अमेरिका-ईरान समझौताः थकी हुई बंदूकें, सहमी हुई शांति

अमेरिका-ईरान समझौते को एक बेहद पेचीदा और कड़वे रिश्ते के नए, नाजुक अध्याय की शुरुआत के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, जिसका भविष्य आज की तारीख में दोनों देश भी नहीं जानते

यूएस-ईरान समझौते के बाद खुल जाएगा होर्मुज स्ट्रेट
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर 19 जून को दस्तखत किए जाएंगे

15 जून, 2026. अमेरिका-ईरान युद्ध का 108वां दिन. अचानक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर दावा किया गया कि "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ समझौता अब पूरा हो चुका है." अमेरिकी राष्ट्रपति ने वादा किया कि 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़' से जहाजों की आवाजाही अब बिना किसी टैक्स के होगी और अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी खत्म हो जाएगी.

दूसरी तरफ, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने पुष्टि की कि आने वाले शुक्रवार यानी 19 जून को स्विट्जरलैंड में समझौते पर औपचारिक दस्तखत किए जाएंगे. ईरान के उप-विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने भी कहा कि समझौते के पाठ को अंतिम रूप दे दिया गया है. इस खबर के आते ही एशियाई शेयर बाजार झूम उठे और कच्चे तेल की कीमतें करीब 4.5 प्रतिशत से ज्यादा टूट गईं.

यह तो सिर्फ सुर्खी है लेकिन इसके नीचे जो हकीकत छिपी है वह कहीं ज्यादा पेचीदा और उलझी हुई है.

समझौते के भीतर क्या?

ईरान की 'सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद' ने पुष्टि की है कि लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाइयां तुरंत और हमेशा के लिए रोक दी जाएंगी. ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी तत्काल प्रभाव से खत्म हो जाएगी. अगले 30 दिनों के भीतर 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़' दोबारा खोल दिया जाएगा लेकिन ईरान के अपने इंतजामों के तहत.

इसके अलावा, परमाणु कार्यक्रम पर दोबारा बातचीत शुरू होने से पहले अमेरिक ईरान की फ्रीज की गई 12 अरब डॉलर की संपत्ति मुक्त करेगा. इसके बाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम के भविष्य पर फैसला करने के लिए 60 दिनों का एक बातचीत का दौर शुरू होगा.

इन सबके बीच कुछ धुंधलापन भी है. जैसे, भविष्य में होर्मुज़ स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही का सटीक ढांचा क्या होगा? यूरेनियम संवर्धन पर क्या पाबंदियां होंगी? ईरान के पास जो पहले से उच्च-संवर्धित यूरेनियम का स्टॉक मौजूद है, उसका क्या किया जाएगा? और आने वाले समय में आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने की टाइमिंग और शर्तें क्या होंगी? ये सब अभी भी रहस्य के घेरे में है.

'द न्यूयॉर्क टाइम्स' को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने खुद कबूल किया कि वे अभी भी ईरान से मोल-तोल कर रहे हैं कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को 20 साल के लिए रोकेगा या 15 साल के लिए.

जरा सोचिए, यह अमेरिका के उस पुराने अड़ियल रुख से कितना बड़ा समझौता है, जिसमें उसने ईरान के 'शून्य संवर्धन' की मांग की थी. सच तो यह है कि इस पूरे सौदे की सबसे महत्वपूर्ण शर्त वही है, जो अभी तक कागजों पर लिखी ही नहीं गई है.

क्या यह ट्रंप की हार है?

ट्रंप ने इस समझौते को "सौ फीसदी, बिना किसी शक के, पूरी और मुकम्मल फतह" घोषित किया है. लेकिन जब आप इस दावे की गहराई में उतरते हैं तो यह ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है.

यह सच है कि अमेरिका और इजरायल ने युद्ध के मैदान में बहुत बड़ी सफलताएं पाईं. उन्होंने ईरान की नौसेना, वायुसेना और हवाई रक्षा प्रणालियों को लगभग तबाह कर दिया. लेकिन इसके बावजूद, ईरान की हुकूमत टस से मस नहीं हुई. अपने कई शीर्ष कमांडरों को खोने के बाद भी आज 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़' पर ईरान का पहले से कहीं ज्यादा नियंत्रण है. अमेरिका इस जंग में जिस मकसद से उतरा था (ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकना, पूरे इलाके में उसके प्रभाव को खत्म करना और वहां की सत्ता को उखाड़ फेंकना) उनमें से एक भी लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया. जिस सरकार को गिराने की कसमें खाई जा रही थीं, आज अमेरिका उसी के साथ बैठकर समझौते पर दस्तखत कर रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि अब जो भी नया समझौता होगा, उसे यह ध्यान में रखना होगा कि ईरान की असल क्षमता का सटीक अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल हो चुका है. साथ ही, 2018 में परमाणु समझौते (JCPOA) के टूटने के बाद ईरान ने जो तकनीकी तरक्की की है, उसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सीधे शब्दों में कहें तो इस युद्ध ने ईरान के न्यूक्लीयर इन्फ्रास्ट्रक्चर को भले ही कुछ समय के लिए पीछे धकेल दिया हो लेकिन राजनीतिक रूप से उसे परमाणु बम बनाने के लिए और ज्यादा उकसा दिया है.

इसमें इतिहास का एक गहरा और ढांचागत व्यंग्य छुपा है. ट्रंप ने 2018 में जिस JCPOA को खुद अपने हाथों से तोड़ा था, 2026 में एक भयानक जंग लड़ने के बाद आज वह उसी समझौते के अलग स्वरूप को स्वीकार करने के लिए मजबूर है. इसमें न तो वह पुरानी अंतरराष्ट्रीय साझीदारी है, न ही पुराना निरीक्षण रिकॉर्ड और सामने खड़ा ईरान पहले से कहीं ज्यादा जख्मी और ज्यादा जिद्दी है.

इसे जीत नहीं कहा जा सकता. यह तो बस अरबों डॉलर फूंक कर वापस उसी मोड़ पर आ जाना है, जहां से शुरुआत हुई थी.

हालांकि इसे सिर्फ ट्रंप की हार कहना भी बेईमानी होगी. युद्धविराम हो चुका है. होर्मुज़ का रास्ता खुल रहा है. अमेरिका और दुनिया की अर्थव्यवस्था का जो खून बह रहा था, उसे रोकने का एक मौका मिला है. ट्रंप के करीबी जो नवंबर के मध्यावधि चुनावों से पहले ट्रंप की गिरती रेटिंग से परेशान हैं, यह सौदा एक संजीवनी बूटी की तरह है.

यह सौदा रणनीतिक रूप से कितना सही है, यह तो विश्लेषक तय करेंगे लेकिन ट्रंप का ध्यान सिर्फ इस बात पर है कि क्या यह सौदा नवंबर से पहले उनकी गिरती लोकप्रियता को बचा पाएगा.

दुनिया के लिए मायने

'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़' पूरी दुनिया के कुल तेल व्यापार का 20 प्रतिशत और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का 30 प्रतिशत हिस्सा संभालता है. जब ईरान ने इस नस को दबाया तो उसका दर्द पूरी दुनिया ने महसूस किया. बर्मिंघम में पेट्रोल की बढ़ती कीमतें हों या दक्षिण एशिया में खाने-पीने की चीजों की महंगाई, हर जगह हाहाकार मचा.

हालांकि इस सौदे की भनक लगते ही पेट्रोल के दाम और होम लोन की ब्याज दरें गिरनी शुरू हो गई थीं. जुलाई में कई देशों के घरेलू ऊर्जा के बिल तो बढ़ेंगे लेकिन सर्दियों से ठीक पहले जिस भारी बढ़ोतरी का डर था, वह अब टल सकती है. इसके अलावा, दक्षिणी गोलार्ध में बुआई के सीजन और खादों की आसमान छूती कीमतों को लेकर जो चिंताएं थीं, वे अब शांत हो सकती हैं. इससे वैश्विक खाद्य संकट का खतरा कम हो जाएगा. 

एशियाई बाजारों ने इस राहत का स्वागत तुरंत किया. जापान का निक्केई बाजार 5 फीसदी से ज्यादा, दक्षिण कोरिया 5.3 फीसदी, ताइवान का बाजार 2.4 फीसदी चढ़ गया और निफ्टी में भी अच्छा उछाल देखा गया.

भारत के लिए इस खेल के मायने सीधे और गहरे थे. भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा होर्मुज़ से आता है. इस युद्ध की वजह से लगी तेल की आग ने भारत की घरेलू महंगाई को भड़का दिया था और सरकार के वित्तीय बजट को सिकोड़ दिया था. ऐसे में एक टिकाऊ समझौता नई दिल्ली के लिए बहुत बड़ी राहत लेकर आएगा. हालांकि, भारत सरकार इस बातचीत को अपनी रणनीतिक नजर से देखेगी.

लेकिन सावधानियां अभी भी जरूरी हैं. खाड़ी में फंसे सैकड़ों तेल टैंकरों के इंजन दोबारा चालू करने में वक्त लगेगा. गैस से जुड़े कारखानों को फिर से शुरू होने में महीनों का समय लग सकता है. ऊर्जा व्यवस्था को पूरी तरह सामान्य होने में कम से कम कई हफ्ते लगेंगे और यह सब तभी मुमकिन है जब शांति बनी रहे.

सौदे की खतरनाक कड़ी

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शरीफ़ ने कहा कि अमेरिका और ईरान ने "लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाइयों को तुरंत और हमेशा के लिए खत्म करने" की घोषणा की है. लेकिन दूसरी तरफ, इजरायल के रक्षा मंत्री ने साफ शब्दों में कहा है कि उनकी सेना लेबनान से पीछे नहीं हटने वाली. इजरायल के नेशनल सिक्योरिटी मिनिस्टर इतामार ने ट्वीट किया कि ट्रंप की डील हमारे लिए बाध्यकारी नहीं है. इजरायल अमेरिका के अधीन नहीं है और हम एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र हैं.

यही इस सौदे की सबसे कमजोर कड़ी है. यह युद्ध कभी भी दो देशों का नहीं था, यह हमेशा से एक त्रिकोण था. ट्रंप ने 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' से बात करते हुए अपनी नाराजगी जाहिर की कि वे इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू से बेहद गुस्से में थे क्योंकि नेतन्याहू ने ऐन वक्त पर बेरूत पर बमबारी के आदेश दे दिए थे. ट्रंप का मानना था कि इस हमले ने समझौते को आखिरी पलों में लगभग तबाह ही कर दिया था.

अगर इजरायल ने लेबनान में दोबारा कोई बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया तो ईरान होर्मुज़ पर फिर से संकट आ सकता है और उसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.

बाजार और दुनिया के राजनयिक इस उम्मीद पर बैठे हैं कि ट्रंप नवंबर के चुनावों से पहले इस मोर्चे पर दोबारा आग नहीं लगने देंगे. यह उम्मीद अपने आप में बहुत बड़ा जुआ है.

ईरान की बढ़त

ईरान के भीतर इस सौदे को एक महान विजय के रूप में मनाया जा रहा है. यह सिर्फ जनता को बहलाने का प्रोपेगैंडा नहीं है बल्कि इसके पीछे ईरान की अपनी एक गहरी रणनीतिक और वैचारिक सोच है.

ईरानी व्यवस्था के धार्मिक सिद्धांतों में यह बात रची-बसी है कि जीत का फैसला सिर्फ इस बात से नहीं होता कि आपके पास कितने हथियार हैं बल्कि इस बात से होता है कि आप अपने ईश्वरीय सिद्धांतों पर कितने अडिग रहे. इस सोच में किसी बड़े नुकसान या शहादत को भी एक आध्यात्मिक जीत में बदला जा सकता है.

अमेरिका और इजरायल की 108 दिनों की भीषण बमबारी के बाद भी अगर ईरान की सरकार और व्यवस्था बची हुई है तो उनकी नजर में यह उनकी सच्चाई की सबसे बड़ी जीत है. और इस दावे के पीछे ठोस तथ्य भी हैं.

ईरान ने आत्मसमर्पण नहीं किया है. उनके सर्वोच्च नेता आज भी सत्ता में हैं. विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ कर दिया कि ईरान अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम को अपनी ही धरती पर कमजोर करेगा.  उसे न तो किसी दूसरे देश भेजा जाएगा और न ही किसी विदेशी ताकत की निगरानी में नष्ट किया जाएगा. अगर ईरान अपनी इस बात पर अड़ा रहता है तो इसका मतलब है कि उसके पास परमाणु तकनीक, उसका ढांचा और भविष्य में दोबारा बम बनाने की क्षमता हमेशा सुरक्षित रहेगी. कह सकते हैं कि ईरान ने इस युद्ध में सिर्फ अपनी रफ्तार धीमी की है, घुटने नहीं टेके हैं.

समझौते के जितने भी मसौदे सामने आए हैं, उन सबमें कुछ बातें समान हैं: होर्मुज़ का खुलना, प्रतिबंधों से राहत और "ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दीर्घकालिक बातचीत के रास्ते खोलना."

ईरान ने अपनी कूटनीति से उस परमाणु सवाल को, जिसे अमेरिका युद्ध के जरिए हमेशा के लिए खत्म करना चाहता था, दोबारा बातचीत की मेज पर लाकर खड़ा कर दिया है. वह भी अपनी शर्तों पर. अपनी संप्रभुता बचाते हुए. इस समझौते के पाठ में एक-दूसरे की "संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान" करने और "घरेलू मामलों में दखल न देने" का साफ वादा है. यह किसी हारे हुए देश की शर्तें नहीं हो सकतीं.

ईरान का अमेरिका पर अविश्वास इस समझौते की बुनावट में साफ झलकता है. ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने कहा है कि "अंतिम बातचीत तभी शुरू होगी जब दूसरी पार्टी (अमेरिका) अपने वादों को जमीन पर पूरा करके दिखाएगी." इसका मतलब है कि ईरान तब तक परमाणु रियायतें नहीं देगा, जब तक अमेरिका पहले प्रतिबंध हटाकर उसका फ्रीज़ किया धन रिलीज़ नहीं कर देता.

ईरान 2018 के धोखे को भूला नहीं है, जब उसने JCPOA की सारी शर्तें मानी थीं और अमेरिका बिना किसी वजह के पीछे हट गया था. इस ट्रस्ट डेफिसिट की स्थिति में ईरान दोबारा पहले झुकने की गलती नहीं करेगा. कूटनीति की यह सीक्वेंसिंग ही ईरान का असली संदेश है.

नाजुक अध्याय की शुरुआत?

परमाणु मुद्दे को सुलझाने के लिए जो 60 दिनों का समय दिया गया है, वह उन सवालों के लिए बेहद छोटा है जिन्होंने दुनिया के बेहतरीन राजनयिकों को पिछले बीस सालों से उलझा रखा है. खाड़ी के उन अरब देशों  को थोड़ी राहत जरूर मिलेगी, जिन पर युद्ध के दौरान ईरानी मिसाइलें गिरी थीं. लेकिन लेबनान, हिजबुल्लाह और इस 'स्थायी युद्धविराम' का जमीन पर असली मतलब क्या होगा, इस पर अभी भी बड़े सवालिया निशान हैं.

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का कहना है कि इस समझौते में यह पूरी तरह सुनिश्चित किया गया है कि ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं बना पाएगा और अमेरिका इसकी जांच कर सकता है. लेकिन दूसरी तरफ, ईरान का कहना है कि बातचीत तभी आगे बढ़ेगी जब अमेरिका अपने वादे पूरे करेगा. ये दोनों बातें एक-दूसरे के विपरीत खड़ी दिखाई देती हैं.

इस सौदे ने कच्चे तेल के बाजार को शांत कर दिया और शेयर बाजारों में हरियाली जरूर ला दी लेकिन क्या यह इजरायल के अगले हवाई हमले, किसी नेता के दोलनभरे भाषण या यूरेनियम संवर्धन की सीमाओं पर होने वाली अगली बहस को बर्दाश्त कर पाएगा. इस सवाल का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है. 

युद्ध में थक चुके देश जब मेज़ पर बैठते हैं तो उसे कुछ लोग उसे 'शांति' कहते हैं, कुछ 'नाकामी' लेकिन जब कोई और रास्ता न बचा हो तो यही मेज़ भविष्य की नींव बनती है. लेकिन सवाल है, क्या 108 दिनों की खूनी जंग और चालीस साल की दुश्मनी के बाद दोनों देशों में वह सब्र बचा है जो बंदूक चलाने से कहीं ज्यादा मुश्किल काम के लिए चाहिए? 
इतिहास हमें सावधान रहने की सलाह देता है लेकिन इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि जब जंग की कीमत बर्दाश्त से बाहर हो जाए तो कट्टर दुश्मन भी आपस में हाथ मिलाने का रास्ता ढूंढ ही लेते हैं.

हालांकि इतिहास कभी भी उतनी सादगी और सफाई से नहीं पढ़ा जाता जितना राजनेता अपने भाषणों में दावा करते हैं. इसलिए जून 2026 के इस ट्रस्ट डेफिसिट और जरूरत से भरे अमेरिका-ईरान समझौते को एक बेहद पेचीदा और कड़वे रिश्ते के नए, नाजुक अध्याय की शुरुआत के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, जिसका भविष्य आज की तारीख में दोनों देश भी नहीं जानते.

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