ईरान संघर्ष की आंच में जला आगरा का पेठा उद्योग
अमेरिका-ईरान तनाव से कमर्शियल गैस संकट गहरा गया है. आगरा का पेठा उद्योग ठप है, मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं और किसान बेहाल हैं. सरकारी योजनाएं फिलहाल नाकाफी साबित हो रहीं

आगरा के नूरी दरवाजा इलाके की पहचान सिर्फ एक बाजार की नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा की रही है. सुबह होते ही यहां कड़ाहों में उबलती चाशनी, छिलते पेठा कद्दू और काम में जुटे कारीगरों की आवाजें इस बात का एहसास कराती थीं कि शहर की मिठास यहीं से निकलती है.
लेकिन अब इन गलियों में सन्नाटा पसरा है. कई कड़ाह ठंडे पड़े हैं, भट्टियां बुझ चुकी हैं और कारीगरों की जगह ताले नजर आते हैं. यह बदलाव अचानक नहीं आया. पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और हालिया संघर्षविराम के बावजूद जारी अनिश्चितता ने कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई को प्रभावित किया है.
इसका सीधा असर आगरा के पेठा उद्योग पर पड़ा है, जो पूरी तरह इस ईंधन पर निर्भर हो चुका है.
संकट में 500 करोड़ का उद्योग
स्थानीय व्यापारियों के अनुसार, आगरा का पेठा उद्योग करीब 500 करोड़ रुपए का कारोबार करता है. शहर में लगभग 500 छोटी-बड़ी इकाइयां इस काम से जुड़ी हैं. लेकिन आज इनमें से ज्यादातर या तो बंद हो चुकी हैं या सीमित उत्पादन कर रही हैं.
“शहीद भगत सिंह कुटीर पेठा एसोसिएशन” के अध्यक्ष राजेश अग्रवाल बताते हैं, “स्थिति इतनी खराब है कि कई इकाइयों के पास एक-दो दिन का भी गैस स्टॉक नहीं बचा. छोटे कारोबारी सबसे ज्यादा प्रभावित हैं.” बड़े ब्रांड किसी तरह अपने पुराने स्टॉक या संसाधनों के दम पर टिके हुए हैं, लेकिन छोटे निर्माता रोजाना की जद्दोजहद में फंसे हैं. यह असमानता उद्योग के भीतर की खाई को और गहरा कर रही है.
ईंधन पर निर्भरता की पुरानी कहानी
पेठा उद्योग की मौजूदा हालत को समझने के लिए इसके अतीत में झांकना जरूरी है. 1996 में सुप्रीम कोर्ट के एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले ने ताज ट्रेपेजियम जोन (TTZ) में प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों पर रोक लगा दी थी. इस फैसले का उद्देश्य ताजमहल को औद्योगिक प्रदूषण से बचाना था. इसके तहत उद्योगों को कोयला और कोक छोड़कर स्वच्छ ईंधन अपनाने या क्षेत्र छोड़ने का निर्देश दिया गया.
फिरोजाबाद के कांच उद्योग ने पाइप्ड गैस का विकल्प अपना लिया, लेकिन पेठा उद्योग धीरे-धीरे कमर्शियल गैस सिलेंडरों पर निर्भर हो गया. यह बदलाव उस समय तो पर्यावरण के लिहाज से सही लगा, लेकिन लंबे समय में इसने उद्योग को एक ही ईंधन स्रोत पर निर्भर बना दिया. पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद गैस सप्लाई प्रभावित हुई और स्थानीय स्तर पर इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ा. आज वही निर्भरता संकट बनकर सामने आई है.
जिला आपूर्ति अधिकारी आनंद सिंह के मुताबिक, गैस की सप्लाई पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन इसे सख्त राशनिंग के तहत दिया जा रहा है. जिन इकाइयों के पास वैध कमर्शियल कनेक्शन हैं, उन्हें पिछले तीन महीनों की औसत खपत का केवल 20 प्रतिशत गैस मिल रही है. यह मात्रा उत्पादन चलाने के लिए बेहद कम है.
जानकार बताते हैं कि समस्या यह भी है कि पेठा उद्योग का बड़ा हिस्सा असंगठित है. कई छोटे उत्पादकों के पास वैध कनेक्शन ही नहीं हैं, जिससे वे इस सीमित सप्लाई से भी बाहर रह जाते हैं. नूरी दरवाजा के एक छोटे निर्माता बताते हैं, “हम रोजाना 10-12 सिलेंडर इस्तेमाल करते थे, अब मुश्किल से 2-3 मिल रहे हैं.”
प्रशासन की सख्ती और बढ़ती मुश्किलें
ईंधन संकट के बीच प्रशासन ने अवैध गैस उपयोग पर भी सख्ती बढ़ा दी है. 14 मार्च को जिला आपूर्ति अधिकारी ने नूरी दरवाजा इलाके में छापा मारा, जहां से 42 घरेलू गैस सिलेंडर जब्त किए गए और एक FIR दर्ज की गई. हालांकि कुछ निर्माताओं ने ग्रामीण इलाकों में जाने की कोशिश की है, जहां कोयले और कोक का इस्तेमाल चोरी-छिपे करना आसान होता है, लेकिन प्रशासन की कड़ी निगरानी के चलते वहां भी काम करना मुश्किल हो गया है. इससे शहर के कई मजदूरों के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा हो गया है.
अग्रवाल ने कहा, "पेठा उद्योग को बचाने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है. पेठा कच्चे फल से बनता है, और इसे उगाने वाले किसानों को अब खरीदार नहीं मिल रहे हैं, क्योंकि ज्यादातर पेठा इकाइयां या तो बंद हो रही हैं या फिर अपना उत्पादन कम कर रही हैं."
मजदूर और किसानों की दुर्दशा
आगरा का पेठा उद्योग सिर्फ कारोबार नहीं बल्कि हजारों लोगों की रोजी-रोटी का आधार है. इसमें कारीगर, पैकिंग कर्मचारी, ट्रांसपोर्टर और दुकानदार सभी जुड़े हैं. उद्योग के ठप होने से सबसे ज्यादा असर मजदूरों पर पड़ा है. कई इकाइयों ने अपने कारीगरों को काम न होने के कारण छुट्टी पर भेज दिया है. एक मजदूर बताते हैं, “पहले रोज काम मिलता था, अब हफ्ते में एक-दो दिन ही बुलाते हैं. घर चलाना मुश्किल हो गया है.”
यह संकट धीरे-धीरे एक सामाजिक समस्या का रूप लेता जा रहा है, जहां बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा बढ़ रही है. इस उद्योग से जुड़े किसानों की हालत भी कम खराब नहीं है. पेठा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला कद्दू अब बिना खरीदार के खेतों में पड़ा है. डीलर राहुल गोयल बताते हैं, “पहले जो पेठा कद्दू 10 रुपए किलो बिकता था, अब 4-5 रुपए में भी नहीं बिक रहा. कई बार तो किसान लागत भी नहीं निकाल पा रहे.” किसानों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि अगली फसल बोई जाए या नहीं.
पर्यटन में गिरावट का असर
पेठा उद्योग पर्यटन पर भी काफी हद तक निर्भर है. ताजमहल देखने आने वाले पर्यटक पेठा खरीदना नहीं भूलते. लेकिन इस बार अक्टूबर से मार्च के पीक सीजन में पर्यटकों की संख्या में गिरावट देखी गई. स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर बनी अनिश्चितता और ईंधन संकट के कारण यात्रा प्रभावित हुई है.
दुकानदार बताते हैं कि पहले रोज सैकड़ों किलो पेठा बिक जाता था, लेकिन अब बिक्री आधी से भी कम रह गई है. इससे नकदी प्रवाह पूरी तरह टूट गया है. पेठा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने इसे ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ODOP) योजना में शामिल किया है. लेकिन उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि इन योजनाओं का फायदा तभी होगा, जब मूल समस्या यानी ईंधन का समाधान निकले. राजेश अग्रवाल कहते हैं, “अगर गैस ही नहीं मिलेगी, तो मार्केटिंग और ब्रांडिंग से क्या होगा? हमें स्थाई समाधान चाहिए, जैसे पाइप्ड गैस या कोई सस्ता वैकल्पिक ईंधन.”
विरासत पर मंडराता खतरा
विशेषज्ञ लवकुश मिश्र मानते हैं कि इस संकट से निकलने के लिए बहुस्तरीय रणनीति की जरूरत है. पहला, पेठा उद्योग को पाइप्ड नेचुरल गैस से जोड़ना. दूसरा, छोटे कारोबारियों को वैध कनेक्शन दिलाने के लिए सरल प्रक्रिया बनाना और तीसरा, वैकल्पिक ईंधनों पर रिसर्च और सब्सिडी देना.
आगरा का पेठा सिर्फ एक मिठाई नहीं बल्कि शहर की पहचान है. मुगल काल में नूरजहां ने इस मिठाई की तारीफ की थी, जिसके बाद यह प्रसिद्ध हुई. आज वही विरासत खतरे में है. नूरी दरवाजा की खामोश गलियां इस बात की गवाही दे रही हैं कि कैसे वैश्विक घटनाएं और स्थानीय नीतियां मिलकर एक पारंपरिक उद्योग को कमजोर कर सकती हैं. अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में पेठा उद्योग सिर्फ इतिहास की किताबों तक सिमट सकता है.