मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति पर क्यों मोदी सरकार के बनाए कानून की समीक्षा करेगा सुप्रीम कोर्ट?
मौजूदा सीईसी राजीव कुमार 18 फरवरी को रिटायर होने वाले हैं. लेकिन नए सीईसी की नियुक्ति से पहले सुप्रीम कोर्ट 4 फरवरी को विवादित ECI सिलेक्शन कानून की समीक्षा करेगा

फरवरी की 18 तारीख को मौजूदा मुख्य निर्वाचन आयुक्त यानी CEC राजीव कुमार रिटायर होंगे. इसके बाद नए कानून के तहत देश के अगले CEC की नियुक्ति होनी है, लेकिन इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने CEC की नियुक्ति से जुड़े कानून की समीक्षा करने का फैसला किया है.
इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट 4 फरवरी को CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) कानून, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा. देश में एक लंबे समय से CEC व अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर न्यायपालिका और संसद के बीच तनाव देखने को मिला है.
दिसंबर 2023 में जब यह कानून लागू हुआ, तब एक संस्था के रूप में भारत के चुनाव आयोग (ECI) की आजादी और निष्पक्षता पर कई सवाल उठे थे. तब इसने देश में एक तीखी बहस को भी जन्म दिया. विवाद के केंद्र में था कि कानून के तहत CEC और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति के लिए जिस चयन पैनल के गठन की बात की गई थी उसमें से मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखा गया था.
चुनाव और भारतीय लोकतंत्र पर रिसर्च करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने जस्टिस सूर्यकांत, दीपांकर दत्ता और उज्ज्वल भुइयां की पीठ को बताया कि मौजूदा CEC राजीव कुमार 18 फरवरी को रिटायर होने वाले हैं. राजीव के बाद अगले CEC की नियुक्ति मौजूदा कानून के तहत ही की जाएगी, जब तक कि अदालत उसमें हस्तक्षेप न करे.
इसके बाद यह देखते हुए कि मामला न्यायिक फैसले और विधायी प्राधिकरण के बीच टकराव की स्थिति पैदा करता है, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, "हम इस पर 4 फरवरी को सुनवाई करेंगे."
यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने ECI के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ी चिंताओं का समाधान किया है. साल 2015 में अनूप बरनवाल ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की थी जिसमें CEC और EC की नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र, कॉलेजियम जैसी प्रणाली की स्थापना की मांग की गई थी.
इस तरह की मांग इसलिए की गई थी, क्योंकि आजादी के बाद से ही इस तरह का कोई कानून अस्तित्व में नहीं था. नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ी जो प्रथा चली आ रही थी उसके तहत प्रधानमंत्री CEC और EC के नामों की सिफारिश राष्ट्रपति से करते थे, और फिर राष्ट्रपति उनकी नियुक्ति करते थे. बरनवाल सहित याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में तर्क दिया कि इस प्रक्रिया ने ECI की स्वायत्तता को कमजोर किया, और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की अखंडता को खतरे में डाला है.
सुप्रीम कोर्ट (SC) ने भी पाया कि संविधान को अपनाने के बाद से 73 सालों तक यह विधायी अंतर बना रहा. SC ने इस बात पर जोर दिया कि एक जीवंत लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की स्वायत्तता अहम है. न्यायालय ने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र का समर्थन करने वाली कई संस्थाएं जैसे कि राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार आयोग, केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI), सूचना आयोग और स्थानीय निकाय अपने सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र मैकेनिज्म (तानाबाना) रखते हैं.
पिछले ही साल की बात है. 2 मार्च को जस्टिस केएम जोसेफ की अगुआई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मामले पर अपना फैसला सुनाया. इसमें अदालत ने ECI में नियुक्तियों के मामले में राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI की सदस्यता वाली एक समिति के गठन का निर्देश दिया. यह एक अंतरिम व्यवस्था थी और तब तक लागू रहनी थी जब तक संसद इस मुद्दे पर कानून नहीं बना लेती.
अपने फैसले में पीठ ने इस बात पर जोर दिया था कि ECI की "स्वतंत्रता, निष्पक्षता और ईमानदारी" की रक्षा करने और इस अहम संस्था में नियुक्तियों पर सरकार के "खास नियंत्रण" को खत्म करने के लिए डायवर्स लीडरशिप (विविध नेतृत्व) वाली समिति जरूरी है.
तब SC के इस फैसले की व्यापक प्रशंसा हुई थी और इसे आजाद और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम कदम करार दिया गया. लेकिन इस फैसले ने सरकार को भी चौकन्ना करने का काम किया और केंद्र ने त्वरित प्रतिक्रिया दी. SC ने मार्च, 2023 में अपना फैसला सुनाया था और उसी साल अगस्त में केंद्र सरकार ने मॉनसून सत्र में राज्यसभा में एक बिल भी पेश कर दिया जिसका नाम था मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) विधेयक, 2023. इस विधेयक पर राज्यसभा में जमकर हंगामा हुआ.
यह विधेयक कानून बना और इसने सुप्रीम कोर्ट के CEC से जुड़ी प्रस्तावित चयन प्रणाली को पलटने का काम किया. केंद्र सरकार के इस कानून के तहत अब CEC और अन्य EC की नियुक्ति उन लोगों में से की जानी थी जो भारत सरकार के सचिव के पद के समकक्ष पद पर हैं या रह चुके हैं.
लॉ के मुताबिक, केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री की अध्यक्षता में एक सर्च कमिटी बनाई जाएगी जो सिलेक्शन कमिटी के विचार करने के लिए पांच उम्मीदवारों का एक पैनल तैयार करेगी. उस सिलेक्शन कमिटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री होंगे. यही सिलेक्शन कमिटी राष्ट्रपति के पास उम्मीदवारों के नामों की सिफारिश करेगी जिसके आधार पर राष्ट्रपति उनकी नियुक्ति करेंगे.
इस कानून की वजह से दो मुख्य चीजें हुईं. पहला- विधि के तहत CEC और EC की नियुक्ति के लिए एक औपचारिक प्रक्रिया शुरू हुई. दूसरा, इसने अनूप बरनवाल मामले में स्थापित चयन प्रक्रिया से CJI यानी मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया. इसके बाद इस पर खूब हो हल्ला मचा. लोगों ने इस कानून को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल कीं.
कानून को चुनौती देने और इसे निलंबित करने की मांग वाली याचिका के जवाब में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने 12 जनवरी, 2024 को इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. इसके बाद विवाद और बढ़ा जब मार्च 2024 में सरकार ने इस कानून के प्रावधानों के तहत दो नए ईसी - ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू - की नियुक्ति की. इन नियुक्तियों की तब खूब आलोचना हुई और याचिकाकर्ताओं ने इसमें प्रणालीगत अनियमितता का आरोप लगाया.
तत्कालीन विपक्ष के नेता और सिलेक्शन कमिटी के सदस्य अधीर रंजन चौधरी ने दावा किया कि उन्हें शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों का मूल्यांकन करने के लिए बहुत कम समय दिया गया था. इन आरोपों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि संसदीय कानूनों पर "सामान्य रूप से" रोक नहीं लगाई जाती है. इस फैसले ने एक तरह से नियुक्तियों को आगे बढ़ाने का काम किया, पारदर्शिता संबंधी चिंताएं अभी भी अनसुलझी ही रहीं.
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि सरकार ने जिस जल्दबाजी और पारदर्शिता की कमी के साथ इन दोनों EC की नियुक्तियों को अंजाम दिया, उससे यह परेशान करने वाली धारणा बनी कि दोनों रिटायर्ड आईएएस अधिकारियों का सरकार के साथ मेलजोल है. हालांकि SC ने ईसी सुखबीर सिंह संधू और ज्ञानेश कुमार की नियुक्तियों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.
CEC और EC कानून को कई आधारों पर चुनौती दी गई है. कांग्रेस नेता जया ठाकुर और ADR सहित याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले को कमजोर करता है. आलोचकों का मानना है कि चयन पैनल से सीजेआई को हटाने से शक्ति का संतुलन कार्यपालिका के पक्ष में झुक जाता है, जिससे संभावित रूप से ईसीआई की निष्पक्षता से समझौता हो सकता है.
ADR का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रशांत भूषण ने बताया कि यह कानून सरकार को नियुक्ति प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका प्रदान करता है, जो संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन है. वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन जैसे अन्य लोगों का कहना है कि चयन प्रणाली में ऐसा मौलिक बदलाव केवल संविधान संशोधन के जरिए ही हासिल किया जा सकता है, न कि सामान्य कानून के माध्यम से.
ऐतिहासिक रूप से देखें तो मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सिफारिश के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती रही है, हालांकि इस प्रक्रिया की अक्सर राजनीतिक हस्तक्षेप के खिलाफ सुरक्षा उपायों की कमी के लिए आलोचना की जाती रही. संविधान का अनुच्छेद-324 कहता है कि केंद्रीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त सहित कुल तीन लोग शामिल होंगे, और इनकी नियुक्ति किसी भी संसदीय कानून के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी.
हालांकि, सीईसी और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) कानून, 2023 कानून बनने से पहले तक जो लॉ था, वो सिर्फ सीईसी और ईसी की सेवा शर्तों को ही एड्रेस करता था जबकि नियुक्ति प्रक्रिया का उसमें कोई जिक्र नहीं था. नतीजतन, नियुक्तियां पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा की जाती रही, जिसमें चयन प्रक्रिया में स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए कोई औपचारिक प्रावधान नहीं था.
चुनाव सुधारों पर दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और विधि आयोग ने अपनी 255वीं रिपोर्ट (2015) में इस बात की सिफारिश की थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता या लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता वाले कॉलेजियम द्वारा की जानी चाहिए. इन्ही सिफारिशों पर एक्शन लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए "पूर्ण न्याय" देने की बात की, और निर्देश दिया कि संसद द्वारा उचित कानून बनाए जाने तक ऐसी ही एक समान समिति नियुक्तियों की देखरेख करेगी.
केंद्रीय चुनाव आयोग यानी ईसीआई संसद, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है. सरकार ने नियुक्ति प्रक्रिया को औपचारिक बनाने की दिशा में एक जरूरी कदम बताते हुए कानून का बचाव किया है. सरकार का तर्क है कि विपक्ष के नेता को शामिल करने से राजनीतिक संतुलन सुनिश्चित होता है जबकि कैबिनेट मंत्री की मौजूदगी कार्यपालिका की जवाबदेही को दर्शाती है. इसके अलावा, सरकार इस बात पर जोर देकर कहती है कि कानून संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है, और संसद के विधायी अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए.
हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों और सिविल सोसाइटी संगठनों ने नए कानून के निहितार्थों के बारे में चिंता जताई है. आलोचकों का तर्क है कि सीजेआई की जगह पर कैबिनेट मंत्री को लाना संस्थागत स्वतंत्रता के सिद्धांत को कमजोर करता है.
अब जबकि सुप्रीम कोर्ट 4 फरवरी को दलीलें सुनने के लिए तैयार है, यह मामला भारत के लोकतंत्र में शक्ति संतुलन के बारे में बुनियादी सवाल उठाता है. न्यायालय का फैसला न केवल मुख्य चुनाव आयुक्त कानून की संवैधानिकता को निर्धारित करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि संवैधानिक सिद्धांतों को फिर से परिभाषित करने में विधायी एक्शन कितनी दूर तक जा सकती है.