क्यों मिलते हैं बिहार से गुजरने वाली ट्रेनों में इतने कछुए!

पूर्वी उत्तर प्रदेश से बंगाल तक फैला है तस्करी का जाल, कछुओं के मांस के शौकीनों ने बिहार को बनाया ट्रांजिट रूट

सांकेतिक फोटो

पिछले हफ्ते पटना जंक्शन से गुजर रही एक ट्रेन में रेलवे पुलिस को थैलों में भरे 88 कछुए मिले. ये कछुए 10 से 15 किलो वजन वाले बड़े आकार के थे, जिन्हें एक महिला बनारस से बंगाल ले जा रही थी. मीडिया को जानकारी देने के लिए रेलवे पुलिस ने जब प्लेटफॉर्म पर रेत बिछाकर इन कछुओं को वहां रखा तो उन्हें देखने के लिए वहां लोगों का बड़ा हुजूम जुट गया. 

बिहार के लोगों के लिए अब कछुए दुर्लभ जीवों की श्रेणी में आ गए हैं. यहां नदियों का जाल तो है, मगर गंगा समेत बिहार की किसी भी नदी में अब इतने कछुए नहीं बचे कि वे आसानी से नजर आ सकें. मगर बिहार से गुजरने वाली रेलगाड़ियों में इन दिनों रेलवे पुलिस को बड़ी संख्या में कछुए मिल रहे हैं. 

वहीं एक घटना से एक हफ्ते पहले यानी 13 मार्च को छपरा स्टेशन पर रेलवे पुलिस ने आम्रपाली एक्सप्रेस से 110 कछुए बरामद किए थे. वहीं, इसी साल 18 जनवरी को सासाराम स्टेशन पर 11 बोरियों में 311 कछुए मिले. बीते साल दिसंबर में गया रेलवे स्टेशन पर दस दिन के भीतर तीन बार में कुल 224 कछुए बरामद हुए. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि बिहार से गुजरने वाली ट्रेनों में इतनी बड़ी संख्या में कछुए क्यों मिल रहे हैं.

इन कछुओं को पूर्वी उत्तर प्रदेश की नदियों से पकड़ा जाता है

अपनी धीमी चाल और लंबी आयु के लिए प्रसिद्ध सरीसृप वर्ग का यह प्राणी बिहार की नदियों में बहुत कम बचा है. दुनिया भर में कछुओं की 300 से अधिक प्रजातियां हैं, जिनमें से भारत में सिर्फ 29 पाई जाती हैं. बिहार से सटे पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों, जैसे सरयू और घाघरा नदी में ये बहुतायत में मिलते हैं. इनमें छोटे आकार के 'इंडियन फ्लैपशेल' और बड़े आकार के 'इंडियन सॉफ्टशेल' दोनों शामिल हैं. वन्यजीव संरक्षण से जुड़े जानकार बताते हैं कि इन कछुओं की भारी मांग बंगाल और बांग्लादेश के इलाकों में है, जहां इनका मांस पसंद किया जाता है. इसीलिए यूपी के कछुए बंगाल जाने वाली ट्रेनों के जरिए वहां भेजे जाते हैं और बिहार सिर्फ उनके आवागमन का रास्ता है.

वाइल्ड लाइफ ट्रैफिकिंग पर काम करने वाली संस्था 'ट्रैफिक इंडिया' से जुड़े रहे अभिषेक बताते हैं, “यह बड़ी ही दिलचस्प बात है कि यहां कछुए पकड़े जा रहे हैं लेकिन बिहार इस तस्करी का न तो सोर्स स्टेशन है और न ही डेस्टिनेशन. बिहार की नदियों में अब इतने कछुए नहीं मिलते. कछुए सबसे अधिक पूर्वी उत्तर प्रदेश की घाघरा और सरयू नदी में मिलते हैं. वहां बहराइच, लखीमपुर खीरी, बलरामपुर और गोंडा में इनका शिकार होता है. इसके बाद इन्हें मुगलसराय जंक्शन लाया जाता है, जहां से तीन अलग-अलग रूट की ट्रेनों से इन्हें बंगाल भेजा जाता है. पहला रूट छपरा, दूसरा गया और तीसरा पटना से होकर गुजरता है. ये तीनों रूट बंगाल के वर्धमान में मिलते हैं.”

बरामद किए गए कछुए

अभिषेक के अनुसार, “इन कछुओं को वर्धमान में उतारा जाता है, जहां से इन्हें बंगाल के अन्य हिस्सों और बांग्लादेश तक भेजा जाता है. उस इलाके के बाजारों में कछुए आम बिकते नजर आ जाएंगे. इन्हें जनरल बोगियों में बोरों के अंदर 20 से 25 की संख्या में भरकर ले जाया जाता है.”

तस्करी की सबसे बड़ी वजह इनका मांस है. बंगाल में कछुए के नाखून छोड़कर लगभग हर अंग खाया जाता है. यहां 'टर्टल सूप' भी काफी मशहूर है. छोटे कछुओं का मांस स्वादिष्ट माना जाता है, हालांकि बड़े कछुए भी खाए जाते हैं. कुछ लोग इन्हें एक्वेरियम में रखने के लिए भी खरीदते हैं, लेकिन व्यापार का वह बहुत छोटा हिस्सा है. असल खपत मांसाहार के लिए ही है, इसी कारण पूर्वी उत्तर प्रदेश में इनका बड़े पैमाने पर शिकार होता है.

इस बात से 'वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया' के सीईओ जोस लुइस भी सहमत हैं. वे कहते हैं, “यूपी पुलिस की एसटीएफ ने इस तस्करी को रोकने की बहुत कोशिश की है, मगर यह सिलसिला जारी है. जब तक बंगाल में इसकी मांग बनी रहेगी, इसे रोकना मुश्किल होगा. पहले ये कछुए दिल्ली तक तस्करी किए जाते थे, लेकिन अब इनका मुख्य बाजार बंगाल और बांग्लादेश ही है. कई लोगों को लगता है कि कछुए के मांस में औषधीय गुण होते हैं, इसलिए भी वे इसे खाते हैं.”

कई लोगों का मानना है कि कछुए का मांस खाने से उन्हें भी कछुए जैसी लंबी आयु प्राप्त होगी. लुइस का मानना है कि इसके लिए लोगों को जागरूक करना सबसे जरूरी है. अभिषेक बताते हैं, “लोगों को कछुए का पारिस्थितिक महत्व पता नहीं है. उन्हें नदियों का 'सफाईकर्मी' माना जाता है. वे मृत जीवों और शवों को खाकर पानी साफ रखते हैं, इसलिए उन्हें बचाना बहुत जरूरी है.” पारंपरिक ज्ञान भी यही मानता रहा है कि कछुए पानी शुद्ध करते हैं, इसी कारण पुराने समय में कुओं में कछुए छोड़े जाते थे.

कछुओं को पानी का 'सफाईकर्मी' माना जाता है

पिछले कुछ वर्षों में बिहार में कछुओं की बरामदगी को देखते हुए भागलपुर में 'कछुआ पुनर्वास केंद्र' बनाया गया है. अभिषेक बताते हैं कि तस्करी के दौरान बोरियों में ठूंसकर ले जाने से कई कछुए मर जाते हैं या उन्हें 'शैलरॉट' जैसी बीमारियां हो जाती हैं. बरामदगी के बाद उन्हें इलाज की जरूरत होती है, जिसके लिए भागलपुर का यह सेंटर काम कर रहा है.

बिहार में बड़े पैमाने पर बरामद होने का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि अब इन कछुओं को बिहार की नदियों और तालाबों में छोड़ा जाने लगा है. गंडक नदी के ऊपरी इलाके और पटना जू में भी इन्हें रखा गया है. भागलपुर पुनर्वास केंद्र में स्वस्थ होने के बाद कछुओं को गंगा नदी में छोड़ दिया जाता है. इससे बिहार की नदियों में कछुओं के दोबारा बसने की संभावना बढ़ी है, हालांकि यह अभी शुरुआती चरण में है.

अभिषेक एक महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाते हैं. वे कहते हैं, “अक्सर कछुओं की बरामदगी पर कहा जाता है कि 'लाखों का माल' पकड़ा गया, मगर यह सच नहीं है. बंगाल के बाजार में कछुए के मांस की कीमत लगभग सात सौ रुपए ही है. इस पूरे व्यापार में बहुत बड़ा मुनाफा नहीं है और इससे ज्यादातर गरीब लोग, जैसे यूपी के मछुआरे और बंगाल के मछली विक्रेता ही जुड़े हैं. लेकिन चूंकि हर साल बड़ी संख्या में कछुए मारे जा रहे हैं, इसलिए इस पर्यावरणीय खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.”

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