दिल्ली में 'आप' की हार के बाद भगवंत मान बदले-बदले नजर क्यों आ रहे हैं?

इस समय पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के सामने अपने मंत्रिमंडल का मनोबल बढ़ाने के साथ-साथ खुद को टीम लीडर साबित करने की दोहरी चुनौती है

भगवंत मान (फाइल फोटो)
भगवंत मान (फाइल फोटो)

दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) की हार के बाद अब पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के रवैए में अचानक ज्यादा गंभीरता दिखने लगी है. उन्होंने सत्तारूढ़ पार्टी के विधायकों और नेताओं के बीच असंतोष की लगातार बढ़ती चर्चा के बीच अपनी लोकप्रियता बचाने के लिए कड़ी मेहनत शुरू कर दी है.

मान के सामने अपने मंत्रिमंडल का मनोबल बढ़ाने के साथ-साथ खुद को टीम लीडर साबित करने की दोहरी चुनौती है. दरअसल दिल्ली में आप की चुनावी हार के साथ-साथ पार्टी के सामने कुछ गंभीर झटके भी आए. पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल और उनके कोर ग्रुप के कई सदस्य जैसे मनीष सिसोदिया, दुर्गेश पाठक, सत्येंद्र जैन और राखी बिड़ला अपनी सीटें हार गए.

दिल्ली में पार्टी का प्रदर्शन पंजाब सरकार के लिए भी बड़ा धक्का है, क्योंकि उसने 2022 के विधानसभा चुनावों (117 विधानसभा सीटों में से 92) में 'दिल्ली मॉडल' के आधार पर अपना अभियान चलाया था, जिसमें अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के अलावा मुफ्त बिजली और पानी का वादा शामिल था.

वहीं पिछले तीन सालों में मान की चमक लगातार फीकी पड़ी है. यह पिछले साल लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिला था जब आप ने पंजाब की 13 में से केवल तीन सीटें जीती थीं. वहीं कांग्रेस को सात, शिरोमणि अकाली दल को एक और निर्दलीयों को दो सीटें मिली थीं. आप ने मान के नाम पर अभियान चलाया था और टैगलाइन थी 'संसद विच वी भगवंत मान', जबकि देश के अन्य हिस्सों में पार्टी केजरीवाल को आगे रखती है.

दिल्ली चुनाव से पहले, जब पार्टी के कई पंजाब विधायकों ने मुख्यमंत्री की कार्यशैली को लेकर अरविंद केजरीवाल से संपर्क किया था तब आप प्रमुख ने मान को किनारे कर दिया था. मंत्रिमंडल में फेरबदल किया गया, मुख्यमंत्री कार्यालय का पुनर्गठन किया गया और मान के वफादारों और सहयोगियों के प्रभाव में भारी कटौती की गई. हालांकि, पंजाब के अधिकांश राजनीतिक पर्यवेक्षकों और आप के अंदरूनी सूत्रों का मानना ​​है कि दिल्ली में पार्टी के कमजोर होने के बाद मान का प्रभाव अब और कम नहीं हो सकता, कम से कम अभी तो नहीं. यकीनन इससे उन्हें वापसी का मौका भी मिलेगा.

पिछले महीने पंजाब विधानसभा के दो दिवसीय विशेष सत्र के दौरान मान अस्वस्थता के कारण पहले दिन नहीं आ पाए थे. लेकिन अगले दिन उन्होंने विरोधियों पर निशाना साधते हुए संतुलित रुख अपनाया और व्यक्तिगत टिप्पणियों से उन्हें भड़काने से परहेज किया. और अब, पिछले हफ़्ते 2024 के आम चुनावों से पहले की तरह मान ने किसानों के साथ मध्यस्थता करने से परहेज़ किया. चंडीगढ़ पहुंचकर मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन करने वाले किसानों को पुलिस ने गांवों में ही रोक दिया. बलबीर सिंह राजेवाल, रुलदू सिंह मनसा और जोगिंदर सिंह उग्राहन जैसे प्रमुख नेताओं सहित उनमें से कई को हिरासत में लिया गया.

भगवंत मान ने किसानों के खिलाफ अपना रुख कड़ा कर लिया, जिसके बाद 3 मार्च को मामला और बिगड़ गया. किसान यूनियनों ने मुख्यमंत्री पर अनुचित व्यवहार का आरोप लगाया और उनके साथ बैठक से बाहर चले गए. मान के समर्थकों ने कहा कि राज्य में यूनियनों की लोकप्रियता धीरे-धीरे कम हो रही है.

दरअसल, पंजाब सरकार का एक तबका यह मानता है कि गैर-किसान आबादी का बड़ा हिस्सा किसानों धरनों और नाकेबंदी से परेशान है, और इस हिस्से को रिझाने की जरूरत है. दूसरी तरफ सरकार के लिए किसानों को खुश करना भी मुश्किल साबित हो रहा है.

फिर, 3 मार्च को मान ने बनूर, मोहाली और खरड़ तहसीलों के आकस्मिक दौरे में प्रदर्शनकारी राजस्व अधिकारियों को सार्वजनिक चेतावनी जारी की. कुछ ही घंटों में, 15 तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों को ड्यूटी में लापरवाही बरतने के लिए निलंबित कर दिया गया. इस सूची में पंजाब राजस्व अधिकारी संघ के प्रमुख लछमन सिंह रंधावा भी शामिल थे. राजस्व अधिकारी लुधियाना जिले में अपने कुछ सहयोगियों के खिलाफ सतर्कता विभाग की कार्रवाई का विरोध कर रहे थे.

निलंबन के बाद भूमि और अन्य संपत्तियों के पंजीकरण का काम जूनियर अधिकारियों को सौंप दिया गया ताकि राजस्व विभाग का काम प्रभावित न हो. हालांकि इससे राजस्व विभाग के अधिकारियों के साथ मान की खींचतान और बढ़ सकती है, लेकिन विश्लेषक इसे सिस्टम को साफ करने और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख के तौर पर देख रहे हैं.

मार्च के पहले हफ्ते में पंजाब पहला गैर-भाजपा शासित राज्य बन गया, जिसने आपराधिक मामलों का सामना कर रहे लोगों की संपत्तियों को बुलडोजर से ध्वस्त करने की नीति अपनाई. पुलिस ने ऐसे 78 ड्रग तस्करों की सूची बना ली है और कार्रवाई शुरू कर दी है. लेकिन यह कदम उल्टा पड़ सकता है, क्योंकि मानवाधिकार कार्यकर्ता पहले ही अदालतों का दरवाजा खटखटा चुके हैं.

हालांकि मान के आलोचक इन कार्रवाइयों को केवल छोटी मछलियों को निशाना बनाने वाला बताकर उन पर निशाना साध रहे हैं. वहीं मान बार-बार दोहरा रहे हैं कि उन्होंने राज्य को ड्रग्स माफिया से मुक्त करने के लिए तीन महीने की समयसीमा तय की है. लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने पिछले तीन सालों में चार बार ऐसी समयसीमा तय की थी, लेकिन जमीनी स्तर पर उन्हें बहुत कम सफलता मिली.

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