COP28 के जरिए जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में गरीब देश बन पाएंगे भागीदार?
यूएई में हो रही COP28 की बैठक में क्लाइमेट फाइनेंस पर चर्चा होगी. जिसके तहत गरीब और विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए फंड देने के लिए रणनीति बनाई जाएगी

दुनिया के टॉप तेल उत्पादक देशों में शामिल संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बैठक हो रही है. इस बैठक का नाम है COP28 (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज 28). यूएई के उद्योग और उन्नत प्रौद्योगिकी मंत्री सुल्तान अल जबर बैठक की अध्यक्षता कर रहे हैं. सुल्तान अल जबर यूएई की सरकारी तेल कंपनी के मालिक हैं. दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन पर होने वाली बहसों के बीच ये एक ऐसी बैठक है जिसमें आगे की दशा और दिशा तय हो सकती है. साथ ही कई ज़रूरी फैसले लिए जा सकते हैं.
COP28 की बैठक में क्लाइमेट फाइनेंस पर चर्चा होगी. जिसके तहत गरीब और विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए फंड देने के लिए रणनीति बनाई जाएगी. दूसरे शब्दों में कहें तो यह बैठक जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में गरीबों की भागीदारी सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभा सकती है. 2022 में मिस्र में हुए COP27 की बैठक में क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर अहम निर्णय लिया गया था. 200 देशों ने एक समझौता किया था जिसके तहत एक फंड बनाने का आदेश दिया गया था.
अब COP28 की बैठक में ये तय किया जाएगा कि किस देश को कितना फंड दिया जाएगा. साथ ही ये भी तय होगा कि कौन-कौन से देश मुआवजा देने के लिए फंड जमा करेंगे. इस हवाले से पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली एनजीओ सीईईडब्ल्यू (Council on Energy, Environment and Water) के सीईओ डॉ. अरुणाभा घोष कहते हैं, "ग्लोबल साउथ के लिए फंड को इस तरह उपलब्ध कराने की जरूरत है कि वह न केवल किफायती, बल्कि दीर्घकालिक और सुविधाजनक हो. दूसरी तरफ अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए ग्लोबल नॉर्थ (विकसित देशों) को अपनी जीवन शैली पर गंभीरता से आत्ममंथन करने के साथ-साथ अपने वादों को जमीन पर उतारना होगा."
जलवायु परिवर्तन के लिए प्रमुख फैक्टर हैं फॉसिल फ्यूल और कार्बन एमिशन. बैठक में इससे निजात पाने पर भी चर्चा होगी. डॉ. अरुणाभा घोष मानते हैं, "जलवायु परिवर्तन को लेकर होने वाली बैठकों को सफल बनाने के लिए तीन चीज़ें ज़रूरी हैं- एजेंडा तय हो, एजेंडा के लिए प्रक्रिया निश्चित हो और ज़मीन पर उसे कायदे से उतारा जाए." उन्होंने जलवायु के खतरों को लेकर कहा, "2023 ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि क्यों अब क्लाइमेट जस्टिस, क्लाइमेट एक्शन और क्लाइमेट फंड को आगे के लिए नहीं टाला जा सकता. यह साल न केवल रिकॉर्ड स्तर पर सबसे गर्म वर्ष रहा है बल्कि बाढ़, सूखे और जंगलों की आग जैसी जलवायु प्रेरित आपदाओं के साथ-साथ भू-राजनीतिक रूप से भी अशांत रहा है."
बीते कुछ वर्षों में दुनिया भर में बदलता मौसम चिंता का सबब बना हुआ है. जिसका सिर्फ एक कारण है- जलवायु परिवर्तन. COP28 की बैठक ऐसी स्थिति में बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यहां से कुछ ठोस योजना बनाकर उसके जरिए इस पर काबू पाया जा सकता है. लेकिन इसके लिए सबसे ज़रूरी है तय एजेंडा के मुताबिक सभी देश कार्य भी करें. ये जिम्मेदारी खासतौर पर विकसित देशों की है. जो अंधाधुंध विकास के नाम पर इसे नुक्सान पहुंचा रहे हैं.
जलवायु परिवर्तन को लेकर हो रही इस बैठक में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हो रहे हैं. पीएम मोदी तीसरी COP की बैठक में हिस्सा ले रहे हैं. उन्होंने 2015 में पेरिस में हुए COP21 में पहली बार हिस्सा लिया था. इसी बैठक में हुए समझौते को पेरिस समझौता का नाम दिया गया. जिसके तहत बढ़ते ग्लोबल टेम्प्रेचर को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की बात हुई थी. इसका मकसद ग्लोबल वॉर्मिंग को कम करना था.