भारतीय राजनीति में अब जनसंख्या नियंत्रण मुश्किलों भरा सवाल क्यों बन गया?

कुछ राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण के नियमों का खत्म होना RSS की सोच, कांग्रेस का जाति वाला गुणा-गणित और जनसांख्यिकीय लाभ वाली बहस के टकराव को दिखाता है

Roll Back Population Control
भारत की जनसंख्या 2050 के दशक की शुरुआत तक लगभग 1.65 अरब तक पहुंच जाएगी

हाल ही में महाराष्ट्र के पंचायत चुनावों से पहले एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई. एक नाई सरपंच बनने के लिए चुनाव लड़ना चाहता था, लेकिन महाराष्ट्र के नियम के अनुसार दो से ज्यादा बच्चों वाले व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता.

इस दो-बच्चा नियम को पूरा करने के लिए उसने कथित तौर पर अपनी 6 साल की जुड़वां बेटियों में से एक की हत्या कर दी. महाराष्ट्र पुलिस के मुताबिक, नांदेड़ जिले के केरूर गांव का रहने वाला नाई पांडुरंग कोंडमंगले (28) दो बेटियों और एक बेटे का पिता था.

उसने अपनी बेटी प्राची को तेलंगाना के निजामाबाद जिले की निजामसागर नहर में धक्का देकर मार डाला. पुलिस ने उसे और साजिश में शामिल मौजूदा सरपंच गणेश शिंदे को गिरफ्तार कर लिया है. उसने सरपंच चुनाव लड़ने के लिए ऐसा कदम उठाया था. यह भयावह घटना उन कई मामलों में से एक है जो भारतीय परिवारों में दो-बच्चा नियम के दबाव के कारण सामने आ रहे हैं.

एक ओर जहां कुछ राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण से जुड़े नियमों का पालन करने के लिए गर्भपात, तीसरे बच्चे को गोद देने या आधिकारिक दस्तावेजों में परिवार के आकार के बारे में झूठ बोलने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं. वहीं, कई राज्यों में जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए कानूनी प्रतिबंध लागू करने के लगभग तीन दशक बाद अब सरकार इस नीति से पीछे हटने का मन बना रही है.  

राजस्थान ने हाल ही में दो बच्चों के नियम को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. इस राज्य में यह नियम 1990 के दशक की शुरुआत से लागू था और इसके तहत दो से अधिक बच्चों वाले लोग स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य थे.

राज्य सरकार ने पंचायती राज और नगरपालिका कानूनों में संशोधन शुरू कर दिया है, जिससे देश के सबसे लंबे समय से चले आ रहे जनसंख्या नियंत्रण उपायों में से एक को प्रभावी रूप से समाप्त किया जा रहा है. असम ने चरणबद्ध तरीके से इस नियम को खत्म करने का विकल्प चुना है.

दो बच्चों के नियम को पूरी तरह समाप्त किए बिना, इसने इसमें कानून में ढील दी है. इसके तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, चाय बागान समुदायों और कुछ स्वदेशी समूहों को तीन बच्चों तक की अनुमति दी गई है, जबकि सरकारी नौकरियों, चुनावों और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े प्रोत्साहनों के लिए उनकी पात्रता बरकरार रखी गई है.

इन सभी निर्णयों को समग्र रूप से देखने पर न केवल प्रशासनिक सुधार का संकेत मिलता है, बल्कि राजनीतिक सोच में भी बदलाव देखने को मिलता है. एक ऐसा बदलाव जिसमें जनसंख्या को विकासात्मक चुनौती के बजाय चुनावी और पहचान की राजनीति में अहम फैक्टर के रूप में देखा जाता है.

भारत की जनसंख्या से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े

भारत वर्तमान में विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश है. मौजूदा अनुमानों के अनुसार देश की जनसंख्या 2050 के दशक की शुरुआत तक लगभग 1.65-1.7 अरब तक पहुंच जाएगी, जिसके बाद इसमें स्थिरता आने और धीरे-धीरे आबादी तेजी से घटने की संभावना है. जनसंख्या में गिरावट आने में अभी कई दशक लगेंगे और आदर्श 70 करोड़ की संख्या तक पहुंचने में भी दशकों का समय लग सकता है.

वर्तमान स्तर पर भारत की जनसंख्या घनत्व नागरिक बुनियादी ढांचे पर अत्यधिक दबाव डाल रही है. भीड़भाड़ वाले शहर, प्रदूषित हवा, यातायात जाम, खस्ताहाल सार्वजनिक परिवहन, सिकुड़ते रहने के स्थान, स्कूलों पर अत्यधिक दबाव और शिक्षा की गिरती गुणवत्ता रोजमर्रा की हकीकत हैं. इसके अलावा, प्रति व्यक्ति आय कम बनी हुई है. गरीबी सूचकांक लगातार उच्च बना हुआ है और बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच में भारी असमानता है.

दो बच्चों का नियम कभी राष्ट्रीय कानून नहीं था. यह 1990 के दशक की शुरुआत में जनसंख्या विस्फोट के डर से राज्य स्तर पर लागू किया गया था, जिसे आपराधिक दंड के बजाय पात्रता शर्तों के माध्यम से लागू किया गया था. राजस्थान, हरियाणा, अविभाजित आंध्र प्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश और कई अन्य राज्यों ने इसके अलग-अलग संस्करणों को अपनाया.

समय के साथ, आलोचकों ने इसके दमनकारी प्रभाव, विशेष रूप से गरीब और हाशिए पर रहने वाले वर्गों को उजागर किया. कई राज्यों ने 2000 के दशक के मध्य तक चुपचाप इसे वापस ले लिया. नवीनतम जनगणना इस वापसी के प्रभाव को उजागर करेगी.

मौजूदा फैसले में जो बात इसे अलग बनाती है, वह है राजनीतिक संदर्भ. पिछले दो वर्षों में, कांग्रेस और पार्टी नेता राहुल गांधी ने जनसांख्यिकीय आंकड़ों को अपने राजनीतिक एजेंडे का केंद्र बनाया है. उन्होंने यह तर्क देना शुरू किया है कि  नौकरियां, सरकारी पद और शैक्षणिक संस्थानों में सीटें जाति और अल्पसंख्यकों के लिए आबादी के अनुपात में ही आवंटित की जानी चाहिए.

देशव्यापी जाति जनगणना की मांग और उसके बाद "जितनी आबादी, उतना हक" (जनसंख्या के अनुपात में अधिकार) के आह्वान ने योग्यता को प्राथमिक संगठनात्मक सिद्धांत मानने की धारणा को स्पष्ट रूप से चुनौती दी है. इस बदलाव के दूरगामी परिणाम हैं. अगर अवसरों का वितरण केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाना है, तो जनसंख्या का आकार राजनीतिक पूंजी बन जाता है.

RSS-BJP का जनसंख्या को लेकर क्या विचार है?

इस मामले में BJP का वैचारिक ढांचा पुनर्गठित होता दिख रहा है. RSS के जरिए परिवार के आकार पर दिया जा रहा नया जोर और जनसंख्या पर BJP के विचार को ज्यादा अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता है. जैसे-जैसे कांग्रेस की राजनीति में संख्या को विशेषाधिकार के समान माना जा रहा है. BJP पर भी इसी गणितीय ढांचे के भीतर राजनीतिक जवाब देने का दबाव बढ़ रहा है.

नतीजा ये है कि बड़े परिवारों के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. विशेष रूप से उन समूहों में जहां प्रजनन दर में तेजी से गिरावट आई है. भविष्य में राजनीतिक और आर्थिक ताकत को योगदान के बजाय आबादी और संख्या के हिसाब से तय करने के नए तरीकों के कारण ही तीन बच्चों वाली बहस शुरू होती है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने इस बदलाव को जनसंख्या बढ़ाने की अपील के रूप में नहीं, बल्कि जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) गिरावट के खिलाफ चेतावनी के रूप में बताया है. “जनसंख्या विज्ञान कहता है कि अगर किसी समाज की जन्म दर 2.1 से नीचे चली जाती है, तो उस समाज में तेजी से जनसंख्या घटती है. आप 2.1 बच्चे नहीं पैदा कर सकते, इसलिए व्यवहारिक तौर पर इसका मतलब एक परिवार में तीन बच्चे पैदा करना है.”

भागवत ने साथ ही भारतीय लोगों को आगाह करते हुए कहा, “मूल विचार संतुलन का है. इससे अधिक होने पर संसाधनों पर बोझ पड़ता है और इससे कम होने पर पतन होता है. समाज को स्थिर रहना होगा.”

यह सोच RSS को जनसंख्या नियंत्रण के पूरी तरह खिलाफ नहीं बताती, बल्कि यह दिखाती है कि कुछ समुदायों ने बहुत जल्दी बच्चे कम करना शुरू कर दिया, जो ज्यादा हो गया. पर असल में राजनीति की नजर से देखें तो बात साफ है कि अब लोगों को लगने लगा है कि केवल दो बच्चे की सीमा ठीक नहीं है, क्योंकि अब ज्यादा लोग होने से ही ज्यादा ताकत और सत्ता मिलती है.

भारत में प्रजनन दर में गिरावट एकसमान नहीं रही है. विशेषकर शहरी और छोटे शहरी क्षेत्रों में रहने वाली अगड़ी जातियां परिवार नियोजन को अपनाने में सबसे आगे थीं.  छोटे परिवार, देर से विवाह, महिलाओं की उच्च शिक्षा और वर्कफोर्स में भागीदारी ने प्रजनन दर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. कुछ मामलों में दंपतियों ने एक बच्चा या बिल्कुल भी बच्चा न पैदा करने का विकल्प चुना. इससे देश के सीमित संसाधनों पर दबाव कम करने में मदद मिली.

इसके विपरीत, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और मुस्लिम समुदायों में प्रजनन दर लंबे समय तक अधिक बनी रही, जिसका मुख्य कारण गरीबी, कम साक्षरता, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच है. इसके अलावा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति में प्रजनन दर ज्यादा होने की वजह सामाजिक और धार्मिक बाध्यताएं और सामाजिक असुरक्षा भी थी.

हालांकि यह अंतर काफी हद तक कम हो गया है, फिर भी असमानताएं आज भी बनी हुई हैं. दशकों तक, विशेषज्ञों ने इस असमानता को विकास की कमी के रूप में उचित ठहराया, जो शिक्षा और आर्थिक गतिशीलता के साथ स्वाभाविक रूप से ठीक हो जाएगी. यह धारणा अब आंकड़ों पर आधारित राजनीतिक लामबंदी से टकरा रही है.

जब राजनीतिक चर्चा आवश्यकता से हटकर संख्या पर केंद्रित हो जाती है, तो स्वेच्छा से परिवार का आकार सीमित करने वाले समुदाय खुद को दंडित महसूस करने लगते हैं. अगर रोजगार और शिक्षा संस्थानों में सीटों का वितरण जनसंख्या के आधार पर किया जाता है तो प्रजनन दर में गिरावट में सबसे अधिक योगदान देने वाले लोगों को नुकसान होने का खतरा रहता है.

यही चिंता BJP के भीतर जनसांख्यिकीय पुनर्विचार को बढ़ावा दे रही है. इस परिप्रेक्ष्य में राजस्थान ने दो बच्चों की प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया है. वहीं, असम का भी तीसरे बच्चे की अनुमति देने का कदम अलग-थलग शासन संबंधी निर्णय नहीं हैं. यह एक व्यापक प्रयास का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था में जनसांख्यिकीय असमानता को रोकना है जो तेजी से जनसंख्या गणना पर केंद्रित होती जा रही है.

जनसंख्या की होड़ का खतरा

भारत में जनसांख्यिकीय होड़ का खतरा यह है कि कहीं यह एक ऐसी जनसांख्यिकीय होड़ में न फंस जाए, जहां समुदायों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भविष्य में राजनीतिक या आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए अपनी संख्या बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए. ऐसी होड़ में कोई विजेता नहीं होगा. इससे पहले से ही कमजोर प्रणालियों - शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आवास, जल, परिवहन और रोजगार पर दबाव और बढ़ेगा.

जन्म दर बढ़ाने की इस मुहिम के महिलाओं पर गंभीर परिणाम होते हैं. कुछ हिंदू समूहों के जरिए अब जिन बाल विवाह और बड़े परिवारों की वकालत की जा रही है, उनसे शिक्षा और वेतनभोगी काम में बिताए गए वर्षों में अनिवार्य रूप से कमी आती है.

भारत में प्रजनन दर में गिरावट का कारण कोई जबरदस्ती नहीं, बल्कि महिलाओं की शिक्षा और स्वायत्तता है. इस दिशा को पलटना भारत की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धियों में से एक को नष्ट कर देगा. भारत की भावी समृद्धि उत्पादकता, शिक्षा और मानव पूंजी पर निर्भर करती है, न कि संख्यात्मक प्रभुत्व पर.

हमारी नीति को यह तय करना होगा कि क्या हम कम संख्या में, लेकिन स्वस्थ बच्चे चाहते हैं जो खेल, शिक्षा, विज्ञान आदि में बेहतर प्रदर्शन करें. अगर राजनीति योग्यता के बजाय जनसंख्या को प्राथमिकता देती रही, तो जनसंख्या विकास की चुनौती नहीं रहेगी, बल्कि अस्थिरता का कारण बन जाएगी.

वर्तमान राजनीतिक रुझान से ऐसे बेरोजगार युवाओं को बढ़ावा मिलने का खतरा है जो अपने माता-पिता की देखभाल कर सकें. बजाय इसके कि कम आय वाले युवा एक साथ अपने माता-पिता की देखभाल करें. सवाल अब यह नहीं है कि दो बच्चों की प्रथा गलत थी या नहीं. सवाल यह है कि क्या भारत ऐसी राजनीति को बर्दाश्त कर सकता है जहां प्रजनन क्षमता एक राजनीतिक रणनीति बन जाए.

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