अब तीसरी क्लास से AI की पढ़ाई! सिलेबस में क्या होगा?
केंद्र सरकार ने तीसरी कक्षा से ही AI की पढ़ाई शुरू कराने का निर्णय लिया है लेकिन सरकारी स्कूलों के सामने इसे अपनाने की कई चुनौतियां हैं

कल यानी 1 अप्रैल को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कक्षा तीसरी से आठवीं तक के विद्यार्थियों के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के कंप्यूटेशनल थिंकिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (CT & AI) पाठ्यक्रम को लॉन्च किया. केंद्र सरकार का दावा है कि इससे भारत की स्कूली शिक्षा का भविष्य बदल जाएगा. लेकिन विशेषज्ञ इस दावे की हकीकत पर कई तरह के संदेह जता रहे हैं.
केंद्र सरकार ने जो नया पाठ्यक्रम लॉन्च किया है, वह कक्षा 3 से 8 तक के विद्यार्थियों के लिए 2026-27 सत्र से लागू हो रहा है. शिक्षा मंत्रालय और CBSE के संयुक्त प्रयास से तैयार इस पाठ्यक्रम को भारत की स्कूली शिक्षा में ‘AI फॉर एजुकेशन, AI इन एजुकेशन’ की दिशा में एक निर्णायक कदम बताते हुए प्रधान ने कहा, ''यह भविष्य के अनुरूप शिक्षा की ओर परिवर्तनकारी बदलाव है.''
अब सवाल उठता है कि आखिर इस पाठ्यक्रम में क्या है? दरअसल, यह पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचा-स्कूली शिक्षा (NCF-SE) 2023 पर आधारित है. कक्षा 3 से 5 तक इसके लिए करीब 50 घंटे और कक्षा 6 से 8 तक 100 घंटे का समय निर्धारित किया गया है. इसमें मुख्य फोकस ‘कंप्यूटेशनल थिंकिंग’ पर है, जिसे AI को समझने का बौद्धिक आधार माना जाता है. इसमें लॉजिकल थिंकिंग, समस्या-समाधान, पैटर्न रिकग्निशन, डेटा विश्लेषण और एल्गोरिदम की बुनियादी समझ विकसित करने पर जोर दिया गया है.
इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह है कि कक्षा 3-5 में यह पाठ्यक्रम अलग विषय के तौर पर नहीं, बल्कि गणित, पर्यावरण अध्ययन (ईवीएस) और ‘द वर्ल्ड अराउंड अस’ जैसे विषयों में शामिल करके पढ़ाया जाएगा. इसे ऐसे समझें कि बच्चे सरल पजल, गेम्स और हैंड्स-ऑन एक्टिविटी के जरिए सीखेंगे कि किसी समस्या को छोटे-छोटे हिस्सों में कैसे बांटा जाए. केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, कक्षा 6-8 में AI का परिचय दिया जाएगा और उनमें यह समझ विकसित करने की कोशिश की जाएगी कि AI रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे काम करता है. इसमें वॉइस असिस्टेंट, रिकमेंडेशन सिस्टम और इमेज रिकग्निशन जैसी बातें पढ़ाई जाएंगी.
इस नए पाठ्यक्रम का जोर ‘प्ले-बेस्ड’ और ‘एक्टिविटी-बेस्ड’ लर्निंग पर है. इसमें भारी किताबें नहीं, बल्कि स्पेशलाइज्ड वर्कशीट्स, ग्रुप डिस्कशन और पीयर लर्निंग का इस्तेमाल होगा. मूल्यांकन भी कंपिटेंसी-बेस्ड होगा, जिसमें यह देखा जाएगा कि बच्चों में रट्टा मारने के बजाय क्रिएटिव थिंकिंग, प्रॉब्लम-सॉल्विंग और एथिकल डिसीजन मेकिंग क्षमता कितनी विकसित हुई है. CBSE का दावा है कि यह पाठ्यक्रम डिजिटल लिटरेसी, जिम्मेदार टेक्नोलॉजी यूज, इनोवेशन और क्रिटिकल थिंकिंग को बढ़ावा देगा.
इस नई शुरुआत को लेकर केंद्र सरकार की सोच NEP 2020 से जुड़ी है. इसका लक्ष्य भारत को AI और मशीन लर्निंग में वैश्विक लीडर बनाना है. सरकार मानती है कि 2030 तक दुनिया के 85 प्रतिशत जॉब्स AI से जुड़े होंगे. इसलिए बचपन से ही कंप्यूटेशनल थिंकिंग सिखाकर बच्चों को ‘लर्न, अनलर्न और री-लर्न’ की क्षमता दी जाए. सरकार का मानना है कि इससे बच्चे न सिर्फ भविष्य के रोजगार के लिए तैयार होंगे, बल्कि ग्लोबल आइडियाज, सिस्टम्स और सॉल्यूशंस को आकार देंगे.
CBSE इस पाठ्यक्रम को केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय और CBSE संबद्ध स्कूलों में लागू करेगा. इसके लिए NCERT के साथ मिलकर टीचर हैंडबुक्स, मॉड्यूल्स और असेसमेंट फ्रेमवर्क तैयार किए गए हैं.
इसके क्रियान्वयन की चुनौतियों को लेकर भी चर्चा हो रही है. सबसे बड़ी चुनौती टीचर ट्रेनिंग की है. देश के लाखों स्कूल टीचर्स में से ज्यादातर AI या कंप्यूटेशनल थिंकिंग से अनजान हैं. एक अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण स्कूलों में 60 प्रतिशत से ज्यादा टीचर्स बेसिक डिजिटल स्किल्स में भी कमजोर हैं. बिना बड़े पैमाने पर ट्रेनिंग के यह पाठ्यक्रम लागू किए जाने से अंदेशा है कि यह योजना सिर्फ कागज पर ही न रह जाए.
दूसरी बड़ी चुनौती इंफ्रास्ट्रक्चर की है. भारत में अभी भी 40 प्रतिशत से ज्यादा सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर लैब या स्टेबल इंटरनेट नहीं है. अंदेशा है कि इस पाठ्यक्रम के लागू होने के बाद ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में डिजिटल डिवाइड और गहरा हो जाएगा. शहरी निजी स्कूलों के पास जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर है, जिससे उनके लिए इसे लागू करना आसान होगा. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी और कम साधन संपन्न स्कूलों के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी.
तीसरी चुनौती उम्र की अनुकूलता की है. कक्षा 3 के बच्चों की उम्र सामान्य तौर पर आठ साल होती है. कुछ विशेषज्ञ मान रहे हैं कि उनके लिए AI जैसे कांसेप्ट को समझना आसान नहीं होगा. अगर एक्टिविटी-बेस्ड तरीका अपनाया गया तब तो ठीक है, लेकिन अगर शिक्षकों ने इसे भी रट्टा सिस्टम में बदल दिया तो इसका मकसद ही खत्म हो जाएगा.
अगर सही तरीके से यह पाठ्यक्रम लागू हुआ तो यह पीढ़ी बच्चों में क्रिटिकल थिंकिंग विकसित करने का माध्यम बनेगा. लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी. आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि CBSE, शिक्षा मंत्रालय और स्कूल इस पाठ्यक्रम को कितना प्रभावी ढंग से धरातल पर उतारते हैं.