पश्चिम एशिया संकट और डगमगाता रुपया, क्या हो सकता है आगे?

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते में जितनी देर होगी, रुपए पर दबाव उतना ही बढ़ेगा

रुपए की स्थिति को लेकर अर्थशास्त्रियों की अलग-अलग राय है

संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर जारी गतिरोध खत्म करने और पश्चिम एशिया में शांति सुनिश्चित करने के लिए समझौते तक पहुंचने में जितनी अधिक देर लगेगी, रुपए पर दबाव उतना ही लंबे समय तक बना रहेगा. 

28 फरवरी को पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपया लगभग 6 प्रतिशत गिर चुका है. 20 मई को यह डॉलर के मुकाबले लगभग 97 तक पहुंच गया था. 27 मई को यह 95.72 प्रति डॉलर पर कारोबार कर रहा था.

खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक गतिरोध बने रहने या संघर्ष बढ़ने की स्थिति में रुपया डॉलर के मुकाबले और कमजोर हो सकता है. अगर कोई शांति समझौता नहीं होता तो इसके 100 के स्तर को भी पार करने का खतरा है.

हाल के समय में भारत का भुगतान संतुलन (BoP)  यानी देश में आने और बाहर जाने वाली धनराशि का संतुलन चर्चा में रहा है. हालांकि रुपया कई महीनों से कमजोर हो रहा था. युद्ध ने इस गिरावट को और बढ़ा दिया है. 

कच्चा तेल और सोना जैसे प्रमुख आयात तथा रिफाइंड पेट्रोलियम, दवाइयों और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे प्रमुख निर्यात के मूल्य के बीच खींचतान भारत की विनिमय दर यानी रुपए के मूल्य को तय करती है. लेकिन देश के आयात बढ़ने और चालू खाते में घाटा (CAD) के जीडीपी के 1.3 प्रतिशत तक पहुंचने (वित्त वर्ष 2027 तक इसके 2.3 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है) का रुपए पर बेहद नकारात्मक असर पड़ रहा है.

इससे भी अधिक चिंता की बात भारत के कैपिटल अकाउंट पर बढ़ता दबाव है. यह BoP का वह हिस्सा है, जिसमें निवेश, ऋण और परिसंपत्तियों के देश में आने और बाहर जाने का शुद्ध प्रवाह दर्ज किया जाता है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 2026 में अब तक 2.2 लाख करोड़ रुपए के शेयर बेचे हैं जबकि पूरे 2025 में यह आंकड़ा 1.7 लाख करोड़ रुपए था. वहीं भारत में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) इस वर्ष फरवरी तक लगातार छह महीनों तक नकारात्मक रहा.

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, "BoP में संकट की स्थिति है, जिसमें रुपए पर जबरदस्त दबाव है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लगातार निकासी के कारण रुपया अन्य मुद्राओं की तुलना में अधिक कमजोर हो रहा है. यह बड़ा झटका है, जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है."

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने डॉलर बेचकर रुपए को सहारा देने की कोशिश की है. इससे कुछ समय के लिए मदद मिली लेकिन इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई है. मई तक विदेशी मुद्रा भंडार 697 अरब डॉलर था जबकि फरवरी में यह 728 अरब डॉलर था. कमजोर रुपया भारत के आयात बिल को और बढ़ाता है तथा महंगाई को बढ़ावा देता है. इससे उपभोक्ताओं के विवेकाधीन खर्च पर असर पड़ता है.

तकनीकी रूप से कमजोर रुपया निर्यात बढ़ाने में मददगार माना जाता है लेकिन दो कारणों से ऐसा जरूरी नहीं है. पहला, भारत को वैश्विक बाजार में बांग्लादेश जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है और वह कीमतें तय करने की स्थिति में नहीं है. दूसरा, भारत के निर्यात का बड़ा हिस्सा ‘री-एक्सपोर्ट’ यानी आयातित वस्तुओं पर आधारित निर्यात होता है. ऐसे में कमजोर रुपया आयात को महंगा बना देता है और निर्यातकों को मिलने वाला संभावित लाभ खत्म हो जाता है.

रुपए को लेकर अर्थशास्त्रियों के बीच अलग-अलग राय है. कुछ का मानना है कि रुपए को अपना स्तर खुद तय करने देना चाहिए. वहीं कुछ का कहना है कि RBI के दखल के बिना रुपया और गिर सकता है. यह सही है कि RBI का हस्तक्षेप किसी निश्चित स्तर को बनाए रखने के बजाय अस्थिरता के दौर में रुपए को स्थिर रखने के लिए अधिक होता है.

फिलहाल पश्चिम एशिया संकट के समाप्त होने की संभावना के चलते पिछले सप्ताह से रुपए में कुछ मजबूती आई है. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी कहा है कि रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट के आधार पर रुपया फिलहाल ‘अंडरवैल्यूड’ है. उन्होंने संकेत दिया कि विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता रोकने के लिए RBI आगे भी हस्तक्षेप जारी रखेगा.

विशेषज्ञों का मानना है कि 3-5 जून को होने वाली अगली मौद्रिक नीति समिति की बैठक में RBI ब्याज दरों पर ‘यथास्थिति. बनाए रख सकता है. DBS बैंक की वरिष्ठ अर्थशास्त्री और कार्यकारी निदेशक राधिका राव कहती हैं, "जब तक मुख्य महंगाई पर व्यापक असर पड़ने का स्पष्ट जोखिम नहीं दिखता और महंगाई संबंधी अपेक्षाओं के नियंत्रण से बाहर होने के संकेत नहीं मिलते तब तक केंद्रीय बैंक ऊर्जा क्षेत्र के झटके को आपूर्ति पक्ष से कीमतें बढ़ाने वाला कारक मानेगा और आगामी बैठक में सख्त मौद्रिक नीति अपनाने को टाल सकता है."

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