BJP से निपटने के लिए अखिलेश का डिजिटल गेमप्लान

यूपी में 2027 चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी इन्फ्लुएंसर्स, क्षेत्रीय भाषाओं और अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म के सहारे नैरेटिव गढ़ रही है

अखिलेश ने कहा, बंगाल में भाजपा का मुंह मीठा नहीं होगा. Photo ITG
अखिलेश यादव (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर चुनावी जंग ने रफ्तार पकड़ ली है. इस जंग में समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपने खेल को पूरी तरह रीसेट करते हुए सोशल मीडिया को रणनीतिक हथियार में बदलने का फैसला किया है. 

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लंबे समय से स्थापित डिजिटल प्रभुत्व के सामने सपा की यह नई रणनीति दरअसल एक जवाबी हमला है. पिछले एक दशक में BJP ने सोशल मीडिया पर जिस तरह का नेटवर्क तैयार किया, उसने चुनावी नैरेटिव को अपने पक्ष में मोड़ने की क्षमता दिखाई. 

2024 के लोकसभा चुनाव में भी यह साफ दिखा कि BJP समर्थित डिजिटल कंटेंट, संगठित आईटी सेल और हजारों अनौपचारिक समर्थकों का नेटवर्क लगातार एजेंडा सेट करता रहा. सपा के भीतर यह समझ बनी कि अगर इस डिजिटल दबदबे को चुनौती नहीं दी गई, तो जमीनी मुद्दे भी प्रभावी तरीके से जनता तक नहीं पहुंच पाएंगे. इसी पृष्ठभूमि में सपा ने 2027 के लिए एक बहुस्तरीय डिजिटल गेम प्लान तैयार किया है, जिसमें तीन प्रमुख स्तंभ हैं- इन्फ्लुएंसर नेटवर्क, अपना डिजिटल मीडिया इकोसिस्टम और कंटेंट पर सख्त नियंत्रण.

‘डिजिटल डेमोक्रेसी डायलॉग’: नई रणनीति की शुरुआत

इस रणनीति का पहला बड़ा संकेत 18 मार्च को लखनऊ में आयोजित ‘डिजिटल डेमोक्रेसी डायलॉग’ के रूप में सामने आया. इस कार्यक्रम में करीब 200 सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और यूट्यूबर्स को आमंत्रित किया गया. ये सिर्फ बड़े नाम नहीं थे, बल्कि ऐसे स्थानीय कंटेंट क्रिएटर थे जिनकी अपने-अपने जिलों और क्षेत्रों में मजबूत पकड़ है. इनमें अवधी, भोजपुरी और बुंदेली जैसी भाषाओं में वीडियो बनाने वाले युवा शामिल थे, जिनके फॉलोअर्स भले लाखों में न हों, लेकिन उनकी विश्वसनीयता और पहुंच गहरी है. 

बैठक में अखि‍लेश यादव ने साफ कहा कि पार्टी को ऐसे कंटेंट की जरूरत है जो तथ्यों पर आधारित हो और समाज के किसी वर्ग को आहत न करे. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि व्यूज और फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल सपा की रणनीति का हिस्सा नहीं होगा. यह निर्देश दरअसल सपा की उस सतर्कता को दिखाता है, जो वह डिजिटल स्पेस में किसी भी विवाद से बचने के लिए बरत रही है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, इस पूरी कवायद के तहत लगभग 250 ऐसे इन्फ्लुएंसर्स की पहचान की गई है, जिन्हें धीरे-धीरे एक नेटवर्क के रूप में जोड़ा जा रहा है. इनमें से कई पहले से ही स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे हैं, जैसे एलपीजी सिलेंडर की कीमतों से जुड़ी परेशानियां, बेरोजगारी, स्थानीय प्रशासन की समस्याएं या बुनियादी सुविधाओं की कमी. सपा इन मुद्दों को अपने राजनीतिक नैरेटिव के साथ जोड़कर व्यापक स्तर पर फैलाना चाहती है. 

डिजिटल कैडर की तरह इन्फ्लुएंसर नेटवर्क

सपा के भीतर यह भी आकलन है कि करीब 140 से अधिक यूट्यूबर्स और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर ऐसे हैं, जो BJP के पक्ष में सक्रिय रूप से कंटेंट बना रहे हैं. इस असंतुलन को दूर करने के लिए सपा अब अपने डिजिटल कैडर को तेजी से बढ़ा रही है. यह कैडर पारंपरिक कार्यकर्ताओं की तरह ही काम करेगा, लेकिन इसका मैदान सोशल मीडिया होगा. 

डिजिटल रणनीति का दूसरा अहम हिस्सा है अपना मीडिया प्लेटफॉर्म तैयार करना. इसी सोच के तहत ‘समाजवादी पार्टी TV’ की शुरुआत की गई. यह यूट्यूब चैनल पार्टी के लिए एक आधिकारिक डिजिटल मंच बन चुका है, जहां रोजाना पार्टी का पक्ष, बयान और मुद्दों पर प्रतिक्रिया साझा की जाती है. पार्टी प्रवक्ता नावेद सिद्दीकी हर रात 8 से 9 बजे तक 'समाजवादी खबरें' के जरिए एक तरह से डिजिटल बुलेटिन पेश करते हैं. इस पहल का मकसद साफ है कि पारंपरिक मीडिया पर निर्भरता कम करना और सीधे जनता तक पहुंच बनाना. 

सिद्दीकी के अनुसार, कई बार पार्टी का पक्ष मुख्यधारा के मीडिया में पूरी तरह सामने नहीं आ पाता, ऐसे में यह प्लेटफॉर्म उस कमी को पूरा करता है. इन्फ्लुएंसर्स के बीच एक बड़ी चिंता सरकारी कार्रवाई को लेकर भी थी. कई कंटेंट क्रिएटर्स ने बैठक में यह आशंका जताई कि सरकार के खिलाफ या नकारात्मक कंटेंट दिखाने पर पुलिस या प्रशासनिक कार्रवाई हो सकती है. इस पर अखिलेश यादव ने उन्हें भरोसा दिलाया कि अगर वे तथ्यात्मक और जिम्मेदार कंटेंट बनाते हैं, तो पार्टी उनके साथ खड़ी रहेगी और जरूरत पड़ने पर कानूनी मदद भी उपलब्ध कराएगी.

टॉक शो और डिजिटल बहस से नैरेटिव कंट्रोल की कोशिश

सपा यहीं नहीं रुकना चाहती. सूत्रों के मुताबिक, पार्टी एक डिजिटल टॉक शो शुरू करने की तैयारी में है, जिसमें पार्टी नेता और विशेषज्ञ समसामयिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करेंगे. यह पहल BJP के उस मॉडल का जवाब मानी जा रही है, जिसमें टीवी डिबेट और सोशल मीडिया क्लिप्स के जरिए लगातार नैरेटिव को मजबूत किया जाता है. इसके साथ ही सपा ने ‘Vision India: Plan, Develop, Ascent’ जैसी समिट के जरिए डिजिटल और जमीनी राजनीति को जोड़ने की कोशिश की है. इनमें विशेषज्ञों, युवाओं और विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से सुझाव लिए जा रहे हैं, जिन्हें पार्टी अपने भविष्य के घोषणापत्र में शामिल करने की योजना बना रही है. इससे पार्टी को न केवल डेटा आधारित दृष्टिकोण मिलता है, बल्कि यह भी संदेश जाता है कि वह सहभागी राजनीति में विश्वास रखती है. 

सपा की डिजिटल रणनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू है क्षेत्रीय भाषाओं पर फोकस. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और विविध राज्य में केवल हिंदी या अंग्रेजी में कंटेंट बनाकर व्यापक पहुंच हासिल करना मुश्किल है. इसलिए पार्टी ने अवधी, भोजपुरी और बुंदेली में कंटेंट बनाने वाले इन्फ्लुएंसर्स को प्राथमिकता दी है. इससे गांव और छोटे कस्बों तक पहुंच आसान हो रही है, जहां स्थानीय भाषा में बात ज्यादा असरदार होती है.

डिजिटल गीतों से चुनावी माहौल 

चुनावी माहौल बनाने के लिए सपा ने डिजिटल गीतों को भी एक माध्यम बनाया है. महंगाई, बेरोजगारी, असुरक्षा और PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) जैसे मुद्दों को गीतों के जरिए प्रस्तुत किया जा रहा है. ये गीत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, पार्टी कार्यक्रमों और स्थानीय आयोजनों में लगातार प्रसारित किए जा रहे हैं, ताकि एक भावनात्मक कनेक्ट तैयार किया जा सके. सपा के विधायक आशु मलिक इस योजना में पार्टी सबसे ज्यादा मदद कर रहे हैं. गीतों के माध्यम से मतदाताओं को संदेश देने की कोशिश सपा की रणनीति का हिस्सा है. इसके लिए पार्टी की डिजिटल टीम से लेकर कार्यकर्ता और समर्थक तक लगातार नए नए गीत तैयार कर रहे हैं. पार्टी के इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म से लेकर कार्यक्रमों तक में इन गीतों को सुनाया जा रहा है. 

हालांकि बिहार में पिछले वर्ष हुए विधान सभा चुनाव के बाद सपा इन गीतों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरत रही है. बिहार चुनाव में BJP ने विवादित गीतों को मुद्दा बनाकर राष्ट्रीय जनता दल को बैकफुट पर ला दिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैमूर और समस्तीपुर की अपनी चुनावी रैलियों में इनमें से 'मारब सिक्सर के छह गोली छाती में' और 'आएगी भैया की सरकार बनेंगे रंगदार' गीतों का उल्लेख कर जंगलराज का मुद्दा उठाया था. 

अब यूपी में सपा वर्ष 2027 के चुनाव को लेकर ऐसा कोई जोखिम नहीं लेना चाहती. इसीलिए हर गीत की रचना पूरी तरह विवादों से बचते हुए की जा रही है. हाल ही में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 'आबे दे सत्ता में, कट्टा सटा के' गीत को BJP की बदनाम करने की साजिश करार दिया था और मामले में कानूनी कार्रवाई तक की बात कही थी. इससे पहले सपा प्रमुख ने इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित 'दबदबा' गीत को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की थी और कहा था यह गीत पार्टी की ओर से अधिकृत नहीं हैं. 

समर्पित आईटी सेल और सोशल मीडिया विंग 

पार्टी के अंदर एक अनौपचारिक मॉनिटरिंग सिस्टम भी विकसित किया जा रहा है, जो सोशल मीडिया पर चल रहे सपा समर्थित कंटेंट पर नजर रखेगा. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी ऐसा संदेश न जाए, जो राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है. डिजिटल ढांचे को मजबूत करने के लिए सपा एक समर्पित आईटी सेल और सोशल मीडिया विंग बनाने पर भी विचार कर रही है. यह विंग कंटेंट, डेटा, ग्राफिक्स और नैरेटिव तैयार करने में इन्फ्लुएंसर्स और कार्यकर्ताओं की मदद करेगा. आने वाले छह महीनों में सपा अपनी डिजिटल गतिविधियों को और तेज करेगी. नए प्लेटफॉर्म, ज्यादा इन्फ्लुएंसर्स और अधिक आक्रामक कंटेंट रणनीति के जरिए पार्टी 2027 के चुनाव में डिजिटल स्पेस में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है. 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा की यह रणनीति सही दिशा में है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या पार्टी इसे लंबे समय तक अनुशासित और संगठित तरीके से चला पाती है. 

उत्तर प्रदेश की राजनीति अब दो समानांतर मैदानों पर लड़ी जा रही है- एक जमीनी और दूसरा डिजिटल. समाजवादी पार्टी ने इस दूसरे मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है. अब देखना यह है कि अखिलेश यादव का यह डिजिटल गेम प्लान 2027 में सिर्फ ऑनलाइन चर्चा तक सीमित रहता है या फिर चुनावी नतीजों को भी प्रभावित करता है.

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