ईरान पर ट्रंप की नई पाबंदियां क्या भारत की मुश्किल और बढ़ाने वाली हैं?
ईरान के साथ अपने व्यापार को बचाने के लिए भारत को 25 फीसदी अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ का का सामना करना पड़ सकता है

वेनेजुएला के बाद ईरान दुनियाभर में सुर्खियों में है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में प्रदर्शनकारियों के साथ एकजुटता दिखाई है, जिन पर अधिकारियों की तरफ से बेहद सख्त कार्रवाई की जा रही है. इस बीच, दुनिया में इस बात पर भी बहस तेज हो गई है कि क्या वहां तेजी से बदलती स्थिति वाशिंगटन को इस बार एक पश्चिम एशियाई देश में सैन्य अभियान चलाने को प्रेरित करेगी.
बहरहाल, ट्रंप प्रशासन के नए फैसले ने वैश्विक व्यापार परिदृश्य को और भी जटिल बना दिया है, जिसके तहत ईरान के साथ व्यापार करने वाले सभी देशों पर 25 फीसद अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाएगा.
भारत ईरान से तेल नहीं खरीदता, क्योंकि बतौर राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान 2019 में अमेरिका की तरफ से लगाए गए प्रतिबंधों के बाद उसने ऐसा करना बंद कर दिया था. हालांकि, तेहरान नई दिल्ली का पांचवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. ट्रंप प्रशासन के ताजा फैसले का मतलब है कि अमेरिका भारत पर जुर्माना लगा सकता है, जिससे भारतीय निर्यात पर टैरिफ बढ़कर 75 फीसद हो जाएगा. भारत पर पहले से ही 25 फीसद टैरिफ और रूसी कच्चे तेल की खरीद पर 25 फीसद का अतिरिक्त जुर्माना प्रभावी है.
वैसे, एक बात तो साफ है कि इसके पीछे ट्रंप का इरादा यही है कि रूस और ईरान दोनों को वित्तीय रूप से कमजोर कर दिया जाए, क्योंकि इस बारे में वाशिंगटन का कहना है कि दोनों देश इस धन का उपयोग सैन्य अभियानों पर कर सकते हैं. ताजा घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए और अधिक अनिश्चिततापूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी है, जो पहले ही अमेरिकी टैरिफ की मार से हलकान है.
ऐसी संभावना कम ही नजर आती है कि ईरान के साथ अपने द्विपक्षीय व्यापार की रक्षा के लिए भारत अमेरिका को होने वाले अपने 86 अरब डॉलर (7.8 लाख करोड़ रुपये) के निर्यात पर 25 फीसद अतिरिक्त टैरिफ का जोखिम उठाएगा. इसका मतलब यह होगा कि ईरान के साथ भारत के व्यापार पर तत्काल असर दिखाई देगा.
2024-25 में ईरान के साथ भारत का व्यापार 1.68 अरब डॉलर (15,169 करोड़ रुपये) का रहा- जिसमें 1.24 अरब डॉलर (11,196 करोड़ रुपये) का निर्यात और 440 मिलियन डॉलर (3,973 करोड़ रुपये) का आयात शामिल है. पिछले कुछ वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार की वृद्धि दर घटती रही है, और वित्त वर्ष 2025 में यह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 9 फीसदी कम हो गई. भारत की तरफ से ईरान को खासकर बासमती चावल, चाय, चीनी, ताजे फल और दवाएं/औषधियां निर्यात की जाती हैं, जबकि सेब, पिस्ता, खजूर और कीवी आदि का आयात किया जाता है.
ईरान के लिए भारत चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है, जो उसके कुल चावल आयात में दो-तिहाई भागीदारी रखता है. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कई भारतीय आपूर्तिकर्ता ईरानी खरीदारों के साथ नए कॉन्ट्रेक्ट करने से कतरा रहे हैं. एक प्रमुख चावल निर्यातक के थोक निर्यात प्रमुख ने रॉयटर्स को बताया, “ट्रंप के फैसले के तहत प्रस्तावित 25 फीसदी टैरिफ भारतीय बासमती चावल क्षेत्र के लिए एक अतिरिक्त चुनौती बन गया है.” रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक नई दिल्ली के एक निर्यातक का कहना है, “हम तो पिछले दो महीनों में भेजे गए चावल के भुगतान को लेकर भी चिंतित हैं. कुछ मामलों में खरीदारों का कहना है कि उन्हें पूरी मात्रा प्राप्त नहीं हुई; और कुछ मामलों में विरोध प्रदर्शनों के कारण उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा है.”
ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार चीन है, जिसका ईरानी निर्यात 2022 में 22 अरब डॉलर आंका गया था, जबकि चीन से ईरान में आयात 15 अरब डॉलर रहा था. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आकलन करने वाली कंपनी केप्लर के मुताबिक, चीन ने 2025 में ईरान से निर्यात किए गए तेल का 80 फीसद से अधिक हिस्सा खरीदा. इसलिए, अमेरिकी प्रतिबंध दो आर्थिक महाशक्तियों अमेरिका और चीन को वैश्विक व्यापार मंच पर एक बार फिर आमने-सामने खड़ा कर सकते हैं.
हालांकि, अमेरिका की तरफ से चीन के खिलाफ कड़े कदम उठाने की गुंजाइश कम ही है. ठीक उसी तरह जैसे उसने पिछली गर्मियों में चीन पर टैरिफ नहीं लगाए थे, जबकि बीजिंग रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है. ईरान के अन्य बड़े व्यापारिक साझेदार तुर्की, जर्मनी, दक्षिण कोरिया और जापान हैं.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के दक्षिण-पश्चिमी तट पर स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह के भारतीय इस्तेमाल को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है. यह बंदरगाह अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों तक पहुंचने का प्रवेश द्वार है. भारत पिछले साल ईरान के साथ हस्ताक्षरित एक दीर्घकालिक समझौते और अप्रैल तक वैध छह महीने की अमेरिकी प्रतिबंध छूट के तहत इस बंदरगाह का संचालन कर रहा है.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहती है कि फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ये छूट नए अमेरिकी टैरिफ से संरक्षण प्रदान करेगी या नहीं. कुल मिलाकर, व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ईरान पर प्रतिबंधों के मुद्दे पर संयमित रुख अपनाएगा, क्योंकि अमेरिका के साथ जारी व्यापार वार्ता को खतरे में नहीं डालना चाहेगा.