सुनील बंसल यानी भाजपा के ‘मिस्टर भरोसेमंद’
आखिर सुनील बंसल में ऐसा क्या है कि BJP में लगातार उनकी छवि चुनावी जादूगर की बनी है

सुनील बंसल की 'बंगाल स्टोरी' की शुरुआत अगस्त 2022 में हुई. तब उन्हें भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया. साथ ही उन्हें पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना का प्रभारी भी बनाया गया. इसके पहले तक वे उत्तर प्रदेश में संगठन महामंत्री की भूमिका निभा रहे थे. हालांकि, उनकी जिम्मेदारियों में इस बदलाव को BJP के अंदर के ही कई नेता उनके 'पर कतरने' की तरह देख रहे थे. उत्तर प्रदेश में संगठन से लेकर सरकार तक बंसल के दबदबे की कई कहानियां मशहूर रही हैं.
उस निर्णय के तकरीबन साढ़े चार साल बाद जब BJP पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का किला भेदकर प्रचंड बहुमत हासिल करने में सफल हुई है, तो राजनीतिक विश्लेषकों के साथ-साथ BJP संगठन के कई लोग भी इस जीत के मुख्य शिल्पकार के तौर पर सुनील बंसल का नाम ले रहे हैं. सुनील बंसल ने बंगाल में क्या-क्या चुनावी रणनीति अपनाई, इस बारे में विस्तार से बात की जा रही है. ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि आखिर सुनील बंसल में ऐसा क्या है कि BJP अपने लिए सबसे चुनौतीपूर्ण जगहों पर उन्हें भेजती है और अधिकांश जगहों पर वे पार्टी को सफलता दिलाने में कामयाब हुए हैं.
इस संदर्भ में 2014 के लोकसभा चुनावों की एक घटना का जिक्र प्रासंगिक होगा. श्रावस्ती से BJP ने बसपा से आए ददन मिश्रा को उम्मीदवार बनाया. मिश्रा ने BJP के राष्ट्रीय महासचिव वरुण गांधी से अपने नामांकन में आने के लिए आग्रह किया और वरुण गांधी इसके लिए तैयार भी हो गए. उस समय उत्तर प्रदेश BJP में यह परिपाटी चल रही थी कि चाहे पार्टी की ओर से कोई कार्यक्रम तय हो या नहीं, लेकिन बड़े नेताओं को चुनाव में पार्टी हेलीकॉप्टर दे देती थी. मिश्रा ने वरुण गांधी के लिए हेलीकॉप्टर की मांग पार्टी से की. लेकिन 2014 में यह तय हुआ कि पार्टी से हेलीकॉप्टर उन्हीं नेताओं को मिलेगा, जिनका कार्यक्रम पार्टी लगाएगी. इस नियम के तहत वरुण गांधी को हेलीकॉप्टर नहीं मिल सकता था.
प्रदेश अध्यक्ष होने के बावजूद लक्ष्मीकांत वाजपेयी वरुण गांधी को हेलीकॉप्टर देने से मना नहीं कर पा रहे थे. तब यह बात पार्टी के उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह के साथ सह-प्रभारी के तौर पर आए सुनील बंसल तक पहुंची. उन्होंने तुरंत ही वरुण गांधी को हेलीकॉप्टर देने से मना कर दिया. सुनील बंसल के इस निर्णय से प्रदेश के शीर्ष BJP नेताओं के बीच बंसल की धमक पैदा हुई. इससे यह संदेश गया कि संगठन के नियम सबके लिए बराबर होंगे. इस घटना के पहले उत्तर प्रदेश BJP में सुनील बंसल की पहचान अमित शाह के साथ ऐसे सहयोगी की थी, जो हर बैठक में सबसे पीछे बैठ जाता है और अपनी डायरी में कुछ-कुछ लिखता रहता है.
सुनील बंसल ने 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले से ही अपने कामों से यह संकेत देना शुरू कर दिया था कि सांगठनिक स्तर पर सह प्रभारी होने के बावजूद वे ताकतवर हैं. संगठन महामंत्री के तौर पर उत्तर प्रदेश में उनके आठ साल के कार्यकाल को एक तरफ हर चुनाव में BJP की जीत और संगठन को गांव से लेकर प्रदेश स्तर तक मजबूती देने के लिए जाना जाता है, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ से टकराव की वजह से भी वे अक्सर चर्चा में रहे हैं.
2013 में उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने के बाद जब अमित शाह अपने सह-प्रभारियों के साथ पहुंचे, तो उनकी टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन के अंदर की खेमेबंदी को खत्म करना थी. इस बारे में प्रदेश BJP के एक नेता बताते हैं, "मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, लालजी टंडन, कलराज मिश्र, विनय कटियार, वरुण गांधी और सूर्य प्रताप शाही उस समय प्रदेश BJP के बड़े नेता थे और इन सबका अपना-अपना खेमा था.
अमित शाह के निर्देश पर सुनील बंसल ने संगठन के स्तर पर इस खेमेबंदी को तोड़ने की शुरुआत की. उन्होंने पार्टी की बैठकों में स्पष्ट तौर पर यह कहना शुरू किया कि 2014 में किसी भी बड़े नेता की सिफारिश से किसी को टिकट नहीं मिलेगा. टिकट इस आधार पर दिया जाएगा कि पार्टी के लिए आपने क्या किया है, आपकी जीत हासिल करने की क्षमता कितनी है और पार्टी का सर्वे आपके बारे में क्या कहता है. बहुत समय बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में ऐसा हुआ कि टिकट बंटवारे में प्रदेश के किसी बड़े नेता का कोटा सिस्टम नहीं चला."
पार्टी के नेताओं और पत्रकारों से हुई विस्तृत बातचीत में 2014 से 2022 तक प्रदेश संगठन महामंत्री के तौर पर सुनील बंसल की उपलब्धियों में चुनावी जीत के अलावा चार बातें स्पष्ट तौर पर उभरकर सामने आती हैं. इनमें पहली उपलब्धि है गांव से लेकर प्रदेश तक संगठन का ढांचा मजबूत करना. बंसल की दूसरी उपलब्धि यह है कि उन्होंने BJP को बनियों और सवर्णों की पार्टी की पहचान से बाहर निकाला और इसे सभी वर्गों की पार्टी बनाने की कोशिश की. प्रदेश BJP में तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देकर पार्टी की कार्यशैली को हाई-टेक बनाने को उनकी तीसरी उपलब्धि बताया जाता है. प्रदेश में संगठन और सरकार के स्तर पर नया नेतृत्व खड़ा करने का श्रेय भी बंसल को दिया जाता है.
सुनील बंसल की इन उपलब्धियों के बारे में उत्तर प्रदेश BJP के प्रदेश महासचिव अमरपाल मौर्य बताते हैं, "बूथ स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक संगठन को मजबूत करने के लिए उन्होंने कई कदम उठाए. कार्यक्रमों की पूरी श्रृंखला तैयार की. साथ ही पार्टी की सारी गतिविधियों की मॉनिटरिंग का एक तंत्र उन्होंने विकसित किया. पार्टी की सदस्यता अभियान की मॉनिटरिंग के लिए तीन स्तरीय व्यवस्था उन्होंने विकसित की. प्रदेश स्तर पर युवाओं और टेक्नोलॉजी का प्रभावी इस्तेमाल करने वालों का एक वॉर रूम बनाया. उत्तर प्रदेश BJP में सुनील बंसल ने परिक्रमा की राजनीति को खत्म करके पराक्रम की राजनीति को विकसित करने का काम किया. इस प्रक्रिया में उन्होंने संगठन और सरकार के स्तर पर नई लीडरशिप विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यही वजह है कि आज संगठन और सरकार में 40 से 50 वर्ष के बीच की आयु वाले लोग महत्वपूर्ण पदों पर दिख रहे हैं."
पार्टी के कुछ नेताओं का तो यह भी दावा है कि ब्राह्मण समाज से आने वाले लक्ष्मीकांत वाजपेयी की जगह केशव प्रसाद मौर्य के रूप में अन्य पिछड़ा वर्ग के नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का विचार भी सुनील बंसल का ही था. BJP को लगा कि ओबीसी चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर चुनाव लड़ने से इस वर्ग के लोगों का वोट हासिल किया जा सकता है. BJP के अंदर और पार्टी कवर करने वाले पत्रकारों में सुनील बंसल को लेकर यह धारणा बनी है कि चुनावों से संबंधित हिसाब-किताब में वे पक्के हैं.
लखनऊ के एक पत्रकार एक किस्सा बताते हैं, "2017 के विधानसभा चुनावों के रुझान आ रहे थे. मैंने पार्टी कार्यालय में सुनील बंसल से पूछा कि पार्टी कितनी सीटें जीत रही है. वे मुझे अंदर के एक कमरे में ले गए और एक लिस्ट दिखाई. इस लिस्ट में जिन सीटों पर BJP की जीत दिखाई गई थी, अंतिम परिणाम में उससे केवल दो-तीन सीटों का ही अंतर था." बंसल के बारे में ऐसी ही कहानियां पश्चिम बंगाल के चुनावों को लेकर भी कही जा रही हैं.
2017 के विधानसभा चुनावों में BJP की जीत के बाद सुनील बंसल का दबदबा और बढ़ा. यही वजह थी कि BJP के नेता अनौपचारिक बातचीत में यह स्वीकार करते हैं कि योगी मंत्रिमंडल के गठन में सुनील बंसल का काफी दखल 2017 में भी रहा और 2022 में भी. इस बारे में पार्टी के एक नेता कहते हैं, "मोहसिन रजा 2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के पास के लिए कुछ पत्रकारों से बात कर रहे थे. शपथ ग्रहण वाले दिन उनके पास अचानक सुनील बंसल का फोन आया और उन्होंने सूचना दी कि मुख्यमंत्री आवास पहुंचिए, आपको योगी सरकार में मंत्री पद की शपथ लेनी है. यही कहानी 2022 में मंत्री बने दानिश आजाद, जेपीएस राठौर और दयाशंकर मिश्र दयालु की भी है. उन्हें भी आखिरी वक्त पर सुनील बंसल ने बताया कि आप मंत्री बन रहे हैं. जमीनी स्तर से जानकारियां जुटाकर सुनील बंसल के पास ऐसे कार्यकर्ताओं की सूची होती थी, जिन्हें जरूरत पड़ने पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सके."
योगी आदित्यनाथ 2022 का विधानसभा चुनाव अयोध्या से लड़ना चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. बताया जाता है कि इस मामले में भी सुनील बंसल दिल्ली में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को यह समझाने में सफल रहे कि क्यों योगी को अयोध्या के बजाय गोरखपुर से चुनाव लड़ना चाहिए. जिस तरह से नरेंद्र मोदी का वाराणसी से चुनाव लड़ने का एक सांकेतिक महत्व है, उसी तरह की स्थिति योगी आदित्यनाथ के लिए भी बन सकती थी, अगर वे अयोध्या से विधायक चुने जाते.
योगी और बंसल के बीच शह और मात का खेल 2022 में नए मंत्रिमंडल के गठन में भी चला. दावा तो यहां तक किया जाता है कि उपमुख्यमंत्री बनाने के मामले में भी योगी आदित्यनाथ की नहीं चली. पहली सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे केशव प्रसाद मौर्य सिराथू से विधानसभा चुनाव हार गए थे. प्रदेश BJP कवर करने वाले एक पत्रकार बताते हैं, "सुनील बंसल के सहयोग से प्रदेश अध्यक्ष बने स्वतंत्र देव सिंह तब तक योगी खेमे में जा चुके थे. योगी, मौर्य की जगह स्वतंत्र देव सिंह को उपमुख्यमंत्री बनाना चाहते थे. लेकिन सुनील बंसल ने बैठकों में स्पष्ट कर दिया कि प्रदेश में पिछड़ों का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा मौर्य हैं और इसलिए उन्हें ही उपमुख्यमंत्री बनाना है. यही कहानी दिनेश शर्मा की जगह बने दूसरे उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक की भी है. पाठक को योगी पसंद नहीं करते थे. लेकिन 2017 में बसपा छोड़कर BJP में आए पाठक के पीछे बंसल खड़े हो गए."
उत्तर प्रदेश की राजनीति में केशव प्रसाद मौर्य और बंसल की जुगलबंदी रही है. कुछ मौकों पर योगी बनाम बंसल संघर्ष में मौर्य, बंसल की तरफ से बैटिंग करते नजर आते हैं. 16 अगस्त 2022 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर लखनऊ में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें योगी आदित्यनाथ और सुनील बंसल दोनों थे. मुख्यमंत्री की मौजूदगी में मौर्य ने अपने भाषण में कहा कि प्रदेश में BJP को मिली लगातार जीत के लिए अगर कोई एक व्यक्ति सबसे अधिक जिम्मेदार है, तो वे सुनील बंसल हैं. हालांकि, बंसल से जब भी योगी से टकराव के बारे में मीडिया ने सवाल पूछा, तो उनका यही जवाब होता था कि संगठन और कार्यकर्ता के हक और हित की चिंता करना उनकी जिम्मेदारियों का हिस्सा है. इस स्थिति के बारे में BJP के एक नेता कहते हैं, "संगठन महामंत्री के तौर पर सुनील बंसल को संगठन शिल्पी होना था, लेकिन वे उत्तर प्रदेश में संगठन का चेहरा बन गए."
उत्तर प्रदेश में संगठन महामंत्री के तौर पर उनकी सबसे बड़ी चुनौती 2019 का लोकसभा चुनाव था. 2019 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे थे. प्रदेश BJP के एक नेता बताते हैं, "पार्टी ने तय किया कि हमें मोदी सरकार और योगी सरकार के कामकाज को जमीनी स्तर पर लेकर जाना है और सोशल इंजीनियरिंग को मजबूत बनाए रखना है. योजनाओं के लाभार्थियों का सम्मेलन विभिन्न स्तर पर कराने की योजना बनी. सुनील बंसल ने पार्टी कार्यकर्ताओं को लाभार्थियों के घर जाने और उनके साथ त्योहार मनाने को कहा. गांवों में लाभार्थियों के साथ चौपाल का प्रयोग किया. लाभार्थियों को पार्टी के साथ जोड़ना 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में टर्निंग पॉइंट बन गया. पार्टी की बैठकों में अमित शाह ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि आप लोग सीटों की चिंता मत कीजिए, चिंता सिर्फ इस बात की कीजिए कि हमें 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करना है." 2019 में BJP ने अमित शाह द्वारा तय किए गए इस लक्ष्य को हासिल कर लिया. BJP गठबंधन को 51.19 प्रतिशत वोट मिले.
बंसल के संगठन महामंत्री रहते BJP ने उत्तर प्रदेश की सहकारी समितियों पर भी कब्जा जमाया. पहले समाजवादी पार्टी का इन पर कब्जा था. इसी तरह से शिक्षक और स्नातक चुनाव क्षेत्र से विधान परिषद के चुनावों में भी पार्टी पूरी ताकत से उतरने लगी. जिला पंचायत और ब्लॉक प्रमुख के चुनावों में भी पार्टी पूरी ताकत से उतरी और कामयाबी हासिल की.
राजस्थान के कोटपुतली के रहने वाले सुनील बंसल ने राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति में कदम रखा. बाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में उनके पास संगठनात्मक जिम्मेदारियां रहीं. विद्यार्थी परिषद के क्षेत्रीय संगठन मंत्री के तौर पर जब सुनील बंसल 2005 में दिल्ली आए, तो उनके जिम्मे जो कई काम आए, उनमें एक दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव था.
उत्तराखंड BJP के सचिव गौरव पांडेय उस समय विद्यार्थी परिषद में काम कर रहे थे और उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव भी लड़ा था. बंसल की कार्यशैली के बारे में वे बताते हैं, "मुझे बहुत अच्छे से याद है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में आने के बाद उन्होंने जो पहली बैठक ली, उसमें उन्होंने सारे छात्र नेताओं से कहा कि बाबागीरी बंद करो. जिसको बाबागीरी करनी है, उसके लिए संगठन में कोई भूमिका नहीं है और वह घर जा सकता है. हम लगातार चुनाव हार रहे थे और सुनील बंसल का राजस्थान में छात्र संघ चुनावों के प्रबंधन का लंबा अनुभव था. यहां आकर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों से संबंधित डेटा का विश्लेषण शुरू किया. फिर उन्होंने देखा कि जिस तरह से यहां जाट उम्मीदवार उतारने की परंपरा रही है, उसे तोड़ने का समय आ गया है. क्योंकि बड़ी संख्या में छात्र दूसरे समाज और क्षेत्र से यहां पढ़ने आने लगे थे. दीपक बंसल और उत्तराखंड से आने वाले मेरे जैसे कार्यकर्ता को उम्मीदवार बनाने की रणनीति उनकी ही थी. उनका साफ कहना था कि कांग्रेस की एनएसयूआई ग्लैमर के आधार पर चुनाव लड़ती है और हमारा संगठन कैडर आधारित है, इसलिए हमें चुनावों को कैडर पर ले जाना है. इस नाते उन्होंने हर स्तर पर संगठन को मजबूत करने का काम किया."
वे आगे बताते हैं, "विद्यार्थी परिषद की गतिविधियों में धार पैदा हो, इसके लिए वे आंदोलन का रास्ता अपनाते थे. विश्वविद्यालय में कुछ भी गड़बड़ी होने पर इसके खिलाफ संगठन को वे तुरंत सक्रिय कर देते थे. डेटा, नियमित गतिविधियां और सघन जनसंपर्क के जरिए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में विद्यार्थी परिषद को मजबूत किया और फिर विद्यार्थी परिषद चुनाव जीतने लगी. हर सांगठनिक निर्णय वे तथ्यों के आधार पर लेते थे. आप उनसे अगर पूछेंगे, तो उनके पास अब भी उन चुनावों का सारा रिकॉर्ड होगा. उन्होंने ही तय किया कि विद्यार्थी परिषद का एक अच्छा कार्यालय बनाना है. इसके लिए साधन संग्रह करने से लेकर इसे बनाने तक के कार्य का उन्होंने नेतृत्व किया."
सुनील बंसल की चुनाव प्रबंधन शैली के बारे में अमरपाल मौर्य बताते हैं, "उनकी चुनाव प्रबंधन शैली के मूल में उनका संगठन कौशल है. उन्होंने उत्तर प्रदेश में यह सुनिश्चित किया कि नीचे के कार्यकर्ताओं से उनका सीधा संपर्क रहे और निरंतर संवाद हो. इससे उन्हें जमीनी स्तर की जानकारियां सीधे मिलती रहीं और इसके हिसाब से पार्टी जरूरी कदम उठाती रही. साथ ही उन्होंने अपनी टीम पर जबरदस्त भरोसा किया. पार्टी के जो भी महामंत्री थे, वे सभी को जिम्मेदारी देकर उन पर भरोसा करते थे. 2022 के विधानसभा चुनावों में मुझे अवध प्रांत की जिम्मेदारी दी गई और मुझे उन्होंने काम करने की पूरी छूट दी."
BJP के अंदर चुनाव प्रबंधन के विशेषज्ञ के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाले सुनील बंसल को फिल्में देखने का काफी शौक है. छात्र जीवन में वे 'फर्स्ट डे, फर्स्ट शो' देखने में यकीन करते थे. उनके एक सहयोगी बताते हैं कि चुनाव प्रबंधन की आपाधापी से जब भी वे खाली होते हैं, तो वे कार्यकर्ताओं के साथ फिल्म देखने चले जाते हैं. उनके सहयोगी यह भी बताते हैं कि सुनील बंसल के आई-पैड पर कई फिल्में रहती हैं और वे समय मिलने पर अकेले भी अपने आई-पैड पर फिल्में देखते हैं.
सुनील बंसल से जब भी उनके सांगठनिक कौशल को लेकर पत्रकारों ने औपचारिक-अनौपचारिक बातचीत में पूछा है, तो वे इसका श्रेय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में काम करने के अपने अनुभव को देते हैं. विद्यार्थी परिषद में रहते हुए बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ जो अभियान चला, उसके राष्ट्रीय संयोजक के तौर पर भी सुनील बंसल ने काम किया. साथ ही 'यूथ अगेंस्ट करप्शन' के भी वे राष्ट्रीय संयोजक रहे.
2022 में जिन तीन राज्यों का प्रभारी सुनील बंसल को बनाया गया था, उनमें से पहले ओडिशा और अब पश्चिम बंगाल में BJP पहली बार अपने दम पर जीतने में कामयाब हुई है. जाहिर है कि इससे पार्टी के अंदर उनकी छवि एक ऐसे चुनावी प्रबंधक की बन रही है, जो जादुई नतीजे देने में अपनी मुख्य भूमिका निभाता है.