनाकर इटावा लेकर आए. जब अखिलेश यादव ने उसे देखा तो वे इतने प्रभावित हुए कि यहीं से एक भव्य शिव मंदिर बनाने का विचार सामने आया. इसके बाद वर्ष 2018 में इटावा लायन सफारी पार्क के सामने शीतलपुर गांव में करीब दस बीघा जमीन एक ट्रस्ट के माध्यम से खरीदी गई. मधु बोट्टा की टीम ने निर्माण शुरू करने से पहले उस स्थान के भौगोलिक निर्देशांकों का अध्ययन कराया. इसी अध्ययन में दावा किया गया कि यह स्थान उस पवित्र देशांतर रेखा पर स्थित है जिसे शिव अक्ष रेखा या ज्योतिर्लिंग अक्ष कहा जाता है. यह वही काल्पनिक रेखा मानी जाती है जिस पर उत्तराखंड का केदारनाथ, श्रीकालहस्ती, एकाम्बरेश्वर, अरुणाचलेश्वर, जम्बूकेश्वर, तिल्लई नटराज और रामेश्वरम जैसे प्रमुख शिव मंदिर स्थित हैं. मधु बोट्टा के अनुसार इटावा उसी रेखा पर पड़ता है, इसलिए यहां बनने वाला मंदिर उस श्रृंखला का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकता है.

इसके बाद मंदिर की वास्तुकला पर लगभग तीन वर्षों तक अध्ययन किया गया. आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा और उत्तराखंड के दर्जनों प्राचीन मंदिरों का सर्वे किया गया. तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, वैथीश्वरन मंदिर, श्रीकालहस्ती और कई अन्य मंदिरों की स्थापत्य शैली का सूक्ष्म अध्ययन हुआ. आखिरकार निर्णय लिया गया कि मंदिर का मुख्य गर्भगृह उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर जैसा होगा, जबकि पूरा परिसर दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली से प्रेरित होगा. इस तरह यह परियोजना उत्तर और दक्षिण भारतीय मंदिर परंपराओं के संगम का उदाहरण बन गई.

तीन लाख वर्ष पुराने पत्थर, बिना सीमेंट का निर्माण और अनूठी इंजीनियरिंग

केदारेश्वर महादेव मंदिर को विशिष्ट बनाने वाली सबसे बड़ी बात उसका निर्माण है. पूरा मंदिर तमिलनाडु के कन्याकुमारी क्षेत्र से लाए गए विशेष ग्रेनाइट 'कृष्ण पुरुष शिला' से बनाया जा रहा है. मंदिर निर्माण से जुड़े लोग बताते हैं कि दुनिया में यह पत्थर केवल इसी क्षेत्र में मिलता है. इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लोहे की छड़ से प्रहार करने पर इसमें घंटी जैसी ध्वनि सुनाई देती है. इसकी आयु लगभग तीन लाख वर्ष मानी जाती है और इसे अत्यंत मजबूत प्राकृतिक पत्थरों में गिना जाता है. यही पत्थर राम मंदिर में रामलला की मूर्ति के लिए भी इस्तेमाल हुआ था लेकिन इटावा में इसका उपयोग केवल मूर्ति तक सीमित नहीं है बल्कि पूरा मंदिर इसी ग्रेनाइट से बनाया जा रहा है.

इस मंदिर में आधुनिक निर्माण सामग्री का उपयोग लगभग नहीं किया गया है. न लोहे का इस्तेमाल है और न सीमेंट का. पत्थरों को जोड़ने के लिए प्राचीन भारतीय 'त्रिबंधन' तकनीक अपनाई गई है जिसमें चूना, गुड़, केला, शहद और अन्य प्राकृतिक पदार्थों से तैयार विशेष मिश्रण का उपयोग होता है. दक्षिण भारत के कई प्राचीन मंदिर आज भी इसी तकनीक के कारण हजारों वर्षों से सुरक्षित खड़े हैं.

भूमिपूजन के साथ ही कन्याकुमारी में एक बड़ी कार्यशाला स्थापित की गई. वहां पहले पत्थरों की कटाई और नक्काशी हुई. इसके बाद उन्हें हजारों किलोमीटर दूर ट्रकों के माध्यम से इटावा लाया गया. इस परियोजना पर करीब 25 कुशल शिल्पकार लगातार काम कर रहे हैं. इनमें मुत्तु गणपति उर्फ बाला और उमाशंकर जैसे शिल्पकार भी शामिल हैं, जिनके परिवार ने कन्याकुमारी के समुद्र में स्थित चट्टान पर स्थापित संत तिरुवल्लुवर की विश्वप्रसिद्ध प्रतिमा के निर्माण में भी योगदान दिया था.

मंदिर के गर्भगृह की ऊंचाई लगभग 74 फीट है और यह दस फीट ऊंचे चबूतरे पर स्थित है. इस प्रकार जमीन से इसकी कुल ऊंचाई लगभग 84 फीट होती है, जो उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर से लगभग एक इंच कम रखी गई है. मधु बोट्टा के मुताबिक यह अंतर जानबूझकर रखा गया ताकि मूल केदारनाथ मंदिर के प्रति सम्मान व्यक्त किया जा सके. गर्भगृह की छत और शिखर के बीच विशेष खोखला स्थान बनाया गया है. ऊपर 'ब्रह्मेंद्र होल' नाम का छोटा छिद्र रखा गया है जिससे घंटी, शंख और डमरू की ध्वनि पूरे परिसर में स्वाभाविक रूप से गूंज सके. गर्भगृह में बिजली की रोशनी नहीं होगी. यहां केवल दीपक के प्रकाश से शिवलिंग प्रकाशित रहेगा.

आस्था का नया केंद्र या समाजवादी पार्टी की सांस्कृतिक राजनीति?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक प्रतीकों की भूमिका लगातार बढ़ती रही है. अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बाद BJP ने उसे अपनी वैचारिक और राजनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया. दूसरी ओर समाजवादी पार्टी लंबे समय तक जातीय समीकरणों और सामाजिक न्याय की राजनीति तक सीमित मानी जाती रही. ऐसे में इटावा का केदारेश्वर महादेव मंदिर स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है.

जनवरी 2024 में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा में शामिल न होने के कारण अखिलेश यादव को BJP नेताओं, विशेषकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से लगातार निशाना बनाया गया. उन पर हिंदू विरोधी राजनीति करने और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप लगाए गए. ऐसे माहौल में केदारेश्वर महादेव मंदिर को समाजवादी पार्टी अपने सांस्कृतिक पक्ष के रूप में भी प्रस्तुत कर रही है. अब जब अयोध्या में राम मंदिर के दान में चोरी की घटना सामने आई तो इटावा का यह शिव मंदिर भी चर्चा में आया. 28 जून को प्रयागराज में एक सवाल के उत्तर पर अखि‍लेश यादव ने कहा कि वह पहले इटावा में भगवान शि‍व का दर्शन करने के बाद अयोध्या में भगवान राम का दर्शन करने जाएंगे.

इटावा में सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष और वरिष्ठ नेता गोपाल यादव कहते हैं कि समाजवादी पार्टी को हिंदू विरोधी बताना BJP का राजनीतिक प्रचार है. उनके अनुसार इटावा में मुलायम सिंह यादव द्वारा स्थापित विशाल हनुमान प्रतिमा, सैफई में बन रही भगवान कृष्ण की प्रतिमा और अब केदारेश्वर महादेव मंदिर इस बात का प्रमाण हैं कि समाजवादी आंदोलन भारतीय संस्कृति और धार्मिक आस्था से कभी दूर नहीं रहा.

गोपाल यादव इस मंदिर को उत्तर और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बताते हैं. उनके अनुसार इसका उद्देश्य किसी दूसरे मंदिर से प्रतिस्पर्धा करना नहीं बल्कि भारतीय मंदिर परंपरा के विभिन्न रूपों को एक साथ प्रस्तुत करना है. मंदिर निर्माण से जुड़े लोग भी बार-बार कहते हैं कि इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, लेकिन यह भी सच है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में इतना बड़ा धार्मिक निर्माण अपने आप में राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लेता है.

लेकिन इस मंदिर का महत्व केवल धार्मिक नहीं है. यह उस बदलाव का संकेत भी है जो उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले एक दशक में आया है. अब लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से जनता तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. BJP के लिए अयोध्या का राम मंदिर उसकी सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि है. वहीं समाजवादी पार्टी के लिए इटावा का केदारेश्वर महादेव मंदिर शायद यह संदेश देने का माध्यम है कि सामाजिक न्याय और धार्मिक आस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. 

Read more!